खरपतवार प्रबंधन (Weed Management) – AGRON | B.Sc. Ag. Hindi & English (PDF,BOOK,PPT)

खरपतवार प्रबंधन (Weed Management) – AGRON | B.Sc. Ag. Hindi & English (PDF,BOOK,PPT)

खरपतवार प्रबंधन (Weed Management, AGRON-313) B.Sc. (Hons.) Agriculture का 3 क्रेडिट (2+1) का कोर्स है, यानी 2 क्रेडिट थ्योरी और 1 क्रेडिट प्रैक्टिकल। खरपतवार किसान के सबसे पुराने और सबसे लगातार चलने वाले दुश्मन हैं, क्योंकि ये फसल से पानी, पोषक तत्व, धूप और जगह छीनते हैं। इस विषय में आप खरपतवारों की पहचान, उनके जीवन-चक्र, नियंत्रण के सभी तरीके, शाकनाशी (Herbicide) रसायन और समन्वित खरपतवार प्रबंधन सीखते हैं। इस लेख में सिलेबस के सभी 24 टॉपिक (कुल 30 लेक्चर) आसान हिंदी में समझाए गए हैं, ताकि परीक्षा, ICAR JRF, कृषि पर्यवेक्षक और राजस्थान की कृषि परीक्षाओं की तैयारी आसान हो।

इस लेख में आप पढ़ेंगे: खरपतवार का परिचय व लक्षण, लाभ-हानि, वर्गीकरण, प्रजनन व प्रसार, सुषुप्तावस्था, फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा, नियंत्रण की विधियाँ, शाकनाशी (वर्गीकरण, फॉर्मूलेशन, क्रियाविधि, चयनात्मकता, भाग्य), एडजुवेंट, जैव-शाकनाशी, मिश्रण, एलीलोपैथी, IWM, शाकनाशी प्रतिरोधकता, प्रमुख फसलों में प्रबंधन, प्रैक्टिकल सूत्र, MCQ, FAQ और Free Download।

1. खरपतवार का परिचय

खरपतवार (Weed) वह पौधा है जो गलत जगह पर, गलत समय पर उगता है और बिना बोए खेत में अपने आप आ जाता है। सरल परिभाषा है: "गलत जगह पर उगा हुआ पौधा"। जो पौधा एक जगह खरपतवार है, वही दूसरी जगह उपयोगी हो सकता है। जैसे गेहूँ के खेत में उगा चना खरपतवार है, और खेत में स्वयं उगा बथुआ सब्जी के रूप में काम आता है। खरपतवार विज्ञान (Weed Science) में इनके जीव विज्ञान, पारिस्थितिकी और नियंत्रण का अध्ययन होता है। भारत में खरपतवार अनुसंधान का शीर्ष संस्थान जबलपुर में स्थित ICAR का खरपतवार अनुसंधान निदेशालय है। कई अध्ययनों के अनुसार खरपतवार कीट, रोग और अन्य कारणों की तुलना में फसल उपज को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं।

2. खरपतवारों के लक्षण (Characteristics of Weeds)

  • अधिक बीज उत्पादन: एक पौधा हजारों से लाखों बीज बना सकता है।
  • बीजों की लंबी जीवन क्षमता: कई प्रजातियों के बीज वर्षों तक मिट्टी में जीवित रहते हैं (Seed bank)।
  • सुषुप्तावस्था: बीज सभी एक साथ अंकुरित नहीं होते, जिससे बार-बार नए पौधे निकलते हैं।
  • तेज़ वृद्धि और प्रारंभिक बढ़त: कई खरपतवार फसल से पहले उग आते हैं।
  • कठोर अनुकूलन: सूखा, लवणता और खराब मृदा सहने की क्षमता।
  • वानस्पतिक प्रवर्धन: कंद, राइज़ोम और स्टोलन के टुकड़ों से भी नया पौधा बन जाता है।
  • नकल (Mimicry): कुछ खरपतवार फसल जैसे दिखते हैं, जैसे धान में सवाँ (Echinochloa), जिससे निराई में पहचानना कठिन होता है।
  • फैलाव के अनेक साधन: हवा, पानी, पशु और मनुष्य।

3. खरपतवारों के हानिकारक और लाभदायक प्रभाव

हानिकारक प्रभावलाभदायक प्रभाव
फसल उपज और गुणवत्ता में कमीमृदा कटाव रोकना (भू-आच्छादन)
पानी, पोषक तत्व, प्रकाश और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धाहरी खाद और जैव पदार्थ का स्रोत
कीट और रोगों के मेजबान (Alternate host)चारा और सब्जी (जैसे बथुआ, चौलाई)
एलीलोपैथी द्वारा फसल की वृद्धि रोकनाऔषधीय उपयोग
खेती की लागत और श्रम बढ़ना, सिंचाई नहरों और जलाशयों में रुकावटमृदा उर्वरता और प्रदूषण के संकेतक
मनुष्य और पशुओं में एलर्जी या विषाक्तता (जैसे गाजर घास)मधुमक्खी और जैव विविधता को आश्रय, फाइटोरेमेडिएशन (जैसे जलकुंभी द्वारा प्रदूषक सोखना)

4. खरपतवारों का वर्गीकरण

(क) जीवन-चक्र के आधार पर

  • एकवर्षीय (Annual): एक वर्ष या मौसम में जीवन-चक्र पूरा, जैसे बथुआ, गुल्ली डंडा (Phalaris minor)।
  • द्विवर्षीय (Biennial): दो वर्ष में चक्र पूरा, जैसे जंगली गाजर।
  • बहुवर्षीय (Perennial): कई वर्षों तक जीवित, जैसे दूब घास (Cynodon dactylon) और मोथा (Cyperus rotundus)।

(ख) आकारिकी (Morphology) के आधार पर

वर्गलक्षण और उदाहरण
घास कुल (Grasses)संकरी पत्ती, समानांतर शिराएँ। जैसे गुल्ली डंडा, सवाँ, दूब घास
सेज कुल (Sedges)तना त्रिकोणीय, ठोस; जैसे मोथा (Cyperus)
चौड़ी पत्ती (Broad-leaf)जालीदार शिराएँ; जैसे बथुआ, कृष्णनील, सत्यानाशी, इटसिट (Trianthema)

(ग) अन्य आधार

  • ऋतु के आधार पर: खरीफ के खरपतवार (मकोय, सवाँ, इटसिट), रबी के खरपतवार (बथुआ, चटरी-मटरी, गुल्ली डंडा, जंगली जई) और जायद के खरपतवार।
  • आवास के आधार पर: स्थलीय (Terrestrial) और जलीय (Aquatic), जैसे जलकुंभी (Eichhornia crassipes)।
  • परजीवी खरपतवार: अमरबेल (Cuscuta, तना परजीवी), ओरोबैंकी (Orobanche, जड़ परजीवी; सरसों, बैंगन और तंबाकू पर), स्ट्राइगा (Striga, ज्वार और गन्ने पर)।
  • उद्गम के आधार पर: देशी (Native) और विदेशी (Introduced); विदेशी खरपतवार जैसे गाजर घास (Parthenium), लैंटाना और विलायती बबूल (Prosopis juliflora)।

5. खरपतवारों का प्रजनन और प्रसार

प्रजनन (Reproduction)

  • बीज द्वारा: सबसे आम तरीका, जैसे बथुआ, गुल्ली डंडा।
  • वानस्पतिक विधि द्वारा: मोथा के कंद (Tubers), दूब के स्टोलन और राइज़ोम, कांस (Saccharum spontaneum) के राइज़ोम और बल्बिल।

प्रसार (Dissemination) के साधन

साधनविवरण
हवारोएँदार या पंखदार बीज (गाजर घास, ट्राइडैक्स, सोंचस)
पानीनहर, बाढ़ और सिंचाई जल के साथ बीज बहना
पशु और पक्षीकाँटेदार बीज (जैसे ओंगा, गोखरू) शरीर से चिपकते हैं; पशुओं के गोबर से भी फैलते हैं
मनुष्य और मशीनेंदूषित बीज, गोबर की खाद, कृषि यंत्र, ट्रैक्टर और कंबाइन
स्वतः विस्फोटकुछ पौधों की फलियाँ फटकर बीज दूर फेंक देती हैं

6. खरपतवारों में सुषुप्तावस्था (Dormancy) और इसके प्रकार

सुषुप्तावस्था वह अवस्था है जिसमें जीवित बीज अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर भी तुरंत अंकुरित नहीं होता। यह खरपतवारों की बड़ी "रक्षा रणनीति" है, क्योंकि इससे बीज बैंक वर्षों तक बना रहता है।

प्रकारविवरण
जन्मजात / प्राथमिक (Innate)बीज बनते समय से ही मौजूद, जैसे अपरिपक्व भ्रूण या कठोर बीज आवरण
प्रेरित (Induced)परिपक्व बीज में बाद में कुछ कारणों (जैसे अधिक तापमान, ऑक्सीजन की कमी) से उत्पन्न
अधिरोपित (Enforced)बाहरी परिस्थिति (जैसे नमी, तापमान या प्रकाश की कमी) के कारण अंकुरण रुका रहना

कारण: कठोर या अपारगम्य बीज आवरण, अपरिपक्व भ्रूण, अंकुरण निरोधक रसायन और प्रकाश की जरूरत। तोड़ने के तरीके: स्कारिफिकेशन (बीज आवरण खुरचना), स्ट्रैटिफिकेशन (ठंडे उपचार), GA3 या KNO3 से उपचार और प्रकाश या तापमान में परिवर्तन।

7. फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा (Crop-Weed Competition)

फसल और खरपतवार एक ही संसाधन के लिए मुकाबला करते हैं: प्रकाश, जल, पोषक तत्व, स्थान और CO2। प्रतिस्पर्धा सबसे अधिक तब होती है जब दोनों की आवश्यकता एक साथ और सीमित स्रोत पर हो।

क्रांतिक अवस्था (Critical Period of Crop-Weed Competition)

फसल जीवन की वह अवधि जिसमें खरपतवार नियंत्रित न किए जाएँ तो उपज को सबसे अधिक हानि होती है। इस अवधि में खेत को खरपतवार-मुक्त रखना जरूरी है। अधिकतर अनाज की फसलों में यह बुवाई के लगभग 20 से 45 दिन के बीच रहती है; जैसे गेहूँ में लगभग 30 से 45 दिन।

प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाले कारक

  • खरपतवार की प्रजाति और उसकी घनत्व (संख्या प्रति वर्ग मीटर)।
  • खरपतवार के उगने का समय (फसल से पहले उगे तो अधिक हानि)।
  • फसल की किस्म, बुवाई की दूरी और बीज दर।
  • उर्वरता, नमी और मौसम।

जब खरपतवार नियंत्रण का खर्च, फसल हानि के बराबर हो जाए तो उस स्तर को आर्थिक देहली स्तर (ETL) कहते हैं।

8. खरपतवार प्रबंधन के सिद्धांत: एक परिचय

सिद्धांतअर्थ और उदाहरण
निवारण (Prevention)खरपतवार को खेत में आने से रोकना: साफ बीज, सड़ी हुई गोबर खाद, साफ मशीनें, क्वारंटाइन नियम
उन्मूलन (Eradication)बीज बैंक सहित खरपतवार को पूरी तरह समाप्त करना (कठिन और महँगा)
नियंत्रण (Control)खरपतवार की संख्या को सीमित करना, ताकि फसल को आर्थिक हानि न हो
प्रबंधन (Management)सभी विधियों को मिलाकर एक योजना बनाना, जिसमें लागत और पर्यावरण का ध्यान रखा जाता है

9. खरपतवार नियंत्रण की भौतिक और सस्य विधियाँ

भौतिक (यांत्रिक) विधियाँ

  • हाथ से निराई (खुरपी से) और गुड़ाई (कस्सी, कुदाल, हैंड हो)।
  • जुताई और ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई, जिससे बहुवर्षीय खरपतवार की जड़ें धूप में सूखती हैं।
  • कटाई (Mowing), जलाना (Burning) और बाढ़ (Flooding) जैसे धान के खेत में पानी भरना।
  • मल्चिंग (पुआल, प्लास्टिक फिल्म) और मृदा सौरीकरण (Solarization)।

सस्य (Cultural) विधियाँ

  • फसल चक्र और अंतरफसल (Intercropping)।
  • उपयुक्त समय पर बुवाई और प्रतिस्पर्धी किस्मों का चयन।
  • बीज दर और पौध ज्यामिति (कम दूरी) से खेत को जल्दी ढकना।
  • स्टेल सीडबेड (Stale Seedbed): बुवाई से पहले सिंचाई कर खरपतवार उगने देना और फिर नष्ट करना।
  • आवरण फसल (Cover crop) और उर्वरक की सही जगह पर देना।

10. खरपतवार नियंत्रण की रासायनिक और जैविक विधियाँ

रासायनिक विधि

इसमें शाकनाशी (Herbicide) का प्रयोग होता है। इससे श्रम और समय की बचत होती है और बड़े क्षेत्र में जल्दी नियंत्रण हो जाता है। परंतु गलत मात्रा या समय पर उपयोग से फसल को नुकसान, पर्यावरणीय प्रदूषण और प्रतिरोधकता की समस्या हो सकती है।

जैविक विधि (Biological Control)

इसमें खरपतवार के प्राकृतिक शत्रुओं (कीट, कवक, जीवाणु और मछली) का उपयोग होता है।

खरपतवारजैव-नियंत्रक
गाजर घास (Parthenium)मैक्सिकन बीटल Zygogramma bicolorata
जलकुंभी (Water hyacinth)Neochetina eichhorniae और N. bruchi घुन
नागफनी (Opuntia)Cactoblastis cactorum तथा कोचीनियल कीट (Dactylopius)
सैल्विनिया (जलीय फर्न)Cyrtobagous salviniae
जलीय खरपतवारग्रास कार्प मछली (Ctenopharyngodon idella)

11. शाकनाशियों का वर्गीकरण

आधारप्रकार और उदाहरण
चयनात्मकता के आधार परचयनात्मक (Selective): 2,4-D, एट्राजीन; अचयनात्मक (Non-selective): ग्लाइफोसेट, पैराक्वाट
प्रयोग के समय के आधार परबुवाई-पूर्व मिलाने वाले (PPI), उगने से पहले (Pre-emergence), उगने के बाद (Post-emergence)
गति (Translocation) के आधार परसंपर्क (Contact): पैराक्वाट; अंतर्प्रवाही (Systemic): ग्लाइफोसेट, 2,4-D
रासायनिक कुल के आधार परफेनोक्सी (2,4-D); ट्राइएजीन (एट्राजीन); डाइनाइट्रोएनिलीन (पेंडीमेथालिन); एमाइड (ब्यूटाक्लोर, प्रेटिलाक्लोर); सल्फोनिलयूरिया (सल्फोसल्फ्यूरॉन, मेटसल्फ्यूरॉन); एरिलॉक्सी-फेनोक्सी (क्लोडिनाफॉप, फेनोक्साप्रॉप); बाइपाइरिडिलियम (पैराक्वाट); ग्लाइसीन (ग्लाइफोसेट); इमिडाजोलिनोन (इमेज़ेथापायर)

12. शाकनाशी के सक्रिय घटक और फॉर्मूलेशन

सक्रिय घटक (Active Ingredient, a.i.) शाकनाशी का वह रासायनिक हिस्सा है जो खरपतवार को मारता है। बाजार में यह सीधे नहीं बिकता; इसे विलायक, इमल्सीफायर और अन्य पदार्थ मिलाकर फॉर्मूलेशन के रूप में बेचा जाता है।

फॉर्मूलेशनपूरा नामउदाहरण
ECEmulsifiable Concentrateपेंडीमेथालिन 30% EC, ब्यूटाक्लोर 50% EC
WPWettable Powder2,4-D सोडियम साल्ट 80% WP, एट्राजीन 50% WP
SLSoluble Liquidग्लाइफोसेट 41% SL
WG / WDGWater Dispersible Granuleसल्फोसल्फ्यूरॉन 75% WG
Gदानेदार (Granule)ब्यूटाक्लोर 5% G (रेत में मिलाकर देना)
SCSuspension Concentrateतरल निलंबन रूप

13. शाकनाशी प्रयोग: प्रकार और तकनीकें

प्रयोग के प्रकार

  • बुवाई-पूर्व (Pre-plant): बुवाई से पहले, जैसे फ्लूक्लोरालिन का मिट्टी में मिलाना।
  • अंकुरण-पूर्व (Pre-emergence): बुवाई के तुरंत बाद, फसल और खरपतवार उगने से पहले (जैसे एट्राजीन, पेंडीमेथालिन)।
  • अंकुरण-पश्चात (Post-emergence): उगे हुए खरपतवार पर (जैसे 2,4-D, क्लोडिनाफॉप)।
  • प्रयोग के तरीके: पूरे खेत में छिड़काव (Broadcast), पंक्तियों में पट्टी में (Band), स्थान विशेष पर (Spot) और रेत या यूरिया में मिलाकर बिखेरना।

तकनीकें और उपकरण

  • स्प्रेयर: नैपसैक (हाथ वाला), फुट स्प्रेयर, पावर स्प्रेयर और ट्रैक्टर चालित बूम स्प्रेयर।
  • नोज़ल: शाकनाशी के लिए सामान्यतः फ्लैट फैन नोज़ल; अंकुरण-पूर्व के लिए फ्लड जेट भी उपयोगी। कीटनाशी के लिए कोन नोज़ल अधिक प्रचलित है।
  • पानी की मात्रा: नैपसैक स्प्रेयर से सामान्यतः 500 से 600 लीटर प्रति हेक्टेयर; समान छिड़काव के लिए पहले स्प्रेयर का कैलिब्रेशन करें।
  • सावधानियाँ: तेज हवा या बारिश में छिड़काव न करें, स्प्रेयर अलग रखें, सुरक्षा कपड़े पहनें और छिड़काव के बाद अच्छी तरह साफ करें।

14. शाकनाशियों की क्रियाविधि (Mode of Action)

शाकनाशी का असर चार चरणों में होता है: अवशोषण (पत्ती, जड़ या तने से), स्थानांतरण (जाइलम में Apoplast या फ्लोएम में Symplast), क्रिया स्थल पर पहुँचना और विषाक्तता पैदा करना। इसके आधार पर शाकनाशियों को वर्गों में बाँटा जाता है।

क्रिया स्थलउदाहरण
प्रकाश संश्लेषण (PS II) रोधीएट्राजीन, डायूरॉन, आइसोप्रोट्यूरॉन
इलेक्ट्रॉन विपथक (PS I) और कोशिका झिल्ली को नष्ट करने वालेपैराक्वाट
ऑक्सिन जैसे (Growth regulators)2,4-D
ALS एंजाइम रोधीसल्फोनिलयूरिया, इमेज़ेथापायर, बिस्पायरिबैक-सोडियम
ACCase एंजाइम रोधी (वसा संश्लेषण)क्लोडिनाफॉप, फेनोक्साप्रॉप, पिनॉक्साडेन
EPSP सिंथेज रोधी (अमीनो अम्ल संश्लेषण)ग्लाइफोसेट
कोशिका विभाजन (माइक्रोट्यूब्यूल) रोधीपेंडीमेथालिन, ट्राइफ्लुरालिन
लंबी श्रृंखला वसा अम्ल संश्लेषण रोधीब्यूटाक्लोर, प्रेटिलाक्लोर, एलाक्लोर

15. शाकनाशियों की पौधों के प्रति चयनात्मकता (Selectivity)

चयनात्मकता का अर्थ है कि शाकनाशी खरपतवार को मारे और फसल को सुरक्षित रखे। यह निम्न कारणों से संभव होती है:

  • आकारिकी आधारित: घास की पत्तियाँ सीधी और संकरी होती हैं, इसलिए छिड़काव फिसल जाता है; वृद्धि बिंदु (Growing point) पत्तियों के बीच सुरक्षित रहता है।
  • शारीरिक आधारित: अवशोषण और स्थानांतरण में अंतर।
  • जैव रासायनिक आधारित (Metabolism): फसल शाकनाशी को शीघ्र निष्क्रिय कर देती है, जैसे मक्का एट्राजीन को निष्क्रिय कर लेती है।
  • स्थितिज (Positional) चयनात्मकता: गहरी जड़ वाली फसल और मिट्टी की ऊपरी परत में रुकने वाला अंकुरण-पूर्व शाकनाशी, जिससे फसल की जड़ें रसायन से बची रहती हैं।
  • मात्रा और समय: सही मात्रा और सही अवस्था पर प्रयोग।
  • सेफ़नर (Safener): ऐसा रसायन जो फसल को शाकनाशी से बचाता है, जैसे धान में प्रेटिलाक्लोर के साथ फेनक्लोरिम।

16. शाकनाशियों का भाग्य (Fate of Herbicides)

खेत में डालने के बाद शाकनाशी का क्या होता है, इसे भाग्य (Fate) कहते हैं। इसमें ये प्रक्रियाएँ शामिल हैं:

  • अधिशोषण (Adsorption): मृदा के कणों और जैविक पदार्थ से चिपकना।
  • निक्षालन (Leaching): पानी के साथ नीचे जाना, जिससे भूजल प्रदूषित हो सकता है।
  • वाष्पीकरण और प्रकाश अपघटन: उड़ना और सूर्य के प्रकाश से टूटना।
  • सूक्ष्मजीवी अपघटन: मृदा के जीवाणु और कवक द्वारा विघटन (सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया)।
  • बहाव (Run-off) और पौधों द्वारा अवशोषण।

अवशिष्ट प्रभाव (Persistence) को अर्धायु (Half-life, DT50) से मापा जाता है। लंबे समय तक रहने वाले शाकनाशी अगली संवेदनशील फसल को नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिसे कैरी-ओवर प्रभाव कहते हैं। यह मृदा की बनावट, जैविक पदार्थ, pH, तापमान और नमी पर निर्भर करता है।

17. एडजुवेंट की अवधारणा: सर्फेक्टेंट, स्थिरक, स्टिकर, एक्टिवेटर, अनुकूलता कारक और विलायक

एडजुवेंट (Adjuvant) वह पदार्थ है जिसे शाकनाशी में मिलाने से उसकी कार्यक्षमता बढ़ती है या गुणवत्ता सुधरती है।

प्रकारकार्य
सर्फेक्टेंट (Surfactant)सतही तनाव घटाकर फैलाव, गीलापन और पत्ती में प्रवेश बढ़ाना
स्थिरक (Stabilizing agents)घोल या इमल्शन को एक समान और स्थिर बनाए रखना (जैसे इमल्सीफायर, डिस्पर्सेंट)
स्टिकर (Sticker)पत्ती पर चिपकाव बढ़ाना, ताकि बारिश में धुल न जाए
एक्टिवेटर (Activator)शाकनाशी का अवशोषण बढ़ाना, जैसे अमोनियम सल्फेट, क्रॉप ऑयल कंसंट्रेट
अनुकूलता कारक (Compatibility agent)अलग-अलग रसायनों के मिश्रण को एकसार रखना
विलायक (Solvent)सक्रिय घटक को घोलने वाला माध्यम, जैसे पानी, जाइलीन, केरोसिन

18. जैव-शाकनाशी (Bio-herbicides) और कृषि में उनका उपयोग

जैव-शाकनाशी सजीव सूक्ष्मजीव (कवक, जीवाणु, विषाणु) या उनके उत्पाद हैं, जो खरपतवार को मारते हैं। जब कवक का उपयोग होता है तो उसे माइकोहर्बिसाइड कहते हैं।

  • Collego: कवक Colletotrichum gloeosporioides पर आधारित, धान में Aeschynomene के नियंत्रण के लिए।
  • DeVine: कवक Phytophthora palmivora पर आधारित, नींबू वर्गीय बाग में Morrenia odorata के लिए।
  • बायलाफॉस (Bialaphos): Streptomyces जीवाणु से मिलने वाला प्राकृतिक विषैला यौगिक।

लाभ: पर्यावरण के लिए सुरक्षित, विशिष्ट खरपतवार पर असर, रासायनिक अवशेष नहीं। सीमाएँ: संकीर्ण लक्ष्य, मौसम पर निर्भरता, धीमा असर, भंडारण की समस्या और अधिक लागत।

19. शाकनाशी मिश्रण की अवधारणा और कृषि में उपयोगिता

दो या अधिक शाकनाशियों को एक साथ प्रयोग करना शाकनाशी मिश्रण कहलाता है। यह टैंक मिक्स (किसान खुद मिलाए) या रेडी मिक्स (कंपनी द्वारा तैयार) हो सकता है।

  • लाभ: घास और चौड़ी पत्ती दोनों का एक साथ नियंत्रण, श्रम और समय की बचत, प्रतिरोधकता में देरी।
  • प्रभाव: योगात्मक (Additive), सहक्रियात्मक (Synergistic) या विरोधी (Antagonistic)।
  • उदाहरण: गेहूँ में क्लोडिनाफॉप + मेटसल्फ्यूरॉन; मक्का में एट्राजीन + पेंडीमेथालिन; धान में फेनोक्साप्रॉप + इथॉक्सीसल्फ्यूरॉन।

20. शाकनाशियों की अन्य कृषि रसायनों से अनुकूलता और उनका प्रयोग

किसान समय बचाने के लिए शाकनाशी को कीटनाशक, फफूंदनाशी या उर्वरक के साथ मिलाना चाहते हैं, परंतु हर मिश्रण सुरक्षित नहीं होता। अनुकूलता तीन प्रकार से विफल हो सकती है:

  • भौतिक असंगति: घोल में थक्के या तलछट बनना।
  • रासायनिक असंगति: रसायन आपस में प्रतिक्रिया कर निष्क्रिय या विषैले बन जाना।
  • जैविक असंगति: असर घटना (विरोध) या फसल को नुकसान।
जाँच और सावधानी: बड़े स्तर पर मिलाने से पहले छोटे बर्तन में जार टेस्ट करें और लेबल की सिफारिश देखें। टैंक में मिलाने का क्रम याद रखने के लिए सूत्र WALES है: Wettable powders, Agitate, Liquids, Emulsifiable concentrates, Surfactants।

21. एलीलोपैथी (Allelopathy) और खरपतवार प्रबंधन में इसका उपयोग

एलीलोपैथी शब्द मोलिश (Molisch, 1937) ने दिया। यह एक पौधे द्वारा छोड़े गए रसायनों (Allelochemicals) का दूसरे पौधे की वृद्धि पर हानिकारक (या लाभदायक) प्रभाव है। रसायन जड़ स्राव, पत्तियों से निक्षालन, वाष्पीकरण और अवशेष के सड़ने से निकलते हैं।

  • हानिकारक उदाहरण: गाजर घास (Parthenin), मोथा और यूकेलिप्टस का अन्य पौधों की वृद्धि घटाना।
  • लाभदायक उपयोग: ज्वार (सोरगोलीओन), सूरजमुखी और राई जैसी फसलों के अवशेष या मल्च से खरपतवार दबाना।
  • ज्वार का पानी का अर्क (Sorgaab): खरपतवार दबाने के लिए छिड़काव में प्रयोग।
  • सावधानी: कुछ फसलें अपने ही अगले पौधों को नुकसान पहुँचाती हैं (Autotoxicity), इसलिए फसल चक्र सोच-समझकर बनाएँ।

22. समन्वित खरपतवार प्रबंधन (IWM): एक परिचय

समन्वित खरपतवार प्रबंधन में निवारक, सस्य, यांत्रिक, जैविक और रासायनिक विधियों को मिलाकर इस तरह उपयोग किया जाता है कि खरपतवार आर्थिक हानि स्तर से नीचे रहें और लागत व पर्यावरण पर बोझ कम पड़े। इसमें किसी एक विधि पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जाता।

  • खरपतवार की प्रजाति, घनत्व और ETL की जानकारी।
  • मृदा, मौसम और फसल प्रणाली के अनुसार विधियों का चयन।
  • लंबी अवधि में बीज बैंक घटाना।

23. शाकनाशियों का गैर-रासायनिक विधियों से समन्वय और शाकनाशी प्रतिरोधकता

समन्वय के उदाहरण

  • अंकुरण-पूर्व शाकनाशी के साथ बुवाई के 30 से 35 दिन बाद एक निराई-गुड़ाई।
  • स्टेल सीडबेड के बाद कम मात्रा में शाकनाशी।
  • अंतरफसल या मल्चिंग के साथ शाकनाशी की कम खुराक।
  • फसल चक्र के साथ अलग-अलग क्रियाविधि वाले शाकनाशियों का बदल-बदल कर उपयोग।

शाकनाशी प्रतिरोधकता (Herbicide Resistance)

किसी खरपतवार आबादी की वह वंशानुगत क्षमता जिससे वह उस मात्रा को सहकर जीवित रहती है जो मूल आबादी को मार देती थी। लगातार एक ही शाकनाशी के प्रयोग से प्रतिरोधी जैव प्रकार (Biotype) चुन लिए जाते हैं। भारत में हरियाणा-पंजाब में गेहूँ के गुल्ली डंडे (Phalaris minor) में आइसोप्रोट्यूरॉन के प्रति प्रतिरोधकता 1990 के दशक की शुरुआत में सामने आई थी।

कारण / प्रकारप्रबंधन
लक्ष्य स्थल प्रतिरोधकता (Target-site)अलग क्रियाविधि वाले शाकनाशी चक्रानुसार बदलें
अलक्ष्य स्थल प्रतिरोधकता (Metabolic)शाकनाशी मिश्रण और IWM अपनाएँ
बार-बार एक ही शाकनाशी का प्रयोगफसल चक्र, सस्य विधियाँ और निराई जोड़ें; सही मात्रा और समय रखें

24. प्रमुख फसलों में खरपतवार प्रबंधन: धान, गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार और बाजरा

फसलप्रमुख खरपतवारसामान्य प्रबंधन (मात्रा सक्रिय घटक, प्रति हेक्टेयर)
धानसवाँ (Echinochloa), मोथा (Cyperus), फिम्ब्रिस्टाइलिस, लुडविगियाब्यूटाक्लोर या प्रेटिलाक्लोर (सेफ़नर सहित) रोपाई के कुछ दिन बाद; बिस्पायरिबैक-सोडियम (पश्च-अंकुरण); 2,4-D चौड़ी पत्ती और मोथा के लिए; पानी का स्तर और हाथ से निराई
गेहूँगुल्ली डंडा (Phalaris minor), जंगली जई, बथुआ, हिरनखुरी, सेंजी, चटरी-मटरीपेंडीमेथालिन (अंकुरण-पूर्व); क्लोडिनाफॉप, फेनोक्साप्रॉप, पिनॉक्साडेन या सल्फोसल्फ्यूरॉन (घास के लिए); 2,4-D या मेटसल्फ्यूरॉन (चौड़ी पत्ती के लिए); रोधी गुल्ली डंडे में शाकनाशी बदलें
जौगुल्ली डंडा, जंगली जई, बथुआ, हिरनखुरीपेंडीमेथालिन (अंकुरण-पूर्व); घास के लिए सलफोनिलयूरिया या ACCase रोधी शाकनाशी; चौड़ी पत्ती के लिए 2,4-D (सही अवस्था पर)
मक्कासवाँ, मकोय, इटसिट, मोथा, चौलाई, जंगली धनियाएट्राजीन (अंकुरण-पूर्व); टेंबोट्रायोन या मेसोट्रायोन (पश्च-अंकुरण); फसल अवशेष मल्च
ज्वारइटसिट, चौलाई, मकोय, स्ट्राइगा (परजीवी)एट्राजीन कम मात्रा में (अंकुरण-पूर्व); 2,4-D (सही अवस्था पर); स्ट्राइगा के लिए फसल चक्र और संक्रमित पौधे उखाड़ना
बाजरालहसुआ (Digera arvensis), भुरट (Cenchrus), इटसिट, मोथाएट्राजीन कम मात्रा में (अंकुरण-पूर्व); निराई-गुड़ाई 20 से 30 दिन पर; अंतरफसल जैसे बाजरा+मूँग

नोट: शाकनाशी की मात्रा, समय और ब्रांड स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या KVK की सिफारिश के अनुसार ही उपयोग करें। राजस्थान में गाजर घास, विलायती बबूल, मोथा, बेशरम और भुरट जैसे खरपतवार विशेष समस्या हैं।

प्रैक्टिकल की झलक (1 क्रेडिट)

  • खरपतवार संरक्षण (Weed preservation): पौधा इकट्ठा करना, दबाना (Pressing), सुखाना और शीट पर लगाना।
  • खरपतवार की पहचान, उनसे होने वाली हानि का अध्ययन और महत्वपूर्ण खरपतवारों का जीव विज्ञान।
  • शाकनाशी के फॉर्मूलेशन और मिश्रण का अध्ययन, कृषि रसायनों के साथ अनुकूलता की जाँच।
  • लंबी अवधि के प्रयोगों में खरपतवार वनस्पति का बदलाव (Weed flora shift)।
  • शाकनाशी प्रयोग की विधियाँ और स्प्रेयर उपकरणों का अध्ययन।

महत्वपूर्ण गणनाएँ

1. शाकनाशी की मात्रा (उत्पाद) = (आवश्यक a.i. किग्रा/हे. ÷ फॉर्मूलेशन में a.i. %) × 100
उदाहरण: पेंडीमेथालिन 30% EC से 1.0 किग्रा a.i./हे. देने के लिए = (1.0 ÷ 30) × 100 ≈ 3.33 किग्रा (या लगभग 3.3 लीटर) उत्पाद प्रति हेक्टेयर।

2. खरपतवार नियंत्रण दक्षता (WCE, %) = (WDMc − WDMt) ÷ WDMc × 100
जहाँ WDMc = नियंत्रित (बिना उपचार) प्लॉट में खरपतवार शुष्क भार; WDMt = उपचारित प्लॉट में।

3. खरपतवार सूचकांक (Weed Index, WI, %) = (X − Y) ÷ X × 100
जहाँ X = खरपतवार-मुक्त प्लॉट की उपज; Y = उपचारित प्लॉट की उपज।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)

  • खरपतवार: गलत जगह उगा पौधा। मोथा (Cyperus rotundus) को विश्व का सबसे बुरा खरपतवार माना जाता है।
  • सुषुप्तावस्था के प्रकार: जन्मजात, प्रेरित और अधिरोपित।
  • क्रांतिक अवस्था: वह समय जब खरपतवार से सबसे अधिक हानि होती है।
  • जैव नियंत्रण: गाजर घास के लिए Zygogramma; जलकुंभी के लिए Neochetina।
  • शाकनाशी मात्रा हमेशा a.i. में गिनी जाती है।
  • एलीलोपैथी शब्द: मोलिश (1937)।
  • PS II रोधी: एट्राजीन; ग्लाइफोसेट: EPSPS रोधी; पैराक्वाट: संपर्क शाकनाशी।
  • WCE और Weed Index के सूत्र याद रखें।
  • WALES: टैंक में मिलाने का क्रम।
  • प्रतिरोधकता: बार-बार एक ही शाकनाशी का उपयोग प्रमुख कारण।

महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)

Q1. अमरबेल (Cuscuta) किस प्रकार का खरपतवार है? (अ) जड़ परजीवी (ब) तना परजीवी (स) जलीय (द) घास कुल। उत्तर: ब

Q2. गाजर घास (Parthenium) के जैविक नियंत्रण में कौन सा कीट उपयोग होता है? (अ) Cactoblastis (ब) Neochetina (स) Zygogramma bicolorata (द) Dactylopius। उत्तर: स

Q3. एलीलोपैथी शब्द किसने दिया? (अ) मोलिश (ब) हार्पर (स) नटमैन (द) टॉर्न। उत्तर: अ

Q4. ग्लाइफोसेट का क्रिया स्थल कौन सा है? (अ) PS II (ब) ALS (स) ACCase (द) EPSP सिंथेज। उत्तर: द

Q5. गेहूँ का प्रमुख घासकुल खरपतवार कौन सा है? (अ) बथुआ (ब) गुल्ली डंडा (स) हिरनखुरी (द) जलकुंभी। उत्तर: ब

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: AGRON-313 कितने क्रेडिट का है?
उत्तर: 3 क्रेडिट (2+1), यानी 2 थ्योरी और 1 प्रैक्टिकल।

प्रश्न: इस कोर्स में कुल कितने लेक्चर हैं?
उत्तर: थ्योरी में 24 टॉपिक हैं और कुल 30 लेक्चर निर्धारित हैं।

प्रश्न: अंकुरण-पूर्व और अंकुरण-पश्चात शाकनाशी में क्या अंतर है?
उत्तर: अंकुरण-पूर्व शाकनाशी बुवाई के तुरंत बाद, खरपतवार उगने से पहले दिया जाता है; अंकुरण-पश्चात उगे हुए खरपतवार पर।

प्रश्न: चयनात्मक और अचयनात्मक शाकनाशी क्या हैं?
उत्तर: चयनात्मक शाकनाशी कुछ पौधों को मारता है और फसल को सुरक्षित रखता है; अचयनात्मक सभी हरे पौधों को नष्ट कर देता है।

प्रश्न: समन्वित खरपतवार प्रबंधन (IWM) क्यों जरूरी है?
उत्तर: इससे लागत घटती है, पर्यावरण सुरक्षित रहता है और शाकनाशी प्रतिरोधकता में देरी होती है।

प्रश्न: Weed Index क्या बताता है?
उत्तर: खरपतवार के कारण उपज में कितने प्रतिशत की कमी हुई, यह बताता है।

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संदर्भ पुस्तकें (Reference Books)

ओ.पी. गुप्ता, Weed Management: Principles and Practices; वी.एस. राव, Principles of Weed Science; R.L. Zimdahl, Fundamentals of Weed Science; ICAR-खरपतवार अनुसंधान निदेशालय, जबलपुर के प्रकाशन एवं ICAR e-course।

नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। पाठ्यक्रम का स्रोत: B.Sc. (Hons.) Agriculture का स्वीकृत सिलेबस। शाकनाशी की मात्रा, पंजीकृत उत्पाद और सिफारिशें समय-समय पर बदलती हैं, इसलिए खेत में प्रयोग से पहले स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय, KVK या नवीनतम सरकारी सिफारिश से जाँच लें।

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