जैविक खेती के सिद्धांत (Principles of Organic Farming, AGRON-322) B.Sc. (Hons.) Agriculture का 2 क्रेडिट (1+1) का कोर्स है, यानी 1 क्रेडिट थ्योरी और 1 क्रेडिट प्रैक्टिकल। रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा स्वास्थ्य, जल और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहे असर के कारण जैविक खेती की माँग तेजी से बढ़ी है। इस विषय में आप जैविक खेती के सिद्धांत, पोषक तत्वों के जैविक स्रोत, कीट-रोग-खरपतवार प्रबंधन, NPOP के अंतर्गत प्रमाणीकरण और निर्यात की संभावनाएँ सीखते हैं। इस लेख में सिलेबस के सभी 12 टॉपिक (कुल 16 लेक्चर) आसान हिंदी में समझाए गए हैं, ताकि परीक्षा, ICAR JRF, कृषि पर्यवेक्षक और राजस्थान की कृषि परीक्षाओं की तैयारी आसान हो।
1. जैविक खेती, इसके सिद्धांत और भारत में दायरा
जैविक खेती (Organic Farming) वह उत्पादन पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरक, कृत्रिम कीटनाशक, शाकनाशी, वृद्धि नियामक और आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) जीवों का उपयोग नहीं होता। इसकी जगह जैविक खाद, फसल चक्र, जैविक नियंत्रण और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके मृदा की उर्वरता और पारिस्थितिकी का संतुलन बनाए रखा जाता है। इसे संक्षेप में "मिट्टी को खिलाओ, पौधे को नहीं" कहा जाता है।
जैविक खेती के प्रमुख सिद्धांत (IFOAM)
| सिद्धांत | अर्थ |
|---|---|
| स्वास्थ्य (Health) | मृदा, पौधे, पशु, मनुष्य और पृथ्वी का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़ा है |
| पारिस्थितिकी (Ecology) | खेती प्राकृतिक चक्रों और जीवित पारितंत्र पर आधारित हो |
| निष्पक्षता (Fairness) | पर्यावरण और सभी हितधारकों के साथ न्यायपूर्ण संबंध |
| देखभाल (Care) | वर्तमान और भावी पीढ़ियों के हित को ध्यान में रखकर सावधानी से प्रबंधन |
इतिहास के प्रमुख नाम
- सर अल्बर्ट हॉवर्ड: जैविक खेती के जनक माने जाते हैं; इंदौर (भारत) में कम्पोस्ट बनाने की इंदौर विधि विकसित की।
- रूडोल्फ स्टाइनर: जैव-गतिक (Biodynamic) खेती के प्रवर्तक (1924)।
- लेडी ईव बालफोर: इंग्लैंड में सॉइल एसोसिएशन की संस्थापक।
- मसानोबू फुकुओका: प्राकृतिक खेती (Do-nothing farming) के प्रवर्तक।
- सुभाष पालेकर: शून्य बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) के प्रचारक।
भारत में दायरा (Scope)
- भारत में परंपरागत रूप से कम रसायन वाली खेती का बड़ा क्षेत्र है, जिसे जैविक में बदलना अपेक्षाकृत आसान है। वर्षा आधारित और जनजातीय क्षेत्र प्राकृतिक रूप से कम इनपुट उपयोग करते हैं।
- भारत में जैविक उत्पादकों की संख्या विश्व में सबसे अधिक में गिनी जाती है।
- सिक्किम 2016 में पूरी तरह जैविक घोषित होने वाला पहला राज्य बना।
- घरेलू और निर्यात बाजार दोनों में अवसर हैं, जैसे मसाले, चाय, तिलहन, अनाज, दलहन, कपास और औषधीय पौधे। राजस्थान में जीरा, मेथी, धनिया, इसबगोल और ग्वार जैसी फसलों की जैविक संभावना है।
2. जैविक कृषि के प्रोत्साहन के लिए सरकार (केंद्र/राज्य), NGO और अन्य संगठनों की पहलें
| पहल | विवरण |
|---|---|
| NPOP (2001) | जैविक उत्पादन का राष्ट्रीय कार्यक्रम; वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत APEDA द्वारा संचालित; निर्यात के लिए प्रमाणीकरण का ढाँचा |
| NPOF (2004) | राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, कृषि मंत्रालय; गाज़ियाबाद स्थित केंद्र (अब राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र) |
| परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY, 2015) | क्लस्टर आधारित जैविक खेती, PGS-India प्रमाणीकरण और विपणन सहायता |
| MOVCDNER | पूर्वोत्तर क्षेत्र में जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन |
| PGS-India (2011) | सहभागी गारंटी प्रणाली; स्थानीय बाजार के लिए कम खर्चीला प्रमाणीकरण |
| जैविक खेती पोर्टल | किसानों, उत्पादकों और खरीदारों को जोड़ने वाला पोर्टल |
| राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन | प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हाल की केंद्रीय योजना (वर्तमान स्थिति सरकारी स्रोत से जाँच लें) |
| राज्य सरकारें | सिक्किम जैविक मिशन; अनेक राज्यों की जैविक नीतियाँ, प्रशिक्षण और अनुदान |
| NGO और संस्थाएँ | नवधान्या, विभिन्न किसान संगठन, KVK, ICAR संस्थान और कृषि विश्वविद्यालय |
3. जैविक पारितंत्र और इसकी अवधारणाएँ
जैविक खेत एक जीवित पारितंत्र (Agro-ecosystem) की तरह देखा जाता है जिसमें मृदा के सूक्ष्मजीव, केंचुए, पौधे, पशु, लाभकारी कीट और मनुष्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
- जैव विविधता: विविध फसलें, पेड़, मेड़ पर वनस्पति और लाभकारी कीट प्रकृति में संतुलन बनाए रखते हैं।
- मृदा एक जीवित तंत्र: सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थ को पौधों के लिए उपलब्ध पोषक तत्वों में बदलते हैं।
- पोषक तत्व चक्र: खेत के अवशेष, पशु अपशिष्ट और दलहनी फसलें खेत के भीतर ही पोषण चक्र बनाती हैं।
- प्राकृतिक कीट नियंत्रण: शत्रु कीट के प्राकृतिक शत्रुओं को संरक्षण देना।
- फसल-पशु एकीकरण: पशुपालन से गोबर-खाद और खेत से चारा, यानी बंद चक्र।
- रूपांतरण काल (Conversion period): NPOP के अनुसार एकवर्षीय फसलों के लिए सामान्यतः 2 वर्ष और बहुवर्षीय फसलों के लिए 3 वर्ष की अवधि, जिसमें जैविक विधि अपनाई जाती है पर उत्पाद "जैविक" नहीं बिकता।
- बफर क्षेत्र और समानांतर उत्पादन पर नियंत्रण: पड़ोसी रासायनिक खेतों से बहाव या छिड़काव से बचाव के लिए बफर ज़ोन रखना।
4. जैविक पोषक तत्व स्रोत और उनका सुदृढ़ीकरण (Fortification)
| स्रोत | उदाहरण और विशेषता |
|---|---|
| भारी जैविक खाद | गोबर खाद (FYM, लगभग 0.5% N), कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, मुर्गी खाद, बायोगैस स्लरी |
| हरी खाद | ढैंचा, सनई, लोबिया, ग्वार; मृदा में नाइट्रोजन और जैविक पदार्थ बढ़ाते हैं |
| खली (Oil cakes) | नीम खली (लगभग 5% N, कीट-नियंत्रक गुण), मूँगफली खली, सरसों खली |
| फसल अवशेष | पुआल, भूसा, गन्ने की पत्ती का मल्च या कम्पोस्ट |
| जैव-उर्वरक | राइज़ोबियम, एज़ोटोबैक्टर, एज़ोस्पाइरिलम, PSB, एज़ोला, नील हरित शैवाल, माइकोराइज़ा |
| प्राकृतिक खनिज | रॉक फॉस्फेट, जिप्सम, चूना पत्थर, हड्डी का चूर्ण (अनुमति के अनुसार) |
| तरल जैविक इनपुट | पंचगव्य, जीवामृत, बीजामृत, वर्मीवाश, समुद्री शैवाल अर्क |
सुदृढ़ीकरण (Fortification / Enrichment)
जैविक खाद में पोषक तत्व कम सांद्रता में होते हैं, इसलिए उन्हें बढ़ाने के लिए सुदृढ़ किया जाता है। जैसे फॉस्फो-कम्पोस्ट (कम्पोस्ट में रॉक फॉस्फेट और PSB मिलाना), वर्मीकम्पोस्ट या FYM में जैव-उर्वरक मिलाना और नीम खली से लेपित जैविक खाद। इससे पोषक तत्वों की उपलब्धता और खाद की गुणवत्ता दोनों बढ़ती हैं।
5. जैविक खेती में पोषक तत्वों के उपयोग पर प्रतिबंध
- प्रतिबंधित: यूरिया, DAP, MOP जैसे कृत्रिम रासायनिक उर्वरक, सीवेज स्लज, मानव मल का खाने योग्य फसलों पर प्रयोग, और GM आधारित इनपुट।
- सीमित और अनुमति सहित: रॉक फॉस्फेट, जिप्सम, चूना, कुछ खनिज स्रोत और कम घुलनशील प्राकृतिक पदार्थ। इनके लिए प्रमाणन एजेंसी की अनुमति और मानकों का पालन जरूरी है।
- अनिवार्य सावधानी: कच्ची गोबर खाद सीधे सब्जी जैसी फसलों में न दें; कम्पोस्ट को पूरी तरह सड़ाकर और रोगाणु-मुक्त करके दें।
- बाहरी स्रोत: बाहर से लाई गई खाद या खली की जाँच करें कि उसमें रसायन या भारी धातु के अवशेष न हों।
- हर इनपुट का रिकॉर्ड, खरीद-बिल और उपयोग का हिसाब रखें, क्योंकि निरीक्षण में इसकी जाँच होती है।
6. जैविक खेती में फसलों और किस्मों का चयन
- स्थानीय जलवायु और मृदा के अनुकूल, रोग-कीट सहनशील देशी या उन्नत किस्में चुनें।
- जैविक रूप से उत्पादित बीज का उपयोग करें; बीज उपलब्ध न होने पर प्रमाणन एजेंसी की अनुमति से रसायन-रहित उपचारित बीज लें। GM बीज निषिद्ध हैं।
- फसल चक्र और दलहनी फसलें: अनाज के बाद दलहन (चना, मूँग, मोठ) से नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है।
- अंतरफसल और मिश्रित खेती: बाजरा+मूँग-मोठ, सरसों+चना जैसी प्रणालियाँ कीट-रोग का जोखिम घटाती हैं।
- कम पानी चाहने वाली और स्थानीय बाजार माँग वाली फसलें प्राथमिकता से चुनें, जैसे राजस्थान में बाजरा, ग्वार, जीरा और मसाले।
7. जैविक खेती में कीट और रोग प्रबंधन के मूल सिद्धांत
रोकथाम पर जोर दिया जाता है और रसायन के बजाय कई स्तर की रणनीति अपनाई जाती है।
| स्तर | उपाय |
|---|---|
| सस्य (Cultural) | गर्मी की गहरी जुताई, फसल चक्र, रोग-रोधी किस्में, उचित बुवाई समय, स्वस्थ बीज, खेत की स्वच्छता |
| यांत्रिक | प्रकाश प्रपंच, पीले चिपचिपे जाल, फेरोमोन ट्रैप, पक्षी बैठने की खूँटियाँ, हाथ से कीट चुनना |
| जैविक नियंत्रण | ट्राइकोग्रामा (अंड परजीवी), क्राइसोपर्ला, NPV, Bt, Beauveria bassiana, Metarhizium, ट्राइकोडर्मा, Pseudomonas fluorescens |
| वानस्पतिक | नीम बीज अर्क (NSKE 5%), नीम तेल, करंज तेल, अदरक-लहसुन-मिर्च अर्क |
| परंपरागत ज्ञान (ITK) | नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्न्यस्त्र, दशपर्णी अर्क, खट्टी छाछ का छिड़काव, राख का प्रयोग |
| अनुमत खनिज | गंधक और बोर्डो मिश्रण (तांबा) जैसे पदार्थ सीमित और अनुमति के अनुसार |
लाभकारी कीटों (मधुमक्खी, परजीवी, परभक्षी) को खेत की मेड़ पर फूलदार पौधे लगाकर आकर्षित किया जाता है। संतुलित पोषण और स्वस्थ मृदा पौधों की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाते हैं।
8. जैविक उत्पादन पद्धति में खरपतवार प्रबंधन
कृत्रिम शाकनाशी का प्रयोग प्रतिबंधित है, इसलिए खरपतवार नियंत्रण निम्न तरीकों से होता है:
- फसल चक्र और विविध फसल प्रणाली से खरपतवारों का चक्र तोड़ना।
- स्टेल सीडबेड: बुवाई से पहले सिंचाई कर उगे खरपतवार को नष्ट करना।
- मल्चिंग (फसल अवशेष, पुआल या अनुमत जैविक मल्च)।
- हाथ से निराई, गुड़ाई और यांत्रिक वीडर (व्हील हो, पावर वीडर)।
- आवरण फसल (Cover crop) और घनी बुवाई से खरपतवार को दबाना।
- मृदा सौरीकरण और ज्वाला निराई (Flame weeding): विशेष स्थितियों में।
- एलीलोपैथी: ज्वार, सूरजमुखी जैसी फसलों के अवशेष का उपयोग।
- खरपतवार के बीज बनने से पहले हटाना और स्वच्छ मशीनें और बीज उपयोग करना।
9. NPOP की संचालन संरचना (Operational Structure of NPOP)
NPOP (National Programme for Organic Production) की शुरुआत 2001 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा हुई। इसका मुख्य उद्देश्य जैविक उत्पादन के मानक तय करना, प्रमाणन एजेंसियों को मान्यता देना और निर्यात के लिए भारत के जैविक उत्पादों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है।
| स्तर | भूमिका |
|---|---|
| राष्ट्रीय संचालन समिति (NSCOP) | नीति, मानकों और कार्यक्रम का मार्गदर्शन |
| APEDA (कार्यान्वयन निकाय) | सचिवालय की भूमिका, कार्यक्रम का संचालन और TraceNet जैसे ट्रेसेबिलिटी तंत्र |
| मान्यता समिति और मान्यता एजेंसियाँ | प्रमाणन संस्थाओं को मान्यता देना (जैसे APEDA, चाय, कॉफी, मसाला बोर्ड आदि) |
| निरीक्षण व प्रमाणन एजेंसियाँ | खेतों का निरीक्षण कर प्रमाण पत्र जारी करना |
| उत्पादक और प्रसंस्करणकर्ता | मानकों का पालन और रिकॉर्ड रखना |
NPOP के मानकों को भारत से बाहर कई देशों में समतुल्य मान्यता दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समझौते किए गए हैं। इससे भारतीय जैविक उत्पाद निर्यात बाजार में आसानी से बिक पाते हैं।
10. जैविक खेती की प्रमाणीकरण प्रक्रिया और मानक
तृतीय पक्ष प्रमाणन (NPOP) के चरण
- मान्यता प्राप्त प्रमाणन एजेंसी को आवेदन और खेत का विवरण (नक्शा, पिछला इतिहास, फसलें, इनपुट)।
- एजेंसी और उत्पादक के बीच अनुबंध।
- रूपांतरण काल का पालन और रिकॉर्ड (खेत रजिस्टर) रखना।
- निरीक्षण: खेत, भंडार, इनपुट रिकॉर्ड और नमूना जाँच।
- प्रमाणन समिति द्वारा निर्णय और स्कोप सर्टिफिकेट जारी करना।
- प्रति वर्ष पुनः निरीक्षण (Surveillance)।
- निर्यात पर ट्रांज़ैक्शन सर्टिफिकेट, जिसे APEDA की TraceNet प्रणाली से ट्रैक किया जाता है।
सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS-India)
इसमें किसान समूह आपस में सहकर्मी निरीक्षण करते हैं। यह घरेलू बाजार के लिए सरल और कम लागत वाला विकल्प है। इसके लेबल में "PGS-India Green" (रूपांतरण में) और "PGS-India Organic" होते हैं।
प्रमुख मानक
- NPOP मानक (भारत), NSOP (घरेलू बाजार के लिए राष्ट्रीय मानक, PGS के लिए)।
- अंतरराष्ट्रीय मानक: IFOAM, Codex Alimentarius, यूरोपीय संघ (EU) और USDA NOP।
- FSSAI का जैविक खाद्य के लिए "जैविक भारत" लोगो।
- मानक में शामिल: रूपांतरण काल, बफर ज़ोन, प्रतिबंधित व अनुमत इनपुट, बीज व रोपण सामग्री, रिकॉर्ड, भंडारण, पैकिंग और लेबलिंग।
11. प्रसंस्करण, लेबलिंग, आर्थिक पहलू और व्यवहार्यता
प्रसंस्करण और लेबलिंग
- जैविक और अजैविक उत्पादों का भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन अलग रखा जाए, ताकि मिलावट या संदूषण न हो।
- विकिरण (Irradiation), कृत्रिम रंग-रसायन और प्रतिबंधित योजकों का उपयोग वर्जित है।
- लेबल पर उत्पाद का नाम, उत्पादक, प्रमाणन एजेंसी, बैच नंबर और इंडिया ऑर्गेनिक लोगो होना चाहिए।
- उचित ग्रेडिंग, सफाई और पैकिंग (अनुमत, पर्यावरण अनुकूल सामग्री)।
आर्थिक पहलू और व्यवहार्यता
- रूपांतरण के शुरुआती वर्षों में उपज कम हो सकती है और उसी समय उत्पाद को जैविक भाव नहीं मिलता, जो सबसे बड़ी चुनौती है।
- बाहरी रासायनिक इनपुट की लागत घटती है, पर श्रम, जैविक खाद और प्रमाणीकरण की लागत बढ़ सकती है।
- प्रमाणित जैविक उत्पाद को सामान्यतः अधिक मूल्य मिलता है। लाभ-लागत अनुपात = कुल आय ÷ कुल लागत।
- बहुवर्षीय आधार पर मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण और स्वास्थ्य लाभ अर्थशास्त्र में जोड़कर देखे जाते हैं।
- समूह खेती, FPO और सामूहिक प्रमाणन से लागत घटाई जा सकती है।
12. जैविक उत्पादों का विपणन और निर्यात की संभावनाएँ
- घरेलू बाजार: जैविक दुकानें, किसान बाजार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, सहकारी और सीधी बिक्री। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक शहरी उपभोक्ता मुख्य लक्ष्य हैं।
- निर्यात: भारत से जैविक तिलहन, अनाज, चाय, मसाले, चीनी, दलहन, प्रसंस्कृत खाद्य और औषधीय पौधे निर्यात किए जाते हैं। मुख्य बाजार अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा आदि हैं।
- आवश्यकताएँ: मान्यता प्राप्त प्रमाणीकरण, ट्रेसेबिलिटी, गुणवत्ता और अवशेष परीक्षण, उचित पैकिंग और लेबल।
- चुनौतियाँ: ऊँची प्रमाणीकरण लागत, जागरूकता और विश्वसनीयता की कमी, कमजोर आपूर्ति श्रृंखला और छोटे किसानों को बाजार से जोड़ना।
- सहायक संस्थाएँ: APEDA, बोर्ड (चाय, कॉफी, मसाला), FPO और राज्य कृषि विभाग।
प्रैक्टिकल की झलक (1 क्रेडिट)
(क) जैविक खेतों का भ्रमण
जैविक खेत के घटक (फसल, पशुधन, कम्पोस्ट यूनिट, बायोगैस, जल संरक्षण, खेत रिकॉर्ड) देखना और उनके उपयोग का अध्ययन करना।
(ख) समृद्ध कम्पोस्ट और वर्मीकम्पोस्ट बनाना
- कम्पोस्ट: NADEP, इंदौर, बैंगलोर और गड्ढा विधि प्रचलित हैं। शुरुआत में C:N अनुपात लगभग 25 से 30 : 1 होना अच्छा माना जाता है। परिपक्व कम्पोस्ट में यह घटकर लगभग 20 से नीचे आ जाता है।
- वर्मीकम्पोस्ट: केंचुए की प्रजातियाँ Eisenia fetida, Eudrilus eugeniae और Perionyx excavatus काम आती हैं। कचरे को पहले 15-20 दिन अपघटित करें, नमी लगभग 60-70% और छाया वाला स्थान रखें, और सामान्यतः 45-60 दिन में खाद तैयार होती है।
(ग) जैव-उर्वरक और जैव-टीकों की गुणवत्ता जाँच
जीवाणुओं की जीवित संख्या (CFU), नमी, pH और कैरियर की गुणवत्ता जाँची जाती है। FCO के मानक के अनुसार कैरियर आधारित जैव-उर्वरक में जीवित कोशिकाओं की न्यूनतम संख्या निर्धारित होती है (सामान्यतः लगभग 5×107 CFU प्रति ग्राम, नवीनतम मानक देख लें)।
(घ) परंपरागत ज्ञान (ITK) आधारित इनपुट
| इनपुट | मोटे तौर पर विधि और उपयोग |
|---|---|
| जीवामृत | गाय का गोबर और मूत्र, गुड़, बेसन और मुट्ठी भर मिट्टी पानी में मिलाकर लगभग 48 घंटे किण्वन; सिंचाई के साथ देना |
| बीजामृत | गोबर, मूत्र, चूना और मिट्टी से बना घोल; बीज उपचार के लिए |
| पंचगव्य | गोबर, मूत्र, दूध, दही और घी का मिश्रण; सामान्यतः लगभग 3% घोल का छिड़काव |
| नीमास्त्र / दशपर्णी अर्क | नीम और अन्य पत्तियों से बने कीट-निवारक अर्क |
(ङ) लागत और कटाई-पश्चात प्रबंधन
- जैविक उत्पादन प्रणाली की लागत और आय का हिसाब, जिसमें प्रमाणीकरण शुल्क शामिल है।
- कटाई-पश्चात: सफाई, सुखाई, श्रेणीकरण (Grading), पैकिंग, लेबलिंग और संग्रहण, और बिना रासायनिक धूमन के भंडारण।
- गुणवत्ता पहलू: नमी, अवशेष, रंग और आकार की जाँच।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)
- जैविक खेती के जनक: सर अल्बर्ट हॉवर्ड (इंदौर विधि)।
- IFOAM के चार सिद्धांत: स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी, निष्पक्षता और देखभाल।
- NPOP: 2001 में शुरू, APEDA द्वारा संचालित, वाणिज्य मंत्रालय।
- PKVY: 2015; PGS-India: 2011; NPOF: 2004।
- सिक्किम: पहला पूर्णतः जैविक राज्य (2016)।
- रूपांतरण काल: एकवर्षीय फसल 2 वर्ष, बहुवर्षीय 3 वर्ष।
- जैव कीट नियंत्रक: ट्राइकोग्रामा, NPV, Bt, Beauveria, ट्राइकोडर्मा।
- वर्मीकम्पोस्ट की प्रमुख प्रजाति: Eisenia fetida।
- प्रमाणन: तृतीय पक्ष (NPOP) और सहभागी (PGS-India)।
- निर्यात ट्रेसेबिलिटी: APEDA की TraceNet।
महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. जैविक खेती के जनक किसे माना जाता है? (अ) रूडोल्फ स्टाइनर (ब) सर अल्बर्ट हॉवर्ड (स) फुकुओका (द) पालेकर। उत्तर: ब
Q2. NPOP की शुरुआत किस वर्ष हुई? (अ) 1991 (ब) 2001 (स) 2011 (द) 2015। उत्तर: ब
Q3. भारत का पहला पूर्णतः जैविक राज्य कौन सा है? (अ) केरल (ब) हिमाचल प्रदेश (स) सिक्किम (द) राजस्थान। उत्तर: स
Q4. एकवर्षीय फसलों के लिए NPOP में सामान्य रूपांतरण काल कितना है? (अ) 6 माह (ब) 1 वर्ष (स) 2 वर्ष (द) 5 वर्ष। उत्तर: स
Q5. PGS-India किसके लिए सरल प्रमाणन प्रणाली है? (अ) घरेलू बाजार (ब) केवल निर्यात (स) केवल चाय (द) केवल मसाले। उत्तर: अ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: AGRON-322 कितने क्रेडिट का है?
उत्तर: 2 क्रेडिट (1+1), यानी 1 थ्योरी और 1 प्रैक्टिकल।
प्रश्न: इस कोर्स में कुल कितने लेक्चर हैं?
उत्तर: थ्योरी में 12 टॉपिक हैं और कुल 16 लेक्चर निर्धारित हैं।
प्रश्न: जैविक और प्राकृतिक खेती में क्या अंतर है?
उत्तर: जैविक खेती में बाहर से अनुमत जैविक इनपुट और प्रमाणन होता है, जबकि प्राकृतिक खेती में सामान्यतः खेत और देशी गाय आधारित संसाधनों पर जोर रहता है और बाहरी खाद नहीं डाली जाती।
प्रश्न: रूपांतरण काल क्यों जरूरी है?
उत्तर: खेत की मृदा से रसायनों के अवशेष हटाने और जैविक प्रणाली स्थापित करने के लिए।
प्रश्न: जैविक खेती में कीटों का नियंत्रण कैसे होता है?
उत्तर: सस्य, यांत्रिक, जैविक नियंत्रण और वानस्पतिक अर्क के संयुक्त उपयोग से।
प्रश्न: जैविक उत्पाद निर्यात के लिए क्या जरूरी है?
उत्तर: NPOP के अंतर्गत मान्यता प्राप्त एजेंसी से प्रमाणन, ट्रेसेबिलिटी और ट्रांज़ैक्शन सर्टिफिकेट।
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संदर्भ पुस्तकें (Reference Books)
पलानियप्पन एवं अन्नादुरई, Organic Farming: Theory and Practice, Scientific Publishers; एन. लैम्पकिन, Organic Farming, Old Pond Publishing; A.K. शर्मा, A Handbook of Organic Farming, Agrobios; APEDA, NPOP के मानक एवं ICAR के राष्ट्रीय जैविक व प्राकृतिक खेती केंद्र के प्रकाशन।
नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। पाठ्यक्रम का स्रोत: B.Sc. (Hons.) Agriculture का स्वीकृत सिलेबस। योजनाओं, मानकों, FCO की सीमाओं और निर्यात आँकड़ों में समय के साथ बदलाव होते रहते हैं; प्रकाशित करने से पहले नवीनतम सरकारी स्रोत (APEDA, कृषि मंत्रालय, FSSAI) से जाँच लें।
