मृदा एवं जल संरक्षण अभियांत्रिकी (Soil and Water Conservation Engineering, AENGG-121) B.Sc. (Hons.) Agriculture का 2 क्रेडिट (1+1) का कोर्स है। इसमें 13 टॉपिक और कुल 16 थ्योरी लेक्चर हैं। इसे समझने का सबसे आसान तरीका है एक बारिश की बूँद की यात्रा का पीछा करना: वह कहाँ गिरती है, मिट्टी को कैसे बहाती है, उसे कैसे रोका जाए, फिर कुएँ और नाले के पानी को पंप से कैसे उठाएँ, नापें और खेत तक टपक या फव्वारे से पहुँचाएँ। इस लेख की हर मंज़िल सिलेबस के टॉपिक नंबर के साथ जुड़ी है। सभी संख्यात्मक उदाहरण अभ्यास के लिए हैं।
पहली मंज़िल: आसमान से गिरती बूँद (टॉपिक 1, 2, 3)
मृदा अपरदन क्या है और क्यों होता है?
मृदा अपरदन (Soil erosion) पानी, हवा जैसे कारकों द्वारा मिट्टी के कणों के अलग होने, बहाकर ले जाने और कहीं जमा होने की प्रक्रिया है। प्राकृतिक या भूगर्भीय अपरदन धीमा होता है और मिट्टी बनने की गति से संतुलित रहता है, जबकि त्वरित अपरदन मानव गतिविधियों से कई गुना तेज होता है और नुकसान करता है।
- अपरदन के कारक (Agents): जल, पवन, गुरुत्व और बर्फ।
- कारण: वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, ढलान की दिशा में जुताई, झूम खेती, खेत की खुली सतह, निर्माण और खनन।
- भारत में मिट्टी के नुकसान का अनुमान लगभग 5300 मिलियन टन प्रतिवर्ष का (ध्रुवनारायण और बाबू, 1983) दिया जाता है। नवीनतम आँकड़े ICAR या NBSS&LUP से देखें।
जल अपरदन के रूप
| रूप | लक्षण |
|---|---|
| बूँद अपरदन (Splash) | बारिश की बूँद की चोट से कण टूटकर उछलते हैं; सतह पर पपड़ी बनती है, रिसाव घटता है |
| परतदार (Sheet) | पूरी सतह की पतली परत एकसमान बह जाना; अक्सर दिखता नहीं |
| धारा-नालिका (Rill) | छोटी नालियाँ (लगभग 30 सेमी से कम गहरी) जो सामान्य जुताई से मिट जाती हैं |
| अवनालिका (Gully) | गहरी और चौड़ी खाइयाँ जो सामान्य जुताई से नहीं भरतीं; खेत को टुकड़ों में बाँट देती हैं |
| अन्य | नदी तट का कटाव और भूस्खलन |
अपरदन को प्रभावित करने वाले कारक
- जलवायु: वर्षा की मात्रा, तीव्रता और बूँदों की गतिज ऊर्जा।
- भू-आकृति: ढलान की डिग्री और लंबाई।
- मृदा: बनावट, संरचना, जैविक पदार्थ और रिसाव दर (अपरदनशीलता)।
- वनस्पति आवरण: जड़ें मिट्टी को बाँधती हैं और पत्तियाँ बूँद की ऊर्जा सोखती हैं।
- मानव प्रबंधन: जुताई की दिशा, फसल पद्धति, चराई।
दूसरी मंज़िल: जब बूँद नाला बन गई (टॉपिक 4)
अवनालिका का वर्गीकरण
| आधार | वर्ग |
|---|---|
| गहराई | छोटी (लगभग 1 मी तक), मध्यम (1 से 5 मी) और बड़ी (5 मी से अधिक) |
| आकार | V-आकार, U-आकार और समलंब (Trapezoidal) |
| निरंतरता | सतत और असतत |
| सक्रियता | सक्रिय बनाम स्थिर (भरी हुई) |
अवनालिका नियंत्रण के उपाय
सिद्धांत: ऊपर से आने वाले पानी को मोड़ना, बहाव का वेग घटाना, अवनालिका के सिर (Gully head) को स्थिर करना और वनस्पति उगाना।
- वानस्पतिक उपाय: घास (जैसे अंजन घास, वेटिवर) और वृक्ष-झाड़ियाँ लगाना, अवनालिका की ढलानों को समतल करना।
- यांत्रिक उपाय: डायवर्जन ड्रेन या खाई (ऊपर के पानी को मोड़ने के लिए), चेक डैम (पत्थर, झाड़ी, तार-जाली, गैबियन, ईंट या मिट्टी के), ड्रॉप स्पिलवे, चूट स्पिलवे और ड्रॉप इनलेट।
- राजस्थान में चंबल क्षेत्र (कोटा, सवाई माधोपुर, करौली और धौलपुर) में बीहड़ों की समस्या गंभीर है। इसके लिए ICAR के CSWCRTI का कोटा केंद्र शोध करता है।
तीसरी मंज़िल: कितनी मिट्टी बही? सार्वत्रिक मृदा क्षति समीकरण (टॉपिक 5)
USLE (Wischmeier और Smith, 1978) सतह और धारा-नालिका अपरदन से औसत वार्षिक मिट्टी की हानि का अनुमान लगाता है:
A = मृदा हानि (टन/हे./वर्ष); R = वर्षा अपरदनशीलता कारक (EI30); K = मृदा अपरदनशीलता कारक; L = ढलान लंबाई कारक; S = ढलान की तीव्रता का कारक; C = फसल और आवरण प्रबंधन कारक; P = संरक्षण पद्धति कारक।
मानक प्लॉट: लगभग 22.1 मीटर लंबा, 9% ढलान वाला, लगातार परती और ढलान की दिशा में जुता हुआ।
A = 5000 × 0.03 × 1.5 × 0.3 × 0.5 = 33.75 टन/हे./वर्ष। यदि सहनीय हानि 10 टन/हे./वर्ष हो, तो हानि बहुत अधिक है और संरक्षण उपाय (C और P घटाना) जरूरी हैं।
सीमाएँ: यह अवनालिका अपरदन नहीं मापता, एक औसत वार्षिक अनुमान है और प्रत्येक तूफान की हानि नहीं बताता। संशोधित रूप MUSLE और RUSLE हैं।
चौथी मंज़िल: खेत में बूँद को रोकना (टॉपिक 6)
समोच्च खेती (Contouring) और पट्टीदार खेती
- समोच्च खेती: जुताई और बुवाई ढलान के आर-पार, समान ऊँचाई की रेखा पर। हर कूँड़ छोटा बंध बनकर पानी रोकता है।
- पट्टीदार खेती (Strip cropping): एक पट्टी में अपरदन करने वाली फसल (बाजरा, मक्का) और उसके बाद अपरदन रोकने वाली घनी फसल (मूँग, मोठ, घास)। प्रकार: समोच्च पट्टी, खेत-पट्टी और पवन-पट्टी।
समोच्च बंध (Contour bund)
कम वर्षा वाले, पारगम्य मृदा वाले और लगभग 2 से 6% ढलान के क्षेत्र में ढलान के आर-पार मेड़ बनाकर वर्षा जल को खेत में रोका जाता है। ऊर्ध्वाधर अंतराल (VI) की रामसर विधि:
उदाहरण 2: S = 4% हो तो VI = 0.3 × (4 ÷ 3 + 2) = 0.3 × 3.33 = 1.0 मीटर; HI = 1.0 ÷ 4 × 100 = 25 मीटर।
प्रति हेक्टेयर बंध की लंबाई = 10,000 ÷ 25 = 400 मीटर।
मिट्टी का आयतन: शीर्ष चौड़ाई 0.3 मी, ऊँचाई 0.45 मी और पार्श्व ढलान 1.5 : 1 हो, तो तल की चौड़ाई = 0.3 + 2 × 1.5 × 0.45 = 1.65 मी; काट-क्षेत्र = (0.3 + 1.65) ÷ 2 × 0.45 = 0.439 मी²।
कुल मिट्टी = 0.439 × 400 ≈ 175.5 घन मी/हे.
श्रेणीबद्ध बंध (Graded bund) और बेंच टैरेस
| संरचना | कब उपयोगी | मुख्य बात |
|---|---|---|
| श्रेणीबद्ध बंध | अधिक वर्षा (लगभग 600 मिमी से अधिक) या कम रिसाव वाली (चिकनी या काली) मृदा | बंध के साथ चैनल का हल्का ढलान (लगभग 0.2 से 0.5%) रखा जाता है, ताकि अतिरिक्त पानी सुरक्षित रूप से घास वाले जलमार्ग तक पहुँचे |
| बेंच टैरेस (सीढ़ीदार खेत) | तीव्र ढलान, सामान्यतः लगभग 10 से 33% | ढलान को समतल सीढ़ियों में बदलना। प्रकार: समतल, भीतर की ओर ढालू (अधिक वर्षा व कम पारगम्य मृदा) और बाहर की ओर ढालू (कम वर्षा, पारगम्य मृदा) |
घास के जलमार्ग (Grassed waterways)
प्राकृतिक या कृत्रिम ढलान वाले चैनल जिनमें घास उगाकर अतिरिक्त वर्षा जल को बिना कटाव के बाहर निकाला जाता है। आकार: परवलयाकार, त्रिभुजाकार और समलंब। घास: दूब, अंजन घास, वेटिवर आदि। वेग की गणना मैनिंग समीकरण से: V = (1/n) × R2/3 × S1/2। घास के चैनल में अनुमत वेग घास और ढलान के अनुसार लगभग 1.5 से 2.5 मी/से. तक माना जाता है।
पाँचवीं मंज़िल: जल संचयन (टॉपिक 7)
खेत में (In-situ): बंध, ट्रेंच, कूँड़ और टाइड रिज। खेत से बाहर (Ex-situ): फार्म पोंड, चेक डैम, परकोलेशन टैंक और नाला बंध। शुष्क क्षेत्रों में टांका, कुंड और खड़ीन परंपरागत विधियाँ हैं।
उदाहरण 3: C = 0.4, i = 60 मिमी/घंटा और A = 20 हे. हो, तो Q = 0.4 × 60 × 20 ÷ 360 = 1.33 m³/से. (संरचना का डिज़ाइन इसी अधिकतम बहाव पर किया जाता है।)
फार्म पोंड का आयतन (छिन्नक): V = (h ÷ 3) × [A1 + A2 + √(A1 × A2)]
छठी मंज़िल: जब हवा ने मिट्टी उठाई (टॉपिक 8)
पवन अपरदन का सिद्धांत
पवन अपरदन शुष्क, ढीली और बिना वनस्पति वाली मृदा में होता है। इसकी तीन अवस्थाएँ: शुरुआत (वेग एक सीमा से अधिक होने पर कण हिलना), परिवहन और जमाव। कण तीन तरह से चलते हैं:
| गति का प्रकार | विवरण |
|---|---|
| उछाल (Saltation) | कण छोटी छलाँग लगाकर चलते हैं; सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग आधे से अधिक) |
| सतही सरकाव (Surface creep) | बड़े कण सतह पर लुढ़कते हैं |
| निलंबन (Suspension) | बहुत महीन कण हवा में दूर तक उड़ते हैं, जिससे धूल भरी आँधी बनती है |
लगभग 0.1 से 0.15 मिमी व्यास के कण सबसे आसानी से उड़ते हैं। पवन अपरदन समीकरण (WEQ): E = f(I, K, C, L, V), जहाँ I मृदा अपरदनशीलता, K खुरदरापन, C जलवायु, L खुले खेत की लंबाई और V वनस्पति आवरण है।
नियंत्रण के सिद्धांत और उपाय
- सिद्धांत: सतह पर हवा की गति घटाना, सतह का खुरदरापन बढ़ाना, मृदा नम रखना और आवरण बनाना।
- वानस्पतिक: वायु अवरोधक (Windbreak) और आश्रय पट्टी (Shelterbelt), पट्टीदार खेती और आवरण फसलें। राजस्थान में खेजड़ी, रोहिड़ा, कीकर या बबूल (Acacia tortilis) और फोग जैसी प्रजातियाँ काम आती हैं। आश्रय पट्टी की सुरक्षा दूरी पेड़ की ऊँचाई की लगभग 10 से 20 गुना मानी जाती है।
- यांत्रिक: अवशेष (Stubble) मल्च, खुरदरी जुताई और ढेले बनाना, रेत के टीलों पर काँटेदार बाड़ या रेत अवरोध।
- रासायनिक: मृदा स्थिरीकरण पदार्थ (सीमित, महँगे)।
- इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में रेत के टीलों का स्थिरीकरण और वृक्षारोपण भी इसी का हिस्सा है।
सातवीं मंज़िल: पानी को ऊपर उठाना, अपकेंद्री पंप (टॉपिक 9, 10)
अपकेंद्री पंप (Centrifugal pump)
सिद्धांत: घूमता हुआ इम्पेलर पानी को अपकेंद्री बल से बाहर फेंकता है। इम्पेलर के केंद्र (Eye) पर निम्न दाब बनता है और वायुमंडलीय दाब से पानी चूषण पाइप से ऊपर आता है। घूर्णन से मिली गति (वेग) को केसिंग दाब में बदल देता है।
| केसिंग का प्रकार | विवरण |
|---|---|
| वॉल्यूट (Volute) | इम्पेलर के चारों ओर घोंघे जैसी सर्पिल केसिंग, जिसका क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ता है और वेग को दाब में बदलता है |
| डिफ्यूज़र (Diffuser / टरबाइन पंप) | इम्पेलर के चारों ओर स्थिर गाइड वेन, जो पानी को धीरे-धीरे दिशा देकर दाब में बदलते हैं |
मुख्य भाग: इम्पेलर, केसिंग, शाफ्ट, चूषण पाइप के साथ फुट वाल्व और स्ट्रेनर, तथा निकास पाइप। चालू करने से पहले प्राइमिंग (पंप को पानी से भरना) जरूरी है। प्रकार: एकल और बहु-चरण, एक और दो चूषण वाले, क्षैतिज, ऊर्ध्वाधर और सबमर्सिबल।
पंप से जुड़ी शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| क्षमता (Capacity) | प्रति इकाई समय में पंप द्वारा दिया गया जल (लीटर/सेकंड) |
| चूषण उत्थान (Suction lift) | पानी के तल से पंप के केंद्र तक की ऊर्ध्वाधर ऊँचाई |
| निकास शीर्ष (Discharge head) | पंप के केंद्र से निकास बिंदु तक की ऊर्ध्वाधर ऊँचाई |
| स्थैतिक शीर्ष | चूषण उत्थान + निकास शीर्ष |
| घर्षण शीर्ष (Friction head) | पाइप और फिटिंग में घर्षण से हुई हानि |
| वेग शीर्ष (Velocity head) | V² ÷ 2g |
| दाब शीर्ष (Pressure head) | निकास पर आवश्यक दाब (जैसे स्प्रिंकलर) |
| कुल शीर्ष (Total head) | स्थैतिक शीर्ष + घर्षण शीर्ष + वेग शीर्ष (+ दाब शीर्ष) |
| NPSH | शुद्ध धनात्मक चूषण शीर्ष, जिससे कैविटेशन (पानी में वाष्प के बुलबुले बनने) से बचाव होता है |
| अधिकतम व्यावहारिक चूषण उत्थान | समुद्र तल पर सैद्धांतिक लगभग 10.3 मी, पर घर्षण आदि के कारण व्यवहार में लगभग 6 से 7 मी |
जल अश्वशक्ति (WHP) = Q (लीटर/से.) × H (मी) ÷ 75
शाफ्ट अश्वशक्ति (SHP) = WHP ÷ पंप की दक्षता
ब्रेक अश्वशक्ति (BHP) = SHP ÷ संचरण (ड्राइव) दक्षता
विद्युत मोटर की इनपुट (kW) = BHP × 0.746 ÷ मोटर दक्षता
उदाहरण 4 (कुल शीर्ष): चूषण उत्थान 4 मी, निकास शीर्ष 18 मी, पाइप में f = 0.02, L = 50 मी, D = 0.1 मी और V = 2 मी/से. हो, तो
घर्षण शीर्ष hf = f × L × V² ÷ (2g × D) = 0.02 × 50 × 4 ÷ (2 × 9.81 × 0.1) = 2.04 मी
वेग शीर्ष = 4 ÷ 19.62 = 0.20 मी
कुल शीर्ष = 4 + 18 + 2.04 + 0.20 = 24.24 मी
उदाहरण 5 (अश्वशक्ति): Q = 20 लीटर/से., कुल शीर्ष = 25 मी, पंप दक्षता = 65% और ड्राइव दक्षता = 90% हो, तो
WHP = 20 × 25 ÷ 75 = 6.67 hp; SHP = 6.67 ÷ 0.65 = 10.26 hp; BHP = 10.26 ÷ 0.90 = 11.4 hp
आठवीं मंज़िल: सिंचाई जल का मापन (टॉपिक 11)
| विधि | सूत्र और उपयोग |
|---|---|
| आयतन विधि | बर्तन भरने में लगे समय से; छोटे प्रवाह (नलकूप, ड्रिप) के लिए। Q = आयतन ÷ समय |
| वेग-क्षेत्रफल विधि | Q = A × V; वेग तैरते पिंड (Float) या करंट मीटर से |
| जल मीटर | पाइप में लगे प्रोपेलर प्रकार के मीटर से कुल आयतन का सीधा मापन |
| आयताकार वियर | Q = 1.84 (L − 0.2H) H3/2 (दो अंतिम संकुचन सहित, Q = m³/से.) |
| सिपोलेटी वियर | समलंब आकार का (पार्श्व ढलान 1 क्षैतिज : 4 ऊर्ध्वाधर); Q = 1.86 L H3/2 |
| 90° V-नॉच | कम प्रवाह के सटीक मापन के लिए; Q = 1.417 H5/2 |
(क) 20 लीटर की बाल्टी 8 सेकंड में भरी: Q = 20 ÷ 8 = 2.5 लीटर/से.
(ख) नाली की चौड़ाई 0.5 मी, पानी की गहराई 0.3 मी और औसत वेग 0.4 मी/से.: Q = 0.5 × 0.3 × 0.4 = 0.06 m³/से. = 60 लीटर/से.
(ग) आयताकार वियर L = 0.6 मी, H = 0.15 मी: Q = 1.84 × (0.6 − 0.03) × 0.151.5 = 1.84 × 0.57 × 0.0581 = 0.0609 m³/से. ≈ 60.9 लीटर/से.
(घ) 90° V-नॉच H = 0.10 मी: Q = 1.417 × 0.12.5 = 1.417 × 0.00316 = 0.00448 m³/से. = 4.48 लीटर/से.
(ङ) 1 हेक्टेयर में 6 सेमी गहराई का पानी देना हो, तो आयतन = 0.06 × 10,000 = 600 m³। (ख) के 60 लीटर/से. प्रवाह से समय = 600 ÷ 0.06 = 10,000 से. ≈ 2.78 घंटे।
नौवीं मंज़िल: खेत तक सटीक पहुँच, टपक और फव्वारा (टॉपिक 12, 13)
टपक सिंचाई (Drip irrigation)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| उपयुक्तता | चौड़ी दूरी की फसलें (बाग, सब्जी, कपास, गन्ना), पानी की कमी वाले क्षेत्र, रेतीली मृदा, ऊबड़-खाबड़ भूमि और खारा पानी |
| सीमाएँ | शुरुआती लागत अधिक, छिद्र बंद होना (Clogging), नमकीन जल में लवण जमा होना, कृंतकों से नुकसान और तकनीकी देखभाल की आवश्यकता |
| घटक | पंप और हेड वर्क्स (छन्नी, ग्रेवल या मीडिया फिल्टर, हाइड्रोसाइक्लोन, फर्टिगेशन यूनिट जैसे वेन्चुरी, प्रेशर रेगुलेटर, वाल्व), मुख्य और उप-मुख्य पाइप (PVC), लैटरल (LLDPE, 12 से 16 मिमी), ड्रिपर या एमिटर (2, 4, 8 लीटर/घंटा) और कनेक्टर |
| खाका (Layout) | मुख्य लाइन → उप-मुख्य → लैटरल (पौधों की पंक्तियों में) → एमिटर; संचालन दाब सामान्यतः लगभग 1 से 1.5 kg/cm² |
फव्वारा सिंचाई (Sprinkler irrigation)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| उपयुक्तता | रेतीली और अधिक रिसाव वाली मृदा, ऊबड़-खाबड़ ज़मीन, कम गहरी मृदा और घनी बुवाई की फसलें (गेहूँ, सरसों, चना, बाजरा) |
| सीमाएँ | हवा में पानी का बहकना, ऊँची ऊर्जा और प्रारंभिक लागत, चिकनी मृदा में जलभराव का जोखिम, खारे पानी से पत्ती झुलसना और लंबी फसलों में कठिनाई |
| प्रकार | पोर्टेबल, अर्ध-स्थायी, स्थायी और ठोस-सेट; घूमता सिर वाला, छिद्रित पाइप, रेन गन, ट्रैवलिंग गन और सेंटर पिवोट |
| घटक | पंप, मुख्य व उप-मुख्य पाइप, लैटरल, राइज़र, स्प्रिंकलर हेड (नोज़ल), कप्लर, बेंड और वाल्व |
| खाका | वर्गाकार या त्रिभुजाकार लेआउट; सामान्य दूरी लगभग 12 मी × 12 मी और संचालन दाब लगभग 2.5 से 3.5 kg/cm² |
अनुप्रयोग दर = 1.2 ÷ (12 × 12) = 0.00833 मी/घंटा = 8.33 मिमी/घंटा (यह मृदा की रिसाव दर से कम होनी चाहिए)।
40 मिमी पानी देने का समय = 40 ÷ 8.33 ≈ 4.8 घंटे।
उदाहरण 8: टपक बाग में पौधे 6 मी × 6 मी की दूरी पर हैं, ETc = 5 मिमी/दिन और भीगा हुआ क्षेत्र 40% है।
पौधे के लिए पानी = 36 × 5 × 0.4 = 72 लीटर/दिन (1 मिमी × 1 मी² = 1 लीटर)।
प्रति पौधे 4 ड्रिपर × 4 लीटर/घंटा = 16 लीटर/घंटा, इसलिए चलाने का समय = 72 ÷ 16 = 4.5 घंटे।
प्रैक्टिकल की झलक (1 क्रेडिट)
- भारत और राजस्थान में मृदा संरक्षण की स्थिति: भारत में जल अपरदन और राजस्थान में मुख्यतः पवन अपरदन (पश्चिम) व चंबल बीहड़ (दक्षिण-पूर्व); संबंधित कार्यक्रम जैसे नदी घाटी परियोजना, NWDPRA, IWMP और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना।
- अपरदन सूचकांक: EI30 = E × I30। सूत्र (Foster आदि): e = 0.119 + 0.0873 log10 I (MJ/हे./मिमी)।
- मिट्टी की हानि का आकलन और मापन: अपवाह प्लॉट (22.1 मी × 1.83 मी), बहाव और अवसाद का नमूना।
- समोच्च मानचित्र बनाना और समोच्च बंध व श्रेणीबद्ध बंध का डिज़ाइन।
- पवन अपरदन की समस्याएँ, पंप के घर्षण शीर्ष, वेग शीर्ष, कुल शीर्ष और अश्वशक्ति की गणना।
- खेत में सिंचाई जल के मापन की विभिन्न विधियाँ, टपक व फव्वारा तंत्र के घटकों का अध्ययन और जलागम क्षेत्र का अध्ययन।
e = 0.119 + 0.0873 × log10 25 = 0.119 + 0.0873 × 1.398 = 0.241 MJ/हे./मिमी
E = 0.241 × 50 = 12.05 MJ/हे.; EI30 = 12.05 × 40 = 482 MJ·मिमी/(हे.·घंटा)
उदाहरण 10: मृदा हानि का मापन एक हेक्टेयर के बराबर प्लॉट से 120 m³ बहाव आया और अवसाद की सांद्रता 5 ग्राम/लीटर थी, तो
मिट्टी की हानि = 120,000 लीटर × 5 ग्राम = 600 किग्रा = 0.6 टन/हे.
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1. USLE में कौन-कौन से कारक होते हैं?
A = R × K × L × S × C × P।2. रिल और गली में मुख्य अंतर क्या है?
रिल (लगभग 30 सेमी से कम गहरी) सामान्य जुताई से मिट जाती है; गली (अवनालिका) नहीं मिटती।3. श्रेणीबद्ध बंध कब बनाया जाता है?
अधिक वर्षा या कम रिसाव वाली मृदा में, जहाँ अतिरिक्त पानी को सुरक्षित रूप से बाहर निकालना है।4. पंप की कुल शीर्ष कैसे निकालते हैं?
स्थैतिक शीर्ष + घर्षण शीर्ष + वेग शीर्ष (+ दाब शीर्ष)।5. 90° V-नॉच का सूत्र क्या है?
Q = 1.417 H5/2 (m³/से.)।6. फव्वारा किन फसलों के लिए अधिक उपयुक्त है?
घनी बुवाई की फसलें जैसे गेहूँ, सरसों, चना और बाजरा।अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: AENGG-121 कितने क्रेडिट का है?
उत्तर: 2 क्रेडिट (1+1), जिसमें 13 थ्योरी टॉपिक और कुल 16 लेक्चर हैं।
प्रश्न: मृदा अपरदन के मुख्य कारक कौन से हैं?
उत्तर: जल और पवन मुख्य कारक हैं; गुरुत्व और बर्फ भी भूमिका निभाते हैं।
प्रश्न: टपक और फव्वारा में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: टपक में पानी सीधे जड़ क्षेत्र में बूँद-बूँद दिया जाता है (कम दाब पर), जबकि फव्वारे में पानी वर्षा की तरह छिड़का जाता है (अधिक दाब पर)।
प्रश्न: अपकेंद्री पंप में प्राइमिंग क्यों करते हैं?
उत्तर: ताकि केसिंग और चूषण पाइप पानी से भरे रहें; हवा होने पर पंप पानी नहीं खींच पाता।
प्रश्न: परीक्षा में सबसे ज़्यादा किन सूत्रों से संख्यात्मक प्रश्न आते हैं?
उत्तर: USLE, ऊर्ध्वाधर अंतराल (VI), पंप की अश्वशक्ति, वियर और V-नॉच का प्रवाह और स्प्रिंकलर की अनुप्रयोग दर।
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संदर्भ पुस्तकें
माइकल एवं ओझा, Principles of Agricultural Engineering, Vol. II; आर. सुरेश, Soil and Water Conservation Engineering; वी.वी.एन. मूर्ति, Land and Water Management Engineering, कल्याणी प्रकाशक; श्वाब आदि, Soil and Water Conservation Engineering, Wiley; विशमेयर एवं स्मिथ (1978), Predicting Rainfall Erosion Losses, USDA Handbook 537।
लेखक की टिप्पणी: सभी संख्यात्मक उदाहरण अभ्यास के लिए गढ़े गए हैं। सूत्रों की नियतांक (जैसे रामसर के नियतांक, वियर के गुणांक) और ढलान सीमाएँ अलग-अलग पाठ्यपुस्तकों में थोड़ी भिन्न हो सकती हैं, इसलिए अपने विश्वविद्यालय की पुस्तक से मिलान कर लें। भारत में मृदा हानि के आँकड़े और सरकारी योजनाओं की वर्तमान स्थिति प्रकाशित करने से पहले नवीनतम स्रोत से जाँच लें।
