बागवानी के मूल सिद्धांत (Fundamentals of Horticulture) B.Sc. (Hons.) Agriculture का पहला बागवानी विषय है। सिलेबस में 13 टॉपिक हैं और थ्योरी के कुल 16 लेक्चर निर्धारित हैं। यह लेख सिलेबस के क्रम में नहीं, बल्कि सीखने के क्रम में बँटा है: पहले बागवानी का परिचय, जलवायु और मृदा, फिर नर्सरी और प्रवर्धन, फिर बाग की स्थापना और प्रबंधन, और अंत में औषधीय-सुगंधित पौधे, वृद्धि नियामक और सिंचाई-खाद। हर भाग में सिलेबस के टॉपिक नंबर लिखे हैं, ताकि आप मिलान कर सकें।
पूरी तस्वीर एक नज़र में
यह पूरा क्रम एक बाग के जीवन-चक्र जैसा है। अगर पहली कड़ी (जगह या पौधे का चयन) में गलती हुई, तो आगे के सुधार महँगे पड़ते हैं।
भाग 1: बागवानी का परिचय, वर्गीकरण, जलवायु और मृदा (सिलेबस टॉपिक 1, 2, 3)
बागवानी: परिभाषा, शाखाएँ, महत्व और क्षेत्र (टॉपिक 1)
बागवानी (Horticulture) शब्द लैटिन के hortus (बगीचा) और cultura (खेती) से बना है। इसमें फल, सब्जी, फूल, मसाले, औषधीय और सुगंधित पौधों तथा बागान फसलों की खेती और उनके प्रबंधन का अध्ययन होता है।
| शाखा | क्या पढ़ती है |
|---|---|
| फल विज्ञान (Pomology) | फलों की खेती। अंगूर की खेती को Viticulture कहते हैं |
| सब्जी विज्ञान (Olericulture) | सब्जियों की खेती |
| पुष्प विज्ञान (Floriculture) | फूलों की खेती और उनका व्यापार |
| भू-दृश्य बागवानी (Landscape gardening) | उद्यान, लॉन और सजावटी बगीचों का डिज़ाइन |
| बागान फसलें (Plantation crops) | चाय, कॉफी, रबड़, नारियल, सुपारी, काजू |
| मसाले और औषधीय-सुगंधित पौधे | मिर्च, अदरक, हल्दी, धनिया, जीरा; अश्वगंधा, इसबगोल, पुदीना |
| कटाई-उपरांत प्रौद्योगिकी (Post-harvest technology) | भंडारण, प्रसंस्करण, परिरक्षण और विपणन |
बागवानी का महत्व
- पोषण: फल-सब्जियाँ विटामिन, खनिज, रेशे और एंटीऑक्सीडेंट का मुख्य स्रोत हैं।
- प्रति इकाई क्षेत्र अधिक आय: कम क्षेत्र में अनाज की तुलना में अधिक उत्पादन और आमदनी संभव है।
- रोज़गार और निर्यात: रोपण, देखभाल, तुड़ाई, प्रसंस्करण और विपणन में बड़ा रोज़गार, तथा आम, अंगूर, केला और मसालों का निर्यात।
- शुष्क और बेकार भूमि का उपयोग: बेर, आँवला, अनार, खजूर और बेल जैसे फल कम पानी की स्थिति में भी उगते हैं।
- सौंदर्य और पर्यावरण: पेड़-पौधे हवा को शुद्ध करते हैं, मृदा कटाव घटाते हैं और जैव विविधता बढ़ाते हैं।
क्षेत्र (Scope): भारत फल और सब्जी उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है। आम, केला, पपीता, नींबू वर्गीय फल, भिंडी और अदरक जैसी फसलों में भारत अग्रणी देशों में है। राजस्थान में किन्नू (श्रीगंगानगर), अनार, बेर, आँवला, खजूर, तथा धनिया, जीरा, मेथी जैसे मसाले बागवानी की प्रमुख फसलें हैं। उत्पादन के आँकड़े साल दर साल बदलते हैं, इसलिए प्रकाशित करने से पहले राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड या कृषि मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट देख लें।
बागवानी और वानस्पतिक वर्गीकरण (टॉपिक 2)
वानस्पतिक वर्गीकरण (Botanical classification) पौधों के आपसी संबंध के आधार पर होता है: कुल (Family), वंश (Genus) और जाति (Species)। नाम द्विनाम पद्धति (Binomial nomenclature) में लिखा जाता है, जैसे Mangifera indica। बागवानी वर्गीकरण (Horticultural classification) उपयोग और सुविधा के आधार पर होता है।
| आधार | वर्ग | उदाहरण |
|---|---|---|
| जलवायु | उष्णकटिबंधीय, उपोष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण | आम, केला, पपीता / नींबू वर्गीय, अमरूद, लीची / सेब, नाशपाती, आलूबुखारा |
| जीवन चक्र | एकवर्षीय, द्विवर्षीय, बहुवर्षीय | टमाटर / गाजर, प्याज़ (बीज के लिए) / आम, अमरूद |
| पत्ती गिरना | पर्णपाती (Deciduous), सदाबहार (Evergreen) | सेब, अंगूर, आड़ू / आम, नींबू, अमरूद |
| वृद्धि आदत | वृक्ष, झाड़ी, लता, शाक | आम / गुलाब / अंगूर / पालक |
| सब्जी में खाया जाने वाला भाग | जड़, कंद, बल्ब, पत्ती, फल, फूल | गाजर, आलू, प्याज़, पालक, टमाटर, फूलगोभी |
| सब्जी में मौसम | खरीफ, रबी, जायद | भिंडी / गोभी, मटर / खीरा, तरबूज |
| शुष्क क्षेत्र के फल | कम पानी में उगने वाले | बेर, आँवला, अनार, खजूर, बेल, गोंदा |
| फसल | वैज्ञानिक नाम | कुल |
|---|---|---|
| आम | Mangifera indica | Anacardiaceae |
| नींबू वर्गीय | Citrus spp. | Rutaceae |
| अमरूद | Psidium guajava | Myrtaceae |
| केला | Musa spp. | Musaceae |
| अंगूर | Vitis vinifera | Vitaceae |
| सेब | Malus domestica | Rosaceae |
| पपीता | Carica papaya | Caricaceae |
| अनार | Punica granatum | Lythraceae (पहले Punicaceae) |
| टमाटर / आलू | Solanum lycopersicum / S. tuberosum | Solanaceae |
| भिंडी | Abelmoschus esculentus | Malvaceae |
| गोभी | Brassica oleracea | Brassicaceae |
| गेंदा | Tagetes erecta | Asteraceae |
बागवानी फसलों के लिए जलवायु और मृदा (टॉपिक 3)
| कारक | बागवानी पर असर |
|---|---|
| तापमान | वृद्धि, फूल आने और फल पकने का समय तय करता है। केला, पपीता और आम पाले से बुरी तरह प्रभावित होते हैं। शीतोष्ण फलों को सुप्तावस्था तोड़ने के लिए शीतन आवश्यकता (Chilling requirement) चाहिए, यानी 7°C से नीचे के निश्चित घंटे |
| वर्षा और आर्द्रता | फूल आने के समय वर्षा या अधिक नमी से परागण और फल लगने में बाधा, साथ ही रोग बढ़ते हैं |
| प्रकाश | प्रकाश संश्लेषण और फूल-फल का रंग। कुछ पौधे अल्प-दिवस और कुछ दीर्घ-दिवस वाले होते हैं |
| हवा | तेज़ हवा से फल गिरना और शाखाएँ टूटना। इसके लिए वायुरोधक (Windbreak) लगाए जाते हैं |
| ऊँचाई | ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटता है, इसलिए पहाड़ों पर शीतोष्ण फल (सेब) और मैदानों में उष्णकटिबंधीय फल उगते हैं |
| मृदा | अधिकांश फलों के लिए गहरी, उपजाऊ, अच्छे जल निकास वाली दोमट मृदा, जिसका pH 6 से 7.5 के बीच हो। जल जमाव, कठोर परत और अधिक लवणता हानिकारक हैं। बेर, आँवला और खजूर जैसे फल खारेपन और क्षारीयता को कुछ हद तक सहन करते हैं |
बाग लगाने से पहले मृदा की गहराई, कठोर परत, जल स्तर और जल की गुणवत्ता की जाँच ज़रूर करें।
भाग 2: नर्सरी, प्रवर्धन और बीज (सिलेबस टॉपिक 4, 5, 6, 7)
नर्सरी तैयार करना और उसका महत्व (टॉपिक 4)
नर्सरी (Nursery) वह स्थान है जहाँ पौधे बीज या वानस्पतिक भाग से तैयार किए जाते हैं और उनकी देखभाल कर उन्हें स्थायी स्थान पर रोपण के लिए तैयार किया जाता है।
- महत्व: सही किस्म के स्वस्थ और रोगमुक्त पौधे, समय पर पौधों की उपलब्धता, छोटे स्थान में कम लागत में देखभाल, पौधों की सघन सुरक्षा, पौधे बेचकर आमदनी।
- प्रकार: अस्थायी और स्थायी; फल, सब्जी और सजावटी पौधों की नर्सरी।
- स्थान का चयन: पानी की सुविधा, अच्छा जल निकास, सड़क और बाज़ार से निकटता, खुला स्थान और हवा व पशुओं से बचाव।
- सब्जी नर्सरी: उठी हुई क्यारियाँ, बीजोपचार, पौधे को रोपाई से पहले कठोर बनाना (Hardening)।
पादप प्रवर्धन की विधियाँ (टॉपिक 5)
पादप प्रवर्धन (Plant propagation) पौधों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया है। यह दो प्रकार से होता है: लैंगिक (Sexual, बीज से) और अलैंगिक (Asexual, वानस्पतिक भागों से)।
| लैंगिक (बीज) | अलैंगिक (वानस्पतिक) | |
|---|---|---|
| लाभ | सस्ता और आसान, मूलवृंत तैयार करना, नई किस्में निकालना, पौधे लंबी आयु वाले | मातृ पौधे जैसे गुण (True to type), जल्दी फलन, कम ऊँचाई, मूलवृंत और कलम का संयोजन |
| हानि | पौधों में भिन्नता, देर से फलन, ऊँचे पेड़ | महँगा और कौशल की ज़रूरत, नई विविधता नहीं, रोग मातृ पौधे से आ सकता है |
कुछ पौधों (आम की कुछ किस्में, नींबू वर्गीय) में बहुभ्रूणता (Polyembryony) होती है, जिसमें बीज में एक से अधिक भ्रूण बनते हैं। इनमें से बीजांड ऊतक से बने न्युसेलर (Nucellar) पौधे मातृ पौधे जैसे होते हैं और मूलवृंत के रूप में उपयोगी हैं।
अलैंगिक प्रवर्धन की विधियाँ
| विधि | प्रकार और विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| कर्तन (Cutting) | तना, जड़ या पत्ती का टुकड़ा काटकर जड़ें उगाना। तना कर्तन कठोर काष्ठ (Hardwood), अर्ध-कठोर, कोमल और शाकीय हो सकते हैं। जड़ निकलने के लिए IBA जैसे ऑक्सिन का उपयोग | अंगूर, अनार, अंजीर, गुलाब, बोगनवेलिया |
| दाब (Layering) | शाखा को मातृ पौधे से जुड़ी अवस्था में जड़ें निकलवाना। साधारण दाब, टीला दाब (Mound/Stool), गूटी (Air layering) और ट्रेंच दाब | लीची और अमरूद (गूटी), अंगूर, चमेली |
| कलिका लगाना (Budding) | मूलवृंत पर कली (Bud) जोड़ना। T-बडिंग (शील्ड), पैच, रिंग, चिप बडिंग | नींबू वर्गीय, गुलाब, बेर, आड़ू |
| कलम बाँधना (Grafting) | मूलवृंत पर शाखा (Scion) का टुकड़ा जोड़ना। विनियर (Veneer/Side), फाँक या वेज (Cleft/Wedge), व्हिप एंड टंग, अपरोहण (Approach grafting या Inarching), एपिकोटाइल (Epicotyl) और सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग | आम (विनियर, सॉफ्टवुड, एपिकोटाइल, इनार्चिंग), सेब, नाशपाती |
| विशेष वानस्पतिक अंग | भूस्तारी, अंत:भूस्तारी, प्रकंद, कंद, बल्ब, घनकंद, चूषक और अन्य | स्ट्रॉबेरी (भूस्तारी), अदरक-हल्दी (प्रकंद), आलू (कंद), प्याज़ (बल्ब), ग्लैडियोलस (घनकंद), केला (चूषक), अनानास (स्लिप्स और चूषक) |
| सूक्ष्म प्रवर्धन (Micropropagation / Tissue culture) | कृत्रिम माध्यम में कोशिका या ऊतक से रोगमुक्त पौधे तैयार करना | केला, गन्ना, आर्किड, स्ट्रॉबेरी |
मूलवृंत (Rootstock): वह पौधा जिसका जड़ तंत्र उपयोग होता है।
सांकुर (Scion): वह भाग जो मूलवृंत पर जोड़ा जाता है और जिससे फल देने वाली शाखाएँ बनती हैं।
अनुकूलता (Compatibility): मूलवृंत और सांकुर का सफलतापूर्वक जुड़ना। इसके लिए दोनों के कैंबियम का आपस में मिलना ज़रूरी है।
कैलस (Callus): घाव पर बनने वाला कोशिकाओं का ढेर, जिससे जोड़ बनता है।
उदाहरण: नींबू वर्गीय में रफ लेमन और रंगपुर लाइम, सेब में M9 (बौना) और MM 111 जैसे मूलवृंत प्रयोग होते हैं।
प्रवर्धन संरचनाएँ (टॉपिक 6)
| संरचना | उपयोग |
|---|---|
| काँच घर / ग्रीनहाउस (Greenhouse) | नियंत्रित तापमान, नमी और प्रकाश; सजावटी पौधे और बीज अंकुरण |
| पॉलीहाउस (Polyhouse) | पॉलीथीन से ढकी संरचना; सब्जी पौध और फूलों की खेती, कम खर्च |
| छायादार घर / नेट हाउस (Shade house) | शेडनेट से ढका, तेज़ धूप और गर्मी से बचाव; पौध उगाना और कठोर बनाना |
| लाथ हाउस (Lath house) | लकड़ी की पट्टियों से बना आंशिक छायादार घर |
| मिस्ट चैंबर (Mist chamber) | रुक-रुक कर बारीक फुहार से कर्तन में नमी बनाए रखकर जड़ें निकालना |
| गर्म क्यारी और शीत फ्रेम (Hot bed / Cold frame) | गर्म क्यारी में ऊष्मा (खाद या बिजली से) दी जाती है; शीत फ्रेम में अतिरिक्त गर्मी नहीं दी जाती। इनमें सर्दी में पौध तैयार होती है |
| सूक्ष्म सुरंग (Low tunnel) | पाला और ठंड से पौधों की सुरक्षा |
| कठोरीकरण कक्ष (Hardening chamber) | टिशू कल्चर या नर्सरी के पौधों को धीरे-धीरे खुले वातावरण के अनुकूल बनाना |
बीज सुप्तावस्था और बीज अंकुरण (टॉपिक 7)
बीज सुप्तावस्था (Seed dormancy) वह अवस्था है जब जीवित बीज अनुकूल परिस्थितियों में भी अंकुरित नहीं होता।
| कारण | उपचार |
|---|---|
| कठोर बीज आवरण (भौतिक सुप्तावस्था) | खुरचना (Scarification): यांत्रिक (रेती या चाकू से), अम्ल (सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल से कुछ मिनट) या गर्म पानी |
| भ्रूण की अपरिपक्वता (शारीरिक सुप्तावस्था) | स्तरीकरण (Stratification): नम माध्यम में 0 से 5°C पर ठंडा उपचार; सेब, नाशपाती, आड़ू के बीजों में |
| रासायनिक निरोधक (जैसे ABA) | बीज को पानी में भिगोकर या बहते पानी में धोना (Leaching) |
| अन्य | जिबरेलिक अम्ल (GA3), KNO3 और थायोयूरिया से उपचार |
अंकुरण (Germination) के चरण: बीज का जल सोखना (Imbibition), एंजाइमों का सक्रिय होना, मूलांकुर (Radicle) का निकलना और पौध स्थापित होना। आवश्यक कारक: पानी, ऑक्सीजन, उपयुक्त तापमान और कुछ बीजों में प्रकाश। अंकुरण दो प्रकार का होता है: भूमिगत (Hypogeal), जिसमें बीजपत्र मिट्टी के नीचे रहते हैं (मटर, चना, आम), और भूम्युपरिक (Epigeal), जिसमें बीजपत्र ऊपर आ जाते हैं (अरंडी, पपीता, सेम)।
अंकुरण प्रतिशत = (अंकुरित बीज ÷ बोए गए बीज) × 100
400 बीज बोए और 340 उगे, तो अंकुरण = 340 ÷ 400 × 100 = 85%।
यदि 1000 पौधे चाहिए और अंकुरण 85% है, तो बीज = 1000 ÷ 0.85 ≈ 1177 बीज बोने होंगे।
भाग 3: बाग की स्थापना और प्रबंधन (सिलेबस टॉपिक 8, 9, 10)
बाग लगाने के सिद्धांत (टॉपिक 8)
- स्थान का चयन: उपयुक्त जलवायु, गहरी और अच्छे जल निकास वाली मृदा, सिंचाई का स्रोत, बाज़ार और परिवहन की सुविधा, श्रमिक और बिजली।
- योजना और ले-आउट: सड़कें, सिंचाई नालियाँ, वायुरोधक, पौधों की दूरी और मुख्य फसल के साथ भराव (Filler) या अंतर-फसल।
- वायुरोधक: बाग के चारों ओर या हवा की दिशा के विपरीत पंक्ति में शहतूत, सहजन, जामुन जैसे पेड़।
- भूमि की तैयारी और गड्ढे: गहरी जुताई, समतलन और गर्मी में गड्ढे खोदना (प्रायः 1 × 1 × 1 मीटर), मिट्टी में सड़ी गोबर की खाद और आवश्यकता पर अन्य संशोधन मिलाकर भराई।
- रोपण का समय: सदाबहार पौधे मानसून की शुरुआत या उसके बाद, पर्णपाती पौधे सुप्तावस्था में (सर्दी के अंत में)।
| रोपण पद्धति | विवरण |
|---|---|
| वर्गाकार (Square) | पंक्ति और पौधे की दूरी समान; सरल, खेती की सुविधा, पौधों की संख्या = 10000 ÷ (दूरी × दूरी) |
| आयताकार (Rectangular) | पंक्ति-से-पंक्ति दूरी अधिक; मशीनों के लिए उपयुक्त |
| षट्कोणीय (Hexagonal) | पौधे समबाहु त्रिभुज के कोनों पर; वर्गाकार से लगभग 15% अधिक पौधे |
| चतुष्कोणीय / क्विनकंक्स (Quincunx) | वर्ग के बीच में एक अतिरिक्त (भराव) पौधा; शुरू के वर्षों में अधिक आमदनी, बाद में भराव हटा दिया जाता है |
| कंटूर (Contour) | ढलान वाली भूमि में समोच्च रेखाओं पर रोपण; मृदा कटाव रोकता है |
| सघन रोपण (High density planting) | बौने मूलवृंत या किस्मों के साथ अधिक पौधे प्रति हेक्टेयर |
वर्गाकार पद्धति में 8 मी × 8 मी: क्षेत्र प्रति पौधा = 64 मी²; पौधे = 10000 ÷ 64 = 156.25 ≈ 156 पौधे।
षट्कोणीय पद्धति में 8 मी: क्षेत्र प्रति पौधा = 8² × 0.866 = 55.4 मी²; पौधे = 10000 ÷ 55.4 ≈ 180 पौधे।
यानी इसी दूरी पर षट्कोणीय पद्धति में लगभग 15% पौधे अधिक लगते हैं।
प्रशिक्षण और छँटाई: सिद्धांत और विधियाँ (टॉपिक 9)
प्रशिक्षण (Training) का अर्थ है पौधे को कम उम्र में ही वांछित आकार देना, ताकि उसका ढाँचा मज़बूत और रोशनी-हवा के लिए अनुकूल बने। छँटाई (Pruning) का अर्थ है पौधे के कुछ भागों को काटकर निकालना, ताकि वृद्धि और फलन संतुलित रहे।
| प्रशिक्षण पद्धति | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| मध्य अग्र शाखा (Central leader) | एक मुख्य तना, चारों ओर शाखाएँ, पिरामिड जैसा आकार | सेब, नाशपाती |
| खुला केंद्र (Open centre / Vase) | मुख्य तना छोटा, शाखाएँ बाहर की ओर फैलीं; बीच में रोशनी | आड़ू, आलूबुखारा, बेर |
| रूपांतरित अग्र शाखा (Modified leader) | दोनों का मिश्रण | आम, अमरूद आदि |
| अंगूर की बेलों का प्रशिक्षण | बाउअर या पंडाल, टेलीफोन, निफिन (Kniffin) और हेड पद्धति | अंगूर |
- छँटाई के उद्देश्य: सूखी, रोगी और टूटी शाखाएँ हटाना, आकार बनाए रखना, प्रकाश-हवा का प्रवेश, नई वृद्धि, फलन में नियमितता और फल की गुणवत्ता।
- प्रकार: शीर्ष कटाई (Heading back), विरलन (Thinning out) और पुनरुद्धार छँटाई।
- समय: पर्णपाती फलों में सुप्तावस्था में; सदाबहार फलों में कटाई के बाद या वृद्धि के चरण को देखकर। अंगूर में बेल की तैयारी के लिए नींव छँटाई और फल के लिए फलन छँटाई अलग से की जाती है।
- कटे घाव पर: बोर्डो पेस्ट या चौबटिया पेस्ट लगाएँ, ताकि रोग न लगे।
किशोरावस्था, पुष्प कली विभेदन, अफलन, परागण, निषेचन और अनिषेकफलन (टॉपिक 10)
- किशोरावस्था (Juvenility): वह प्रारंभिक अवस्था जिसमें पौधा सर्वोत्तम परिस्थितियों में भी फूल नहीं देता। बीज से उगे पौधों में यह अवधि अधिक होती है, इसीलिए कलमी पौधे जल्दी फलते हैं।
- पुष्प कली विभेदन (Flower bud differentiation): वानस्पतिक कली का पुष्प कली में बदलना। इसके चरण हैं प्रेरण (Induction), आरंभन (Initiation) और विभेदन (Differentiation)। इसे प्रभावित करने वाले कारक हैं C:N अनुपात (अधिक कार्बोहाइड्रेट और कम नाइट्रोजन फूल लाने में सहायक), तापमान, प्रकाश अवधि, जल की कमी, वलयन (Girdling) और वृद्धि नियामक।
- अफलन (Unfruitfulness): फूल आकर भी फल न लगना, या फूल ही न आना। कारण: परागण की कमी, स्व-असंगति (Self-incompatibility), नर या मादा बंध्यता, पाला या बारिश, अधिक वानस्पतिक वृद्धि (अधिक नाइट्रोजन) और पोषक तत्वों का असंतुलन। उपाय: परागणकर्ता किस्में लगाना, मधुमक्खी पालन, संतुलित खाद, वलयन और वृद्धि नियामक।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| परागण (Pollination) | परागकणों का वर्तिकाग्र तक पहुँचना। स्व-परागण (उसी फूल या पौधे में) और पर-परागण (दूसरे पौधे से) |
| परागणकर्ता किस्म (Pollinizer) | वह किस्म (पौधा) जो पराग देती है, जैसे सेब में परागण के लिए अलग किस्म लगाना |
| परागणकारी (Pollinator) | वह साधन जो पराग पहुँचाता है, जैसे मधुमक्खी, कीट या हवा |
| निषेचन (Fertilization) | नर युग्मक और अंडाणु का संलयन; आवृतबीजी पौधों में दोहरा निषेचन होता है |
| अनिषेकफलन (Parthenocarpy) | निषेचन के बिना फल बनना, बीज रहित। उदाहरण: केला, अनानास। अंगूर की थॉम्पसन सीडलेस किस्म में स्टेनोस्पर्मोकार्पी होती है (निषेचन होता है पर बीज विकसित नहीं होते)। ऑक्सिन के छिड़काव से टमाटर आदि में भी इसे प्रेरित किया जा सकता है |
भाग 4: औषधीय पौधे, वृद्धि नियामक, सिंचाई और खाद (सिलेबस टॉपिक 11, 12, 13)
औषधीय और सुगंधित पौधे: महत्व और क्षेत्र (टॉपिक 11)
महत्व: आयुर्वेद, यूनानी और आधुनिक औषधि उद्योग, इत्र, साबुन, खाद्य और प्रसाधन उद्योग में कच्चा माल, निर्यात से आय, शुष्क क्षेत्रों में वैकल्पिक फसल और ग्रामीण रोज़गार। भारत की जैव विविधता और विविध जलवायु इस क्षेत्र को बड़ी संभावना देती है।
| पौधा | वैज्ञानिक नाम | उपयोगी भाग / प्रमुख तत्व |
|---|---|---|
| अश्वगंधा | Withania somnifera | जड़; विथानोलाइड्स |
| इसबगोल | Plantago ovata | बीज की भूसी (Husk)। भारत इसका प्रमुख उत्पादक और निर्यातक है; राजस्थान और गुजरात मुख्य क्षेत्र |
| सनाय | Cassia angustifolia | पत्ती और फली; सेन्नोसाइड्स (विरेचक) |
| एलोवेरा (घृतकुमारी) | Aloe vera | पत्ती का गूदा और रस; एलोइन |
| सर्पगंधा | Rauvolfia serpentina | जड़; रिसर्पिन (उच्च रक्तचाप में) |
| सफेद मूसली | Chlorophytum borivilianum | कंदिल जड़ें |
| ब्राह्मी | Bacopa monnieri | पूरा पौधा |
| गुग्गल | Commiphora wightii | गोंद-राल |
| मेहंदी | Lawsonia inermis | पत्तियाँ; राजस्थान (पाली, सोजत) की प्रसिद्ध फसल |
| पुदीना (जापानी) | Mentha arvensis | तेल; मेन्थॉल |
| नींबू घास | Cymbopogon flexuosus | तेल; सिट्राल |
| पामारोज़ा | Cymbopogon martinii | तेल; जिरेनियॉल |
| खस (वेटिवर) | Chrysopogon zizanioides | जड़ों से तेल |
| गुलाब (दमिश्क) | Rosa damascena | पंखुड़ियों से गुलाब तेल और जल |
सुगंधित तेल निकालने की विधियाँ: भाप आसवन (Steam distillation), जल आसवन (Hydro-distillation), विलायक निष्कर्षण (Solvent extraction) और एन्फ्ल्यूरेज (Enfleurage)।
बागवानी में पादप वृद्धि नियामकों का महत्व (टॉपिक 12)
पादप वृद्धि नियामक (Plant bio-regulators, PGR) वे रसायन हैं जो बहुत कम मात्रा में पौधे की वृद्धि और विकास को बदलते हैं।
| वर्ग | उदाहरण | प्रमुख उपयोग |
|---|---|---|
| ऑक्सिन (Auxins) | IAA, IBA, NAA, 2,4-D | कर्तन में जड़ निकलना (IBA, NAA), फल झड़ना रोकना और फल लगना, विरलन (सेब में NAA), अनिषेकफलन, खरपतवार नियंत्रण (2,4-D) |
| जिबरेलिन (Gibberellins) | GA3 | बीज सुप्तावस्था तोड़ना, फलों का आकार बढ़ाना (अंगूर), पौधे में लंबाई, फूल आना |
| साइटोकाइनिन (Cytokinins) | किनेटिन, BAP | कोशिका विभाजन, ऊतक संवर्धन में प्ररोह निकालना, कटे फूलों की आयु बढ़ाना |
| एथिलीन (Ethylene) | एथेफोन (एथ्रेल) | फल पकाना (आम, केला, टमाटर), अनानास में फूल लाना, कटाई के लिए पत्ती-फल गिराना |
| एबसिसिक अम्ल (ABA) | प्राकृतिक निरोधक | सुप्तावस्था, तनाव में रंध्र बंद करना |
| वृद्धि मंदक (Retardants) | CCC (क्लोरमेक्वाट), पैक्लोब्यूट्राज़ोल (PBZ), मैलिक हाइड्रेज़ाइड (MH) | बौना बनाना (CCC); आम में नियमित फलन और अनावधि फूल (PBZ); आलू-प्याज़ में अंकुरण रोकना (MH) |
1 ppm = 1 मिग्रा प्रति लीटर।
100 ppm का 2 लीटर घोल बनाने के लिए = 100 × 2 = 200 मिग्रा PGR चाहिए।
50 ppm NAA का 500 मिली घोल: 50 × 0.5 = 25 मिग्रा NAA।
अधिकांश PGR पानी में कम घुलते हैं, इसलिए पहले थोड़े अल्कोहल या क्षार (जैसे NaOH) में घोलकर फिर पानी मिलाया जाता है।
सिंचाई की विधियाँ और बागवानी फसलों में उर्वरक का प्रयोग (टॉपिक 13)
| सिंचाई की विधि | विवरण |
|---|---|
| थाला / वलय थाला (Basin / Ring basin) | पेड़ के चारों ओर गोल थाला; तने से थोड़ी दूरी पर रखें ताकि कॉलर भाग में पानी न रुके और सड़न न हो |
| कुंड (Furrow) | सब्जियों और बाग में पंक्तियों के बीच नालियों से |
| क्यारी / चेक बेसिन (Check basin) | छोटी-छोटी क्यारियाँ, समतल भूमि में |
| बौछारी (Sprinkler) | फुहार के रूप में, असमतल भूमि और रेतीली मृदा के लिए |
| टपक / ड्रिप (Drip) | पाइप और ड्रिपर से सीधे जड़ क्षेत्र में बूँद-बूँद। पानी और श्रम की भारी बचत, खरपतवार कम और फर्टिगेशन संभव |
| सूक्ष्म बौछारी और बबलर (Micro-sprinkler / Bubbler) | पेड़ों के लिए कम दबाव पर छोटे क्षेत्र में सिंचाई |
- क्रांतिक अवस्थाएँ: फूल आने और फल बनने के समय पानी की कमी हानिकारक होती है। आम में फूल आने के समय सिंचाई नहीं की जाती और फल लगने के बाद शुरू की जाती है।
- ड्रिप प्रणाली के घटक: पंप, फिल्टर, मुख्य और उप-मुख्य पाइप, लेटरल, ड्रिपर और वाल्व।
- पलवार (Mulching) से नमी बचती है और खरपतवार घटते हैं।
उर्वरक प्रयोग के सिद्धांत
- मात्रा: पौधे की उम्र, किस्म, मृदा परीक्षण और फसल के अनुसार। छोटे पौधों में मात्रा हर साल बढ़ाई जाती है और एक उम्र के बाद स्थिर हो जाती है।
- समय: पर्णपाती पौधों में कली फूटने से पहले; सदाबहार पौधों में फसल कटाई के बाद और फूल आने से पहले। नाइट्रोजन को कई बार में (विभाजित मात्रा में) देना बेहतर रहता है।
- स्थान: पेड़ के छत्र के किनारे (Canopy periphery) पर, जहाँ सक्रिय जड़ें होती हैं, तने के पास नहीं। विधियाँ: वलय, पट्टी (Band), छिड़काव, पर्णीय छिड़काव और फर्टिगेशन।
- गोबर की खाद और सूक्ष्म पोषक तत्व: जैविक खाद हर साल दें; ज़िंक, बोरोन और आयरन की कमी में पर्णीय छिड़काव।
मान लीजिए किसी आम के पेड़ के लिए सिफारिश है: प्रति वर्ष उम्र के हिसाब से 100 ग्राम नाइट्रोजन। 6 वर्ष के पेड़ को नाइट्रोजन = 6 × 100 = 600 ग्राम।
यूरिया में 46% नाइट्रोजन होता है, इसलिए यूरिया = 600 ÷ 0.46 ≈ 1304 ग्राम ≈ 1.3 किग्रा।
असली मात्रा के लिए अपने राज्य की सिफारिश देखें।
प्रैक्टिकल की झलक
सामान्यतः इस विषय के प्रैक्टिकल में निम्नलिखित काम होते हैं (अपने विश्वविद्यालय के प्रैक्टिकल मैनुअल से मिला लें):
- बागवानी फसलों की पहचान और वर्गीकरण, पौधों के वैज्ञानिक नाम और कुल।
- प्रवर्धन की विधियों का अभ्यास: कर्तन, दाब, कलिका और कलम बाँधना।
- नर्सरी क्यारी बनाना, बीजोपचार और प्रवर्धन संरचनाओं की जानकारी।
- बाग का ले-आउट, गड्ढे खोदना और रोपण पद्धतियाँ।
- प्रशिक्षण और छँटाई का अभ्यास।
- वृद्धि नियामकों के घोल बनाना, सिंचाई और उर्वरक प्रयोग की विधियाँ, औषधीय-सुगंधित पौधों की पहचान।
सोचिए और हल कीजिए
प्रश्न 1: 250 बीज बोए गए और 190 अंकुरित हुए। अंकुरण प्रतिशत कितना है? उत्तर: 190 ÷ 250 × 100 = 76%
प्रश्न 2: 6 मी × 6 मी की वर्गाकार दूरी पर प्रति हेक्टेयर कितने पौधे लगेंगे? उत्तर: 10000 ÷ 36 = 277.8 ≈ 277 पौधे
प्रश्न 3: 100 ppm का 2 लीटर PGR घोल बनाने के लिए कितने मिलीग्राम PGR चाहिए? उत्तर: 100 × 2 = 200 मिग्रा
परीक्षा के लिए कैसे लिखें और याद रखें
- वर्गीकरण के उत्तर में आधार लिखें और हर आधार के साथ उदाहरण दें।
- प्रवर्धन की विधियों में कर्तन, दाब, कलिका, कलम और विशेष अंग का क्रम याद रखें और हर विधि का एक उदाहरण फसल सहित लिखें।
- Pollinizer और Pollinator, Training और Pruning, Budding और Grafting के अंतर हमेशा पूछे जाते हैं।
- बाग की रोपण पद्धतियों के साथ पौधों की संख्या का सूत्र लिखें।
- PGR वाले उत्तर में वर्ग, एक उदाहरण और उपयोग तीनों लिखें।
- चित्र बनाएँ: T-बडिंग, विनियर ग्राफ्टिंग, गूटी और रोपण पद्धतियाँ। चित्र से अंक बढ़ते हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. Olericulture किसके अध्ययन को कहते हैं? (अ) फलों (ब) सब्जियों (स) फूलों (द) बागान फसलों। उत्तर: ब
Q2. गूटी (Air layering) किस फल में सबसे अधिक प्रचलित है? (अ) आम (ब) केला (स) लीची (द) सेब। उत्तर: स
Q3. केला का प्रवर्धन मुख्यतः किससे होता है? (अ) बीज (ब) चूषक और टिशू कल्चर (स) T-बडिंग (द) गूटी। उत्तर: ब
Q4. वह साधन जो पराग को पहुँचाता है, क्या कहलाता है? (अ) Pollinizer (ब) Pollinator (स) Pollen (द) Scion। उत्तर: ब
Q5. निषेचन के बिना बने फल को क्या कहते हैं? (अ) बहुभ्रूणता (ब) अनिषेकफलन (स) अफलन (द) किशोरावस्था। उत्तर: ब
Q6. अनानास में फूल लाने के लिए किसका उपयोग होता है? (अ) CCC (ब) एथेफोन (स) MH (द) साइटोकाइनिन। उत्तर: ब
Q7. नम माध्यम में 0 से 5°C पर बीज को रखने की क्रिया क्या कहलाती है? (अ) खुरचना (ब) स्तरीकरण (स) कठोरीकरण (द) वलयन। उत्तर: ब
Q8. फर्टिगेशन का अर्थ क्या है? (अ) सिंचाई जल के साथ उर्वरक देना (ब) पत्तियों पर खाद छिड़कना (स) खाद को गड्ढे में भरना (द) कंपोस्ट बनाना। उत्तर: अ
Q9. इसबगोल का वैज्ञानिक नाम क्या है? (अ) Withania somnifera (ब) Plantago ovata (स) Aloe vera (द) Mentha arvensis। उत्तर: ब
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: बागवानी और कृषि में क्या फर्क है?
उत्तर: कृषि में सभी फसलें आती हैं, जबकि बागवानी में विशेष रूप से फल, सब्जी, फूल, मसाले, औषधीय और बागान फसलें आती हैं, जिनमें प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक आमदनी और गहन देखभाल की ज़रूरत होती है।
प्रश्न: कलमी पौधा बीज वाले पौधे से बेहतर क्यों है?
उत्तर: कलमी पौधा मातृ पौधे के गुण बनाए रखता है, जल्दी फल देता है और कम ऊँचाई का होता है।
प्रश्न: कलिका लगाने और कलम बाँधने में क्या अंतर है?
उत्तर: कलिका लगाने में सांकुर के रूप में एक कली जोड़ी जाती है, जबकि कलम बाँधने में कई कलियों वाली शाखा का टुकड़ा जोड़ा जाता है।
प्रश्न: प्रशिक्षण और छँटाई में क्या अंतर है?
उत्तर: प्रशिक्षण कम उम्र में पौधे को आकार देना है, जबकि छँटाई पौधे के कुछ भागों को काटकर वृद्धि और फलन का संतुलन बनाए रखना है।
प्रश्न: ड्रिप सिंचाई के क्या फायदे हैं?
उत्तर: पानी और श्रम की बचत, खरपतवारों में कमी, उर्वरक को पानी के साथ देने (फर्टिगेशन) की सुविधा और असमतल या रेतीली भूमि में भी उपयोग।
प्रश्न: सिलेबस में कुल कितने टॉपिक और लेक्चर हैं?
उत्तर: थ्योरी में 13 टॉपिक हैं और कुल 16 लेक्चर निर्धारित हैं।
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आगे पढ़ने के लिए
संदर्भ: के.एल. चड्ढा (संपा.), Handbook of Horticulture (ICAR); एन. कुमार, Introduction to Horticulture; हार्टमैन और केस्टर, Plant Propagation: Principles and Practices; ICAR e-course और अपने राज्य कृषि विश्वविद्यालय की पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज़।
लेखक की टिप्पणी: यह लेख सिलेबस के आधार पर मौलिक रूप से तैयार किया गया है। उदाहरण अभ्यास हेतु हैं। उत्पादन के आँकड़े, उर्वरक की मात्रा और वृद्धि नियामकों की सांद्रता समय-समय पर और राज्य के अनुसार बदलती हैं, इसलिए प्रकाशित करने से पहले राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की ताज़ा रिपोर्ट और अपने राज्य कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश से जाँच लें।
