पादप रोग विज्ञान के मूल सिद्धांत (Fundamentals of Plant Pathology) B.Sc. (Hons.) Agriculture का बुनियादी कोर्स है, जिसकी नींव पर आगे के सभी रोग प्रबंधन के कोर्स खड़े होते हैं। सिलेबस में 12 टॉपिक और कुल 32 थ्योरी लेक्चर दिए गए हैं। इस लेख को हमने एक "रोग-जाँच फाइल" की तरह सजाया है। जैसे जासूस पहले यह तय करता है कि अपराध हुआ भी है या नहीं, फिर इतिहास खँगालता है, फिर संदिग्धों की सूची बनाता है, वैसे ही हम पहले रोग की परिभाषा समझेंगे, फिर रोग फैलाने वाले संदिग्धों (फफूँद, जीवाणु, विषाणु, सूत्रकृमि आदि) को एक-एक कर परखेंगे। हर फाइल में सिलेबस के टॉपिक नंबर लिखे हैं।
सिलेबस और फाइलों का नक्शा
| फाइल | विषय | सिलेबस टॉपिक | लेक्चर |
|---|---|---|---|
| फाइल 1 | रोग क्या है, महत्व, कारण और लक्षण | 1, 3 | 2 + 2 |
| फाइल 2 | इतिहास और भारतीय योगदान, शब्दावली | 2 | 2 |
| फाइल 3 | संदिग्धों की पूरी सूची (रोगकारक समूह) | 4 | 7 |
| फाइल 4 | फफूँद: रचना, प्रजनन, नामकरण, वर्गीकरण | 5, 6 | 3 + 3 |
| फाइल 5 | जीवाणु और मोलिक्यूट्स | 7, 8 | 2 + 2 |
| फाइल 6 | विषाणु | 9 | 2 |
| फाइल 7 | रोग कैसे बनता है: एंजाइम, विष और पौधे का बचाव | 10 | 2 |
| फाइल 8 | सूत्रकृमि और उनसे होने वाली हानि | 11, 12 | 2 + 3 |
पूरी कहानी एक नज़र में
इसी पूरी शृंखला को रोग चक्र (Disease cycle) कहते हैं। रोग बनने के लिए तीन चीज़ें एक साथ चाहिए: संवेदनशील पोषक (Host), सक्रिय रोगकारक (Pathogen) और अनुकूल वातावरण (Environment)। इन तीनों को रोग त्रिकोण (Disease triangle) कहते हैं। कोई एक भुजा हटा दें तो रोग नहीं बनता, और पूरा रोग प्रबंधन इसी सिद्धांत पर टिका है।
फाइल 1: रोग क्या है? (टॉपिक 1 और 3)
परिभाषा, महत्व और क्षेत्र
पादप रोग विज्ञान (Plant Pathology) वह विज्ञान है जिसमें पौधों के रोगों के कारण, उनके विकसित होने की प्रक्रिया, पौधे पर प्रभाव और उनके प्रबंधन का अध्ययन होता है। रोग (Disease) पौधे की सामान्य कार्यिकी में वह हानिकारक और लगातार बना रहने वाला बदलाव है जो किसी सजीव या निर्जीव कारक की निरंतर क्रिया से होता है। यहाँ "निरंतर" शब्द ज़रूरी है: कीट के एक बार काटने से बनी चोट को क्षति (Injury) कहते हैं, रोग नहीं।
- ऐतिहासिक महत्व: आयरलैंड में 1845 के आलू के पछेती झुलसा (Late blight) से पड़ा भीषण अकाल, 1943 का बंगाल अकाल, जिसमें धान के भूरे धब्बा रोग की बड़ी भूमिका मानी जाती है, और श्रीलंका में कॉफी रस्ट से कॉफी उद्योग का तबाह होना।
- आर्थिक महत्व: उपज और गुणवत्ता में कमी, कटाई के बाद भंडारण में नुकसान, कीटनाशी/फफूँदनाशी पर खर्च, कुछ रोगों में मनुष्य और पशु के लिए विषैले पदार्थ (जैसे अरगट से बने)।
- क्षेत्र: रोग की पहचान और कारण, रोगजनन, रोग चक्र और महामारी, पोषक-रोगकारक संबंध, प्रतिरोधकता, और रोग प्रबंधन।
- उद्देश्य: रोग का कारण जानना, उसकी क्रियाविधि समझना, हानि का आकलन करना और टिकाऊ प्रबंधन की विधि विकसित करना।
रोगों का वर्गीकरण (टॉपिक 3)
| आधार | प्रकार और उदाहरण |
|---|---|
| कारण के आधार पर | जैविक (Biotic या संक्रामक): फफूँद, जीवाणु, विषाणु आदि से। अजैविक (Abiotic या असंक्रामक): पोषक तत्व की कमी, तापमान, प्रदूषण आदि से |
| फैलाव के आधार पर | स्थानिक (Endemic): किसी क्षेत्र में हर साल रहने वाला। महामारी (Epidemic / Epiphytotic): अचानक बड़े क्षेत्र में फैलने वाला। छिटपुट (Sporadic): अनियमित और कम जगह। विश्वव्यापी (Pandemic): महाद्वीपों में |
| लक्षण के आधार पर | झुलसा (Blight), सड़न (Rot), मुरझान (Wilt), धब्बा (Spot), गेरुआ (Rust), कंड (Smut), चूर्णिल आसिता (Powdery mildew), मृदुरोमिल आसिता (Downy mildew), विषाणु मोज़ेक आदि |
| प्रभावित भाग के आधार पर | जड़, तना, पत्ती, फल या बीज के रोग |
| पोषक पौधे के आधार पर | अनाज, दलहन, सब्ज़ी, फल और पुष्प फसलों के रोग |
अजैविक कारणों से रोग और लक्षण
| कारण | उदाहरण |
|---|---|
| जिंक की कमी | धान का खैरा रोग (Khaira) |
| मोलिब्डेनम की कमी | फूलगोभी में व्हिपटेल |
| बोरॉन की कमी | फूलगोभी का भूरापन, चुकंदर का हार्ट रोट |
| कैल्शियम की कमी | टमाटर में ब्लॉसम एंड रॉट |
| ऑक्सीजन की कमी | आलू का ब्लैक हार्ट |
| वायु प्रदूषण | ईंट-भट्टे की गैसों से आम का ब्लैक टिप, ओज़ोन से तंबाकू पर वेदर फ्लेक |
| पाला, लू, ओला, लवणता, शाकनाशी का दुष्प्रभाव | पत्ती झुलसना, सिरे जलना, बाली का सफेद पड़ना |
लक्षण (Symptom) बनाम संकेत (Sign)
लक्षण पौधे की प्रतिक्रिया है (पीलापन, मुरझान, गाँठ, धब्बा)। संकेत रोगकारक का अपना हिस्सा है जो आँख या लेंस से दिखे (कवक जाल, स्क्लेरोशिया, बीजाणु का चूर्ण, जीवाणु का रिसाव)। इनके साथ मिलकर सिंड्रोम (Syndrome) बनता है। लक्षण के प्रमुख प्रकार: परिगलन (ऊतक का मरना), हरिमाहीनता (क्लोरोसिस), अतिवृद्धि (हाइपरट्रॉफी/गॉल), अवरोध (बौनापन), ऊतक सड़न, कैंकर, डाईबैक, डैम्पिंग-ऑफ और डायन झाड़ू (Witches' broom)।
फाइल 2: इतिहास और शब्दावली (टॉपिक 2)
समय रेखा: दुनिया की प्रमुख खोजें
| वर्ष / काल | वैज्ञानिक और योगदान |
|---|---|
| प्राचीन काल | थियोफ्रेस्टस (अरस्तू के शिष्य) ने अनाज के गेरुआ और अन्य रोगों का उल्लेख किया |
| 1807 | प्रीवोस्ट: गेहूँ के बंट (Tilletia) के बीजाणु अंकुरण का अध्ययन, तांबे के विलयन से उपचार |
| 1861 | एंटोन डी बेरी: आलू के पछेती झुलसे का कारण Phytophthora infestans सिद्ध किया; इन्हें आधुनिक पादप रोग विज्ञान का जनक माना जाता है |
| 1878 | बरिल: जीवाणु से पौधे में रोग (नाशपाती का फायर ब्लाइट) का पहला प्रमाण |
| 1882-85 | मिलारडे: अंगूर के मृदुरोमिल आसिता के लिए बोर्डो मिश्रण की खोज |
| 1892 और 1898 | इवानोवस्की ने तंबाकू मोज़ेक का रस जीवाणु-रोधी छन्नी से छानकर भी रोग फैलाते पाया; बेइजरिंक ने इसे "जीवित तरल संक्रामक पदार्थ" कहा |
| 1935 | स्टेनले: तंबाकू मोज़ेक विषाणु (TMV) का क्रिस्टल रूप तैयार किया |
| 1967 | दोई और साथी: फाइटोप्लाज्मा (तब "माइकोप्लाज्मा जैसे जीव") की खोज |
| 1971 | डाइनर: विरॉइड की खोज (आलू का स्पिंडल ट्यूबर रोग) |
भारतीय योगदान
- ई.जे. बटलर: भारतीय कवक विज्ञान के जनक माने जाते हैं। उनकी पुस्तक Fungi and Disease in Plants (1918) प्रसिद्ध है।
- के.सी. मेहता: भारत में गेहूँ के गेरुआ रोग के चक्र पर कार्य, जिसमें दिखाया कि रोग पहाड़ों से मैदानों में यूरेडोबीजाणुओं से फैलता है।
- बी.बी. मुंडकुर: भारतीय फाइटोपैथोलॉजिकल सोसाइटी (1947) की स्थापना में अग्रणी, Fungi and Plant Diseases के लेखक।
- जे.एफ. डस्तूर: भारत में अरंडी आदि पर Phytophthora रोगों पर कार्य।
- अन्य: टी.एस. सदाशिवन, वाई.एल. नेने (दलहनों के रोग) और अनेक संस्थान जैसे IARI (पूसा, नई दिल्ली)।
ज़रूरी शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| रोगजनक (Pathogen) | रोग पैदा करने वाला जीव |
| रोगजनकता (Pathogenicity) | रोग पैदा करने की क्षमता |
| उग्रता (Virulence) | रोगजनकता की मात्रा या तीव्रता |
| निवेश द्रव्य (Inoculum) | रोगकारक का वह भाग जो पौधे के संपर्क में आकर संक्रमण करे (बीजाणु, स्क्लेरोशिया, जीवाणु कोशिका) |
| संक्रमण (Infection) | रोगकारक का पौधे में घुसकर पोषक से भोजन लेना शुरू करना |
| उद्भवन काल (Incubation period) | संक्रमण से लक्षण दिखने तक का समय |
| पोषक / ग्राही (Host) | वह पौधा जिस पर रोगकारक आश्रित है |
| परजीवी, अविकल्पी परजीवी (Obligate parasite) | केवल जीवित पोषक पर जीवित रहने वाला, जैसे गेरुआ, चूर्णिल आसिता, विषाणु |
| विकल्पी परजीवी / मृतोपजीवी | जीवित और मृत दोनों पर रह सकने वाला, जैसे Fusarium, Pythium |
| प्रतिरोधकता, सहनशीलता, प्रतिरक्षा | रोग रोकने की क्षमता, रोग होने पर भी उपज बचाए रखने की क्षमता, और रोगकारक का बिल्कुल प्रवेश न होना |
(1) जीव हर रोगी पौधे में पाया जाए और स्वस्थ में नहीं। (2) उसे अलग करके शुद्ध संवर्धन में उगाया जाए। (3) शुद्ध संवर्धन को स्वस्थ संवेदनशील पौधे में डालने पर वही रोग पैदा हो। (4) उस रोगी पौधे से वही जीव दोबारा अलग करके पहले जैसा पाया जाए।
ध्यान दें: विषाणु और अविकल्पी परजीवी को कृत्रिम माध्यम पर नहीं उगा सकते, इसलिए इनमें ये अभिधारणाएँ आंशिक रूप में ही लागू होती हैं।
फाइल 3: संदिग्धों की सूची, रोगकारक समूह (टॉपिक 4)
यह सबसे बड़ा टॉपिक है (7 लेक्चर), इसलिए नीचे की तालिका को कंठस्थ करें। आगे हर समूह की अलग फाइल है।
| समूह | पहचान की बात | उदाहरण रोग |
|---|---|---|
| फफूँद (Fungi) | हरितलवक रहित, कवक जाल वाले, बीजाणु बनाते हैं | पछेती झुलसा (आलू), गेरुआ (गेहूँ), मूँगफली का टिक्का |
| जीवाणु (Bacteria) | एक कोशिका वाले, कोशिका भित्ति सहित प्रोकैरियोट | धान का जीवाणु पर्ण अंगमारी (Xanthomonas oryzae pv. oryzae), नींबू का कैंकर |
| फास्टिडियस वेसिकुलर जीवाणु | केवल पौधे के जाइलम या फ्लोएम में रहते हैं, कृत्रिम माध्यम पर कठिनाई से उगते हैं, कीट से फैलते हैं | अंगूर का पियर्स रोग (Xylella fastidiosa), नींबू का ग्रीनिंग |
| फाइटोप्लाज्मा | कोशिका भित्ति नहीं, फ्लोएम में रहते हैं, फुदका (Leafhopper) से फैलते हैं, टेट्रासाइक्लिन से असर | तिल की फिलोडी, बैंगन का छोटी पत्ती रोग, गन्ने का ग्रासी शूट, चंदन का स्पाइक |
| स्पाइरोप्लाज्मा | कुंडलित (Helical), गतिशील, कोशिका भित्ति नहीं, कृत्रिम माध्यम पर उग सकते हैं | नींबू का स्टबर्न (Spiroplasma citri), मक्का का स्टंट |
| विषाणु (Viruses) | न्यूक्लिक अम्ल + प्रोटीन, केवल जीवित कोशिका में गुणन | तंबाकू मोज़ेक, भिंडी का पीला शिरा मोज़ेक, केले का बंची टॉप |
| विरॉइड (Viroids) | केवल छोटा नग्न RNA, प्रोटीन आवरण नहीं | आलू का स्पिंडल ट्यूबर, नारियल का कडांग-कडांग |
| शैवाल (Algae) | हरित शैवाल Cephaleuros | चाय और कॉफी का लाल रस्ट (Red rust) |
| प्रोटोज़ोआ | कशाभिका वाले एककोशिकीय जीव (Phytomonas) | नारियल का हार्टरोट, कॉफी का फ्लोएम नेक्रोसिस |
| पुष्पीय परजीवी (Phanerogamic parasites) | स्वयं फूल वाले पौधे जो दूसरे पर रहते हैं | Cuscuta (अमरबेल, पूर्ण तना परजीवी), Striga (ज्वार-गन्ने पर), Orobanche (सरसों-तंबाकू पर), Loranthus (आंशिक तना परजीवी) |
| सूत्रकृमि (Nematodes) | सूक्ष्म, धागे जैसे, स्टाइलेट वाले जंतु | जड़ गाँठ (Meloidogyne), मोल्या (Heterodera), बाली गाँठ (Anguina) |
फाइल 4: फफूँद की पूरी जन्मपत्री (टॉपिक 5 और 6)
सामान्य लक्षण
फफूँद यूकैरियोटिक, हरितलवक रहित (Achlorophyllous), विषमपोषी जीव हैं जो भोजन को पाचक एंजाइम से बाहर ही पचाकर अवशोषित करते हैं। कोशिका भित्ति मुख्यतः काइटिन और ग्लूकन की होती है। अपवाद: ऊमाइसीट समूह की भित्ति मुख्यतः सेल्युलोज़ और ग्लूकन की होती है। इनमें बीजाणु (Spores) से प्रजनन होता है।
कायिक रचनाएँ (Somatic structures) और थैलस के प्रकार
- थैलस (Thallus): फफूँद का कायिक शरीर, जो एककोशिकीय (यीस्ट) या तंतुमय (कवकजाल, Mycelium) हो सकता है। तंतु अपटीदार या संकोशिकीय (Coenocytic / aseptate) या पटीदार (Septate) होते हैं।
- होलोकार्पिक (Holocarpic): पूरा थैलस प्रजनन रचना में बदल जाए (जैसे Synchytrium)। यूकार्पिक (Eucarpic): थैलस का केवल एक भाग प्रजनन करे और शेष कायिक बना रहे।
- कवक ऊतक (Fungal tissues): घने जमे तंतुओं से बने प्लेक्टेनकाइमा, जिसके दो रूप हैं: प्रोसेनकाइमा (समानांतर तंतु) और स्यूडोपैरेनकाइमा (गोल-चौकोर कोशिकाएँ, पौधों के ऊतक जैसे)।
थैलस के रूपांतरण (Modifications)
| रचना | कार्य |
|---|---|
| अपरेसोरियम (Appressorium) | पौधे की सतह से चिपककर प्रवेश-कील बनाना |
| चूषणांग (Haustorium) | पोषक की कोशिका के भीतर जाकर भोजन अवशोषित करना (अविकल्पी परजीवी में) |
| स्क्लेरोशिया (Sclerotia) | कठोर, गाँठ जैसी विश्राम रचना जो प्रतिकूल समय में मिट्टी में जीवित रखती है, जैसे Sclerotinia, Rhizoctonia, अरगट |
| राइज़ोमॉर्फ (Rhizomorph) | रस्सी जैसे मोटे तंतु जो मिट्टी में दूर तक फैलते हैं (Armillaria) |
| स्ट्रोमा (Stroma) | तंतुओं का ठोस गद्दा जिस पर या जिसमें फलन काय बनते हैं |
| संक्रमण गद्दी (Infection cushion) | कई तंतुओं का समूह जो एक साथ प्रवेश करने का प्रयास करता है |
प्रजनन
| प्रकार | तरीका और बीजाणु |
|---|---|
| अलैंगिक (Asexual) | खंडन, मुकुलन (Budding), तथा बीजाणु: चलबीजाणु (Zoospore), स्पोरेंजियोबीजाणु, कोनिडिया, क्लैमाइडोस्पोर, ऑइडिया। ये मौसम में कई बार बनकर रोग फैलाते हैं। कोनिडिया एसरवुलस, पिक्निडियम, स्पोरोडोकियम जैसी रचनाओं में बनते हैं |
| लैंगिक (Sexual) | तीन चरण: प्लाज़्मोगैमी (कोशिकाद्रव्य मिलना), कैरियोगैमी (केंद्रक मिलना), अर्धसूत्री विभाजन। बीजाणु: ऊस्पोर, जाइगोस्पोर, ऐस्कोस्पोर, बेसिडियोस्पोर। ये अधिकतर जीवित रहने और नई आनुवंशिक किस्में बनाने में मदद करते हैं |
नामकरण और वर्गीकरण (टॉपिक 6)
नामकरण का आधार द्विनाम पद्धति (Binomial system) है, जिसे लिनियस ने दिया: पहला शब्द वंश (Genus, बड़े अक्षर से) और दूसरा जाति (Species, छोटे अक्षर से), दोनों तिरछे (Italic) या रेखांकित, जैसे Puccinia graminis tritici। नियम ICN (International Code of Nomenclature for algae, fungi, and plants) के हैं। इनमें एक ही फफूँद के लैंगिक रूप (Teleomorph) और अलैंगिक रूप (Anamorph) के अलग नाम हो सकते हैं, जैसे Magnaporthe oryzae (लैंगिक) और Pyricularia oryzae (अलैंगिक), जो धान का झोंका (Blast) रोग करती है।
वर्गीकरण: सभी फफूँद डोमेन यूकैरिया (Eukarya) में हैं। यहाँ ध्यान रखें कि ऊमाइसीट (Phytophthora, Pythium) सच्ची फफूँद नहीं, बल्कि स्ट्रैमिनोपाइल (Straminipila) जगत के हैं, पर परंपरा से पादप रोग विज्ञान में इन्हें साथ पढ़ाया जाता है। नीचे संभाग (Phylum) तक की कुंजी है:
| पहचान | संभाग (Phylum) | उदाहरण |
|---|---|---|
| चलबीजाणु बनते हैं, भित्ति सेल्युलोज़, द्विगुणित, संकोशिकीय कवकजाल | Oomycota | Phytophthora infestans, Albugo candida (सरसों का सफेद रस्ट), Sclerospora graminicola (बाजरे का हरित बाली रोग) |
| चलबीजाणु पर एक पिछली कशाभिका, भित्ति काइटिन, सरल थैलस | Chytridiomycota | Synchytrium endobioticum (आलू का ब्लैक वार्ट) |
| अपटीदार कवकजाल, जाइगोस्पोर | Zygomycota (आधुनिक वर्गीकरण में Mucoromycota) | Rhizopus stolonifer (मृदु सड़न) |
| पटीदार कवकजाल, बीजाणु ऐस्कस (Ascus) के अंदर | Ascomycota | Erysiphe (चूर्णिल आसिता), Claviceps purpurea (अरगट), Sclerotinia sclerotiorum (सरसों का तना सड़न) |
| पटीदार कवकजाल, बीजाणु बेसिडियम (Basidium) पर बाहर, क्लैंप कनेक्शन | Basidiomycota | Puccinia (गेरुआ), Ustilago (कंड), Tilletia indica (करनाल बंट), Rhizoctonia solani (शीथ ब्लाइट) |
| लैंगिक अवस्था ज्ञात नहीं | अपूर्ण / माइटोस्पोरिक (Deuteromycetes) | Fusarium (चने का उकठा), Alternaria (सरसों का झुलसा), Colletotrichum, Cercospora |
कुछ पुस्तकों में Plasmodiophora brassicae (क्लबरूट) को भी पढ़ाया जाता है, जो Plasmodiophoromycota संभाग में है और इस वर्गीकरण में अलग गिना जाता है।
फाइल 5: जीवाणु और मोलिक्यूट्स (टॉपिक 7 और 8)
आकारिकी (Morphology)
- पादप रोगजनक जीवाणु प्रोकैरियोट हैं, अधिकतर छड़नुमा (Rod), लगभग 0.5 से 1 माइक्रोमीटर चौड़े और 1 से 3 माइक्रोमीटर लंबे। अपवाद: Streptomyces तंतुमय है (आलू की सामान्य खुजली, Common scab)।
- कशाभिका (Flagella): एकध्रुवीय (Xanthomonas, Pseudomonas अधिकतर), बहुध्रुवीय या चारों ओर (Erwinia जैसे पेरिट्राइकस)। पीला रंग: Xanthomonas में।
- ग्राम अभिरंजन: अधिकांश ग्राम-ऋणात्मक (Gram negative)। ग्राम-धनात्मक: Clavibacter, Streptomyces, Bacillus।
- बाहर चिपचिपी परत (कैप्सूल या स्लाइम, EPS), जो पौधे में जल प्रवाह रोककर मुरझान ला सकती है।
- अधिकतर जीवाणु बीजाणु नहीं बनाते। अपवाद: Bacillus और Clostridium अंतःबीजाणु बनाते हैं।
मोलिक्यूट्स (Mollicutes): फाइटोप्लाज्मा और स्पाइरोप्लाज्मा
इनमें कोशिका भित्ति नहीं होती, केवल तीन-परत वाली इकाई झिल्ली होती है, इसलिए आकार बदलता रहता है। फाइटोप्लाज्मा अब तक कृत्रिम माध्यम पर नहीं उगाए जा सके। ये फ्लोएम में रहते हैं और पेनिसिलिन से अप्रभावित, पर टेट्रासाइक्लिन से प्रभावित होते हैं (पेनिसिलिन भित्ति पर असर करती है, जो इनमें है ही नहीं)। यही सरल संकेत इन्हें जीवाणु से अलग करता है।
जीवाणु का प्रजनन और वर्गीकरण (टॉपिक 8)
- द्विविभाजन (Binary fission): एक कोशिका दो में बँटती है। अनुकूल स्थिति में कुछ जीवाणु लगभग 20 से 60 मिनट में दोगुने हो जाते हैं।
- आनुवंशिक पुनर्संयोजन: संयुग्मन (कोशिकाओं के सीधे संपर्क से), रूपांतरण (मुक्त DNA को ग्रहण), पारगमन (जीवाणुभोजी विषाणु द्वारा)। प्लाज़्मिड रोगजनकता जीन ले जा सकते हैं। Agrobacterium tumefaciens (क्राउन गॉल) का Ti प्लाज़्मिड पौधे के जीन में DNA डालता है, इसी का उपयोग जैव प्रौद्योगिकी में होता है।
- वर्गीकरण: पहचान के लिए आकार, ग्राम परीक्षण, कशाभिका, रंजक, जैव-रासायनिक परीक्षण और आधुनिक रूप से 16S rRNA अनुक्रम का उपयोग होता है। मानक संदर्भ बर्गी की मैनुअल (Bergey's Manual) है। फाइटोप्लाज्मा और स्पाइरोप्लाज्मा वर्ग Mollicutes में आते हैं।
| वंश | प्रमुख रोग |
|---|---|
| Xanthomonas | धान का जीवाणु अंगमारी, नींबू का कैंकर |
| Pseudomonas | कई पर्ण धब्बे, तंबाकू का वाइल्डफायर |
| Ralstonia | टमाटर, बैंगन, आलू का जीवाणु उकठा (Bacterial wilt) |
| Erwinia / Pectobacterium | मृदु सड़न (Soft rot) |
| Agrobacterium | क्राउन गॉल |
| Clavibacter, Streptomyces | टमाटर का कैंकर, आलू की खुजली |
सूत्र: N = N0 × 2n, जहाँ n = पीढ़ियों की संख्या।
मान लें एक कोशिका हर 30 मिनट में दोगुनी होती है। 5 घंटे में n = 10 पीढ़ियाँ।
N = 1 × 210 = 1024 कोशिकाएँ।
इसीलिए बरसात में थोड़े-से जीवाणु भी कुछ ही दिनों में पूरे खेत में रोग फैला सकते हैं।
फाइल 6: विषाणु, जीवित और निर्जीव के बीच (टॉपिक 9)
प्रकृति और संरचना
विषाणु अविकल्पी अंतःकोशिकीय परजीवी हैं। इनमें अपनी चयापचय क्रिया नहीं होती, ये पोषक कोशिका की मशीनरी से अपनी प्रतिलिपियाँ बनवाते हैं। संरचना: न्यूक्लिक अम्ल (जीनोम) और उसे घेरने वाला प्रोटीन आवरण (Capsid)। अधिकांश पादप विषाणुओं का जीनोम ssRNA है। कुछ में DNA होता है, जैसे जेमिनीविषाणु (ssDNA) और फूलगोभी मोज़ेक विषाणु (dsDNA)।
| आकृति | उदाहरण |
|---|---|
| छड़ जैसी, कठोर (Rod, Helical) | TMV (लगभग 300 × 18 नैनोमीटर) |
| लचीली तंतुमय (Flexuous) | पोटीविषाणु (आलू Y विषाणु) |
| गोलाकार या बहुफलकीय (Isometric) | ककड़ी मोज़ेक विषाणु |
| जुड़वाँ कण (Geminate) | जेमिनीविषाणु (भिंडी, कपास, टमाटर के पर्ण कुंचन) |
| बेसिलीफॉर्म (Bacilliform) | कुछ विषाणु जैसे केले के विषाणु |
संचरण (Transmission)
- यांत्रिक (रस द्वारा): औज़ार, हाथ, पत्तियों की रगड़ से (TMV)।
- कायिक प्रवर्धन: आलू कंद, गन्ने की पोरी, केले का कंद और कलम या ग्राफ्टिंग।
- बीज द्वारा: जैसे जौ का स्ट्राइप मोज़ेक, सेम और लेट्यूस के कुछ विषाणु।
- कीट वाहक (Vectors): माहू (Aphid) अधिकतर मोज़ेक विषाणु; सफेद मक्खी (Bemisia tabaci) जेमिनीविषाणु जैसे भिंडी का पीला शिरा मोज़ेक; फुदका (Leafhopper) धान का टुंग्रो; थ्रिप्स मूँगफली का बड नेक्रोसिस; माइट गेहूँ का स्ट्रीक मोज़ेक।
- अन्य: अमरबेल (Cuscuta), कुछ सूत्रकृमि (Xiphinema) और मृदा कवक (Olpidium, Polymyxa) भी वाहक हैं।
- कीट से संचरण के प्रकार: अस्थायी (Non-persistent: कुछ सेकंड में अधिग्रहण, कुछ घंटे असर), अर्ध-स्थायी, और स्थायी (Persistent: कीट के भीतर घूमकर, कुछ में गुणन भी, जीवनभर)।
पहचान और बचाव
निदान: लक्षण, सूचक पौधा (जैसे Chenopodium amaranticolor पर स्थानीय धब्बे), इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी, ELISA और PCR। विषाणु पर दवा काम नहीं करती, इसलिए बचाव ही उपाय है: रोगमुक्त बीज/पौध, वाहक नियंत्रण, रोगी पौधे उखाड़कर नष्ट करना (Roguing), प्रतिरोधी किस्में, मेरिस्टेम संवर्धन और ताप-उपचार।
फाइल 7: रोग कैसे बनता है? हथियार और ढाल (टॉपिक 10)
रोगकारक के हथियार: एंजाइम
| एंजाइम | काम |
|---|---|
| क्यूटिनेज़ (Cutinase) | सतह की क्यूटिकल परत गलाना |
| पेक्टिनेज़ (Pectinase) | कोशिकाओं को जोड़ने वाले पेक्टिन को घोलकर ऊतक गला देना (मृदु सड़न) |
| सेल्युलेज़ और हेमीसेल्युलेज़ | कोशिका भित्ति तोड़ना |
| लिग्निनेज़ | काष्ठ जैसे ऊतक में घुसना |
| प्रोटिएज़, लाइपेज़, एमाइलेज़ | प्रोटीन, वसा, स्टार्च पचाना |
विष (Toxins) और अन्य पदार्थ
- पोषक-विशिष्ट विष (Host-specific): केवल संवेदनशील किस्म पर असर, जैसे विक्टोरिन (जई का विक्टोरिया झुलसा), HC-विष और T-विष (मक्का का दक्षिणी पर्ण झुलसा, जिसकी 1970 की महामारी T-साइटोप्लाज्म नर बंध्य मक्का पर हुई थी)।
- अविशिष्ट विष (Non-specific): कई पौधों पर असर, जैसे टैबटॉक्सिन (तंबाकू का वाइल्डफायर), फैसियोलोटॉक्सिन (सेम का हेलो ब्लाइट), फ्यूज़ैरिक अम्ल (उकठा), सर्कोस्पोरिन।
- वृद्धि नियामक: ऑक्सिन (क्राउन गॉल), जिबरेलिन (धान का बकाने या "मूर्ख पौध" रोग, Fusarium fujikuroi), एथिलीन और साइटोकाइनिन।
- पॉलीसैकेराइड (EPS): जाइलम वाहिकाएँ बंद करके मुरझान।
पौधे की ढाल: प्रतिरक्षा तंत्र
| प्रकार | पहले से मौजूद (Pre-existing) | संक्रमण के बाद बनने वाला (Post-infection) |
|---|---|---|
| संरचनात्मक | मोटी क्यूटिकल, मोम, रंध्रों की बनावट, छाल, मोटी कोशिका भित्ति | कॉर्क परत, विलगन परत, टाइलोज़ (वाहिकाओं में गुब्बारे जैसी रचना), गोंद, कैलोज़ और लिग्निन जमाव |
| जैव-रासायनिक | फिनॉल, टैनिन, सैपोनिन (जैसे जई का एवेनेसिन, टमाटर का टोमेटीन), रोधक प्रोटीन | अतिसंवेदी अनुक्रिया (Hypersensitive response) जिसमें संक्रमित कोशिकाएँ मरकर रोगकारक को फैलने से रोकती हैं, फाइटोएलेक्सिन (पिसाटिन, फेज़ियोलिन, रिशिटिन), PR प्रोटीन (काइटिनेज़, ग्लूकानेज़) |
- फाइटोएलेक्सिन: संक्रमण के बाद पौधे द्वारा बनाए जाने वाले जीवाणु-रोधी और फफूँद-रोधी रसायन (अवधारणा मूलर और बॉर्गर, 1940)।
- जीन-फॉर-जीन परिकल्पना: एच.एच. फ्लोर ने अलसी और उसके गेरुआ में दिखाया कि पोषक के प्रतिरोधकता जीन के लिए रोगकारक में संगत अविषाणुता (Avirulence) जीन होता है।
- SAR (Systemic Acquired Resistance): एक जगह संक्रमण होने पर पूरे पौधे में प्रतिरोध बढ़ना, जिसमें सैलिसिलिक अम्ल की भूमिका मानी जाती है।
फाइल 8: सूत्रकृमि, जड़ों के अदृश्य शत्रु (टॉपिक 11 और 12)
सामान्य आकारिकी (टॉपिक 11)
- अधिकतर पादप परजीवी सूत्रकृमि सूक्ष्म (लगभग 0.3 से 1 मिमी), पारदर्शी, कृमि जैसे (Vermiform), अखंडित और द्विपार्श्व सममित होते हैं।
- शरीर भित्ति: क्यूटिकल, हाइपोडर्मिस और अनुदैर्घ्य पेशियाँ; शरीर गुहा छद्मगुहा (Pseudocoelom) है।
- स्टाइलेट (Stylet): मुख में भाले जैसी रचना, जिससे पौधे की कोशिका भेदकर रस चूसते हैं। यही इनकी पादप परजीवी होने की निशानी है। इसके बाद ग्रासनली (मध्य बल्ब सहित), आँत, मलाशय और गुदा।
- जनन तंत्र: मादा में अंडाशय, अंडवाहिनी, गर्भाशय और योनिद्वार; नर में वृषण, शुक्रवाहिका और स्पिक्यूल। कुछ जातियों (जैसे Meloidogyne) में अनिषेकजनन भी होता है।
- जीवन चक्र: अंडा → 4 किशोर अवस्थाएँ (J1 से J4, हर बार निर्मोचन) → वयस्क। जड़ गाँठ और सिस्ट सूत्रकृमि में संक्रमण करने वाली अवस्था दूसरी किशोर अवस्था (J2) होती है।
वर्गीकरण की रूपरेखा
| स्तर | विवरण |
|---|---|
| संघ (Phylum) | Nematoda |
| वर्ग | Secernentea (फैस्मिडिया): अधिकतर पादप परजीवी। Adenophorea: कुछ वाहक सूत्रकृमि |
| प्रमुख गण | Tylenchida (Meloidogyne, Heterodera, Anguina, Pratylenchus), Aphelenchida (Aphelenchoides), Dorylaimida (Xiphinema, Longidorus, विषाणु वाहक) |
| भोजन ग्रहण के आधार पर | बाह्य परजीवी (जड़ के बाहर), अर्ध-अंतःपरजीवी, अंतःपरजीवी (घूमने वाले या स्थिर) |
तीन ख़ास सूत्रकृमि और उनकी हानि (टॉपिक 12)
| सूत्रकृमि / रोग | लक्षण और क्षति का स्वरूप | प्रबंधन के मुख्य उपाय |
|---|---|---|
| Meloidogyne जड़ गाँठ (Root-knot) | जड़ों पर गाँठें, J2 जड़ की नोक के पास घुसकर विशाल कोशिकाएँ (Giant cells) बनवाता है। मादा नाशपाती जैसी, स्थिर, अंडे चिपचिपे अंडकोष में जड़ की सतह पर। ऊपर से पौधे बौने, पीले, मुरझाने वाले। सब्ज़ियाँ (टमाटर, बैंगन, भिंडी, मिर्च, कद्दूवर्गीय) अधिक प्रभावित | गर्मी में गहरी जुताई, फसल चक्र, गेंदा (Tagetes) लगाना, नीम की खली, प्रतिरोधी किस्में, जैव एजेंट जैसे Pasteuria penetrans और Purpureocillium lilacinum |
| Heterodera सिस्ट सूत्रकृमि, गेहूँ-जौ का मोल्या रोग (H. avenae) | खेत में पैच, पौधे बौने और पीले, कल्ले कम, जड़ें घनी और झाड़ीनुमा। बाली निकलते समय जड़ों पर चिपके सफेद दाने (मादा) दिखते हैं, जो बाद में भूरे सिस्ट बन जाते हैं। सिस्ट मृत मादा का कठोर खोल है जिसमें अंडे वर्षों जीवित रहते हैं। राजस्थान का एक प्रमुख रोग | गर्मी में गहरी जुताई, गैर-पोषक फसलों (चना, सरसों, प्याज आदि) का फसल चक्र, प्रतिरोधी किस्में, समय पर बुवाई और सिफारिश अनुसार ही रसायन |
| Anguina गेहूँ की बाली गाँठ (Ear cockle / Seed gall) | Anguina tritici के बीज गाँठ (Gall) बनते हैं, जो दाने की जगह काले-भूरे, कठोर और छोटे होते हैं और अंदर सूखी अवस्था में हज़ारों J2 जीवित रखते हैं। नमी में J2 निकलकर अंकुर की वृद्धि कली पर चढ़ते हैं, पत्तियाँ मुड़ी-सिकुड़ी, तना मोटा, बाली छोटी। इसके साथ जीवाणु Rathayibacter tritici मिले तो टुंडू (पीली बाली सड़न) रोग बनता है | प्रमाणित बीज, नमक के घोल (Brine) में बीज डुबोकर तैरने वाली हल्की गाँठें अलग करना, फसल चक्र, रोगी बाली नष्ट करना |
सूत्र: Rf = Pf ÷ Pi (Pf = अंतिम संख्या, Pi = शुरुआती संख्या)
यदि बुवाई के समय Pi = 500 J2 प्रति 250 सेमी³ मिट्टी और कटाई पर Pf = 4000 हो, तो Rf = 4000 ÷ 500 = 8।
Rf > 1 का अर्थ है कि फसल सूत्रकृमि के लिए अच्छा पोषक है और खेत में संख्या बढ़ रही है। Rf < 1 वाली फसल संख्या घटाती है, इसलिए फसल चक्र में ऐसी फसल रखना उपयोगी है।
रोग की मात्रा कैसे नापें? (सब फाइलों के काम की गणना)
रोग घटना (%) = (रोगी पौधे ÷ कुल पौधे) × 100
रोग सूचकांक (PDI) = [Σ (रेटिंग × उस रेटिंग के पौधे)] ÷ (अधिकतम रेटिंग × कुल पौधे) × 100
उदाहरण: 100 पौधों को 0 से 4 रेटिंग पर आँका गया। रेटिंग 0: 40 पौधे; 1: 30; 2: 15; 3: 10; 4: 5।
Σ = (0×40) + (1×30) + (2×15) + (3×10) + (4×5) = 0 + 30 + 30 + 30 + 20 = 110
PDI = 110 ÷ (4 × 100) × 100 = 27.5%
रोग घटना = 60 रोगी पौधे ÷ 100 × 100 = 60%। ध्यान दें कि घटना और गंभीरता अलग चीज़ें हैं।
यदि C = 40% और T = 10% हो, तो नियंत्रण = (40 − 10) ÷ 40 × 100 = 75%
प्रैक्टिकल की झलक
सिलेबस की छवि में केवल थ्योरी दिखाई गई है। पादप रोग विज्ञान के प्रैक्टिकल सामान्यतः इस प्रकार के होते हैं (अपने विश्वविद्यालय की प्रैक्टिकल सूची से मिलान कर लें):
- प्रयोगशाला के उपकरण (सूक्ष्मदर्शी, ऑटोक्लेव, लैमिनार फ्लो) और जीवाणुरहितीकरण की विधियाँ।
- माध्यम (जैसे PDA) बनाना, रोगकारक को अलग करना (Isolation) और शुद्ध संवर्धन।
- फफूँद के वंशों की स्लाइड, जीवाणु का ग्राम अभिरंजन और बैक्टीरियल ऊज़ परीक्षण।
- विषाणु, फाइटोप्लाज्मा रोगों के लक्षणों का अवलोकन और सूत्रकृमि को मिट्टी और जड़ से निकालना।
- कोच के अभिधारणा का अभ्यास और रोग संग्रह (Herbarium) तैयार करना।
सोचिए और हल कीजिए
प्रश्न 1: एक कोशिका हर 20 मिनट में दोगुनी होती है। 2 घंटे बाद कितनी कोशिकाएँ होंगी? उत्तर: 6 पीढ़ियाँ, 26 = 64
प्रश्न 2: 50 पौधे देखे गए, जिनमें 15 रोगी निकले। रोग घटना कितनी है? उत्तर: 15 ÷ 50 × 100 = 30%
प्रश्न 3: Pi = 200 और Pf = 100 हो तो Rf क्या होगा और इसका क्या अर्थ है? उत्तर: Rf = 0.5; फसल सूत्रकृमि की संख्या घटाती है, यानी अच्छा फसल चक्र विकल्प है
परीक्षा के लिए कैसे लिखें और याद रखें
- रोग की परिभाषा में "निरंतर" शब्द ज़रूर लिखें ताकि क्षति (Injury) से भेद स्पष्ट रहे।
- वैज्ञानिक नाम हमेशा इटैलिक या रेखांकित लिखें। बिना वैज्ञानिक नाम के उदाहरण पर अंक कटते हैं।
- इतिहास में "वैज्ञानिक, वर्ष और योगदान" की तालिका बनाएँ। एंटोन डी बेरी, इवानोवस्की, बेइजरिंक, स्टेनले, दोई और डाइनर निश्चित पूछे जाते हैं।
- फफूँद के उत्तर में रचना और संभाग का क्रम लिखें: Oomycota → Chytridiomycota → Zygomycota → Ascomycota → Basidiomycota → अपूर्ण।
- फाइटोप्लाज्मा पर "कोशिका भित्ति नहीं, फ्लोएम में, फुदका से संचरण, टेट्रासाइक्लिन से असर" ये चार बिंदु लिखें।
- सूत्रकृमि के प्रश्न में आकृति का स्केच (स्टाइलेट, ग्रासनली, गोनाड) बनाने से अंक बढ़ते हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. आधुनिक पादप रोग विज्ञान के जनक किसे माना जाता है? (अ) बटलर (ब) एंटोन डी बेरी (स) स्टेनले (द) मिलारडे। उत्तर: ब
Q2. निम्न में से कौन फ्लोएम में रहने वाला कोशिका भित्ति रहित जीव है? (अ) Xanthomonas (ब) Fusarium (स) फाइटोप्लाज्मा (द) Rhizobium। उत्तर: स
Q3. बोर्डो मिश्रण की खोज किसने की? (अ) मिलारडे (ब) प्रीवोस्ट (स) बरिल (द) डाइनर। उत्तर: अ
Q4. तंबाकू मोज़ेक विषाणु का क्रिस्टल किसने बनाया? (अ) इवानोवस्की (ब) बेइजरिंक (स) स्टेनले (द) दोई। उत्तर: स
Q5. गेहूँ-जौ में मोल्या रोग किस सूत्रकृमि से होता है? (अ) Meloidogyne (ब) Heterodera avenae (स) Anguina tritici (द) Xiphinema। उत्तर: ब
Q6. धान का खैरा रोग किस तत्व की कमी से होता है? (अ) बोरॉन (ब) जिंक (स) लौह (द) कैल्शियम। उत्तर: ब
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: पादप रोग विज्ञान का क्या अर्थ है?
उत्तर: पौधों में रोगों के कारण, विकास, प्रभाव और प्रबंधन का अध्ययन।
प्रश्न: रोग और क्षति में क्या अंतर है?
उत्तर: रोग निरंतर चलने वाला हानिकारक बदलाव है, जबकि क्षति एक बार की चोट है।
प्रश्न: विषाणु और जीवाणु में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: जीवाणु स्वतंत्र कोशिकीय जीव है जिसे कृत्रिम माध्यम पर उगाया जा सकता है, जबकि विषाणु को केवल जीवित कोशिका में ही गुणन करना पड़ता है।
प्रश्न: ऊमाइसीट को फफूँद क्यों नहीं माना जाता?
उत्तर: इनकी कोशिका भित्ति मुख्यतः सेल्युलोज़ की है और ये द्विकशाभिका चलबीजाणु बनाते हैं, इसलिए आधुनिक वर्गीकरण में ये स्ट्रैमिनोपाइल जगत में रखे जाते हैं।
प्रश्न: सूत्रकृमि को नंगी आँख से देख सकते हैं?
उत्तर: अधिकांश नहीं, इसलिए सूक्ष्मदर्शी की ज़रूरत होती है। पर जड़ गाँठ, सफेद मादा और सिस्ट जैसे उनके असर आँख से दिख जाते हैं।
प्रश्न: बीज उपचार रोग रोकने में कैसे मदद करता है?
उत्तर: यह बीज पर या अंदर मौजूद रोगकारक को नष्ट करके शुरुआती संक्रमण की कड़ी तोड़ देता है।
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आगे पढ़ने के लिए
संदर्भ पुस्तकें: G.N. Agrios, Plant Pathology; R.S. Singh, Introduction to Principles of Plant Pathology; Mehrotra और Aggarwal, Plant Pathology; Alexopoulos और Mims, Introductory Mycology; E.J. Butler, Fungi and Disease in Plants; तथा ICAR और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के प्रकाशन और e-course।
लेखक की टिप्पणी: यह लेख सिलेबस के आधार पर मौलिक रूप से तैयार किया गया है। गणना के उदाहरण अभ्यास हेतु काल्पनिक हैं। ऐतिहासिक तिथियाँ, वैज्ञानिक नाम, रसायन और जैव-एजेंट की सिफारिशें तथा वर्गीकरण की व्यवस्था समय के साथ बदलती रहती हैं, इसलिए प्रकाशित करने या फसल पर प्रयोग से पहले अपने विश्वविद्यालय की पाठ्य-पुस्तक और नवीनतम सरकारी स्रोत से जाँच लें।
