समस्याग्रस्त मृदाएँ एवं उनका प्रबंधन (Problematic Soils and their Management, SSAC-221) B.Sc. (Hons.) Agriculture के चौथे सेमेस्टर का 2 क्रेडिट (1+1) का कोर्स है। लवणीय, क्षारीय, अम्लीय और जलभराव वाली मृदाएँ देश की बड़ी कृषि भूमि को प्रभावित करती हैं और राजस्थान जैसे शुष्क राज्य में खारे भूजल और नहरी सिंचित क्षेत्र की समस्याएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। सिलेबस में 16 थ्योरी और 16 प्रैक्टिकल लेक्चर हैं। इस लेख में सभी टॉपिक क्रमवार, तालिकाओं, सूत्रों, MCQ और FAQ के साथ समझाए गए हैं।
1. मृदा गुणवत्ता और मृदा स्वास्थ्य
मृदा गुणवत्ता (Soil quality): मृदा की वह क्षमता जिससे वह पारिस्थितिक तंत्र की सीमाओं के भीतर जैविक उत्पादकता बनाए रखे, पर्यावरण की गुणवत्ता बढ़ाए और पौधों व जीवों के स्वास्थ्य को सहारा दे (डोरन व पार्किन, 1994)। मृदा स्वास्थ्य (Soil health): मृदा की एक जीवित तंत्र के रूप में लगातार कार्य करने की क्षमता।
संकेतक (Indicators)
| वर्ग | संकेतक |
|---|---|
| भौतिक | बनावट, आयतन घनत्व, सरंध्रता, अंतःस्यंदन दर, समूह स्थिरता (Aggregate stability), जल धारण क्षमता, मृदा की गहराई, संघनन (Penetration resistance) |
| रासायनिक | pH, विद्युत चालकता (EC), कार्बनिक कार्बन/पदार्थ, CEC, उपलब्ध N, P, K, सूक्ष्म पोषक तत्व, ESP/SAR, भारी धातुएँ |
| जैविक | सूक्ष्मजीवी जैव-भार कार्बन, मृदा श्वसन (CO₂ निष्कासन), केंचुओं की संख्या, एंजाइम क्रिया (डीहाइड्रोजिनेज़, यूरिएज़, फॉस्फेटेज़), नाइट्रोजन खनिजीकरण |
मृदा गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
मूल पदार्थ, जलवायु, भूमि उपयोग, जुताई पद्धति, उर्वरक व जैविक खाद का प्रयोग, फसल चक्र, सिंचाई जल की गुणवत्ता, कटाव, संघनन, प्रदूषण (भारी धातु, कीटनाशी) और लवणीकरण।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card)
- योजना का शुभारंभ 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (राजस्थान) से हुआ; नारा: "स्वस्थ धरा, खेत हरा"।
- प्रत्येक खेत की मृदा का प्रायः हर 2 वर्ष में परीक्षण।
- कार्ड में 12 मानकों की जानकारी: मुख्य पोषक तत्व (N, P, K), द्वितीयक तत्व (S), सूक्ष्म तत्व (Zn, Fe, Cu, Mn, B) और भौतिक-रासायनिक मानक (pH, EC, जैविक कार्बन)।
- खेत के लिए फसल-वार उर्वरक व सुधारकों की अनुशंसा।
- महत्व: संतुलित उर्वरक उपयोग, लागत में कमी, उत्पादकता में वृद्धि और मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण।
2. भारत में बंजर भूमि और समस्याग्रस्त मृदाओं का वितरण
बंजर भूमि (Wasteland): ऐसी निम्नीकृत भूमि जिसका उसकी क्षमता के अनुसार उपयोग नहीं हो रहा। राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड (NWDB, 1985) के अनुसार इसमें कटाव युक्त (गली व बीहड़) भूमि, लवणीय-क्षारीय भूमि, जलमग्न/दलदली भूमि, झाड़ियों वाली ऊपरी भूमि, झूम खेती वाले क्षेत्र, निम्नीकृत चरागाह व वन, रेतीली भूमि, खदान की भूमि, पथरीली/चट्टानी भूमि और ढालू भूमि शामिल हैं। देश में बंजर भूमि लगभग 5–6 करोड़ हेक्टेयर के आसपास आँकी जाती है (भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 17%)।
| कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्र | मुख्य समस्याएँ |
|---|---|
| शुष्क (राजस्थान, गुजरात, हरियाणा का भाग) | पवन क्षरण, बालू के टीले, खारा भूजल, लवणीय मृदा, इंदिरा गांधी नहर कमान में जलभराव और द्वितीयक लवणीकरण |
| सिंधु-गंगा मैदान | क्षारीय (सोडिक) मृदाएँ (उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब), जलभराव |
| काली मृदा क्षेत्र (डेक्कन) | लवणीय-सोडिक मृदाएँ, जलभराव, जल क्षरण |
| तटीय क्षेत्र | तटीय लवणीय मृदाएँ और अम्ल सल्फेट मृदाएँ (केरल, पश्चिम बंगाल, ओडिशा) |
| उत्तर-पूर्व, पश्चिमी घाट, छोटानागपुर | अम्लीय मृदाएँ, झूम खेती से भूमि निम्नीकरण |
| चंबल व अन्य बीहड़ क्षेत्र | गली क्षरण, बीहड़ (राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश) |
अनुमानित क्षेत्र: लवणीय-क्षारीय मृदाएँ लगभग 67 लाख हेक्टेयर (लगभग 28 लाख हे. क्षारीय व लगभग 38 लाख हे. लवणीय), अम्लीय मृदाएँ लगभग 4–5 करोड़ हेक्टेयर (आँकड़े स्रोत के अनुसार भिन्न)।
3. लवणीय और क्षारीय (Saline & Sodic) मृदाओं का वर्गीकरण
अमेरिकी लवणता प्रयोगशाला (USSL; रिचर्ड्स, 1954; USDA Handbook 60) के अनुसार:
| वर्ग | ECe (dS/m) | ESP | pH | विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| लवणीय (Saline) | > 4 | < 15 | < 8.5 | घुलनशील लवणों की अधिकता; सतह पर सफेद पपड़ी; अच्छी संरचना; स्थानीय नाम: रेह |
| क्षारीय/सोडिक (Sodic) | < 4 | > 15 | > 8.5 | Na⁺ की अधिकता; कोलॉइड का बिखराव; खराब संरचना, कम जल निकास; काली पपड़ी (ब्लैक अल्कली); स्थानीय नाम: ऊसर |
| लवणीय-क्षारीय (Saline-sodic) | > 4 | > 15 | सामान्यतः < 8.5 | दोनों गुण; लवण बहने पर सोडिक बन सकती है |
SAR (सोडियम अधिशोषण अनुपात) = Na⁺ / √[(Ca²⁺ + Mg²⁺)/2] (सभी सांद्रताएँ me/L में)
लगभग SAR 13 ≈ ESP 15 के समान मानी जाती है।
उत्पत्ति के कारण
- चट्टानों के अपक्षय से लवण; शुष्क जलवायु में वाष्पोत्सर्जन > वर्षा, जिससे लवण सतह पर जमा।
- खारे भूजल का केशिका उत्थान; ऊँचा जल स्तर, खराब जल निकास।
- नहरी सिंचाई से रिसाव व जलभराव (द्वितीयक लवणीकरण); खराब गुणवत्ता का सिंचाई जल।
- समुद्री जल का प्रवेश, तटीय क्षेत्र।
पौधों पर प्रभाव
परासरणी (Osmotic) प्रभाव से "शारीरिक सूखा", Na⁺/Cl⁻/B की विषाक्तता, Ca व K की कमी, उच्च pH से Zn व Fe की कमी, खराब भौतिक दशा (पपड़ी, कम अंतःस्यंदन), अंकुरण में कमी और सूक्ष्मजीव क्रिया में गिरावट।
4. लवणीय और क्षारीय मृदाओं का सुधार और प्रबंधन
(क) लवणीय मृदाएँ
- जल निकास: पहले सतही या उप-सतही जल निकास व्यवस्था; ऊँचे भूजल को नीचे करना (टाइल ड्रेन, ट्यूबवेल से ऊर्ध्वाधर निकास)।
- निक्षालन (Leaching): अच्छी गुणवत्ता के जल से लवण जड़ क्षेत्र से नीचे धोना। मोटे अनुमान से प्रति 1 सेमी मृदा गहराई के लिए लगभग 1 सेमी जल से लगभग 70–80% लवण निकल जाते हैं।
- सतह की पपड़ी हटाना (Scraping) और क्यारी बाँधकर बाढ़ विधि से धोना।
- मल्चिंग से वाष्पन घटाना; जैविक खाद व हरी खाद (ढैंचा) का प्रयोग।
- कृषि उपाय: मेड़ और कूँड़ बनाकर बीज को मेड़ के किनारे (लवण कम वाली तरफ) बोना; अधिक बीज दर; रोपाई; लवण-सहनशील फसलें व किस्में।
ECiw = सिंचाई जल की चालकता; ECdw = जड़ क्षेत्र से बाहर जाने वाले जल की स्वीकार्य चालकता। रोडेस के अनुसार LR = ECw / (5 ECe − ECw)
(ख) क्षारीय (सोडिक) मृदाएँ
उद्देश्य: विनिमेय Na⁺ को Ca²⁺ से बदलना और बने सोडियम लवण को निक्षालन से हटाना।
| सुधारक | क्रियाविधि |
|---|---|
| जिप्सम (CaSO₄·2H₂O) | सबसे प्रचलित; 2NaX + CaSO₄ → CaX₂ + Na₂SO₄ (निक्षालित); Na₂CO₃ + CaSO₄ → CaCO₃ + Na₂SO₄ |
| पाइराइट (FeS₂), गंधक (S), सल्फ्यूरिक अम्ल | ऑक्सीकरण से H₂SO₄ बनता है, जो मृदा के CaCO₃ को घोलकर Ca²⁺ देता है; चूनेदार क्षारीय मृदाओं में उपयोगी |
| प्रेसमड (चीनी मिल का अवशेष), शीरा, हरी खाद, FYM | कार्बनिक अम्ल व CO₂ से Ca घुलनशील बनना, संरचना सुधार |
| कैल्शियम क्लोराइड/नाइट्रेट | महँगे, सीमित उपयोग |
ΔNa (me/100 ग्राम) = [(ESPप्रारंभिक − ESPलक्षित) / 100] × CEC
GR (टन/हे.) = 1.72 × ΔNa ÷ जिप्सम की शुद्धता (अंश में)
उदाहरण: CEC = 20 me/100 ग्राम, ESP 30 → 10; ΔNa = 0.20 × 20 = 4; GR = 1.72 × 4 = 6.9 टन/हे. (शुद्ध); 75% शुद्ध जिप्सम हो तो ≈ 9.2 टन/हे.
प्रयोग की विधि: महीन पिसा हुआ जिप्सम (2 मिमी की छलनी से) खेत में बिखेरकर ऊपरी 10–15 सेमी में मिलाना; फिर मेड़बंदी कर पानी भरना व निकासी देना। पहली फसल धान (जलभराव में निक्षालन के लिए) और उसके बाद गेहूँ/बरसीम उपयुक्त।
सहनशील फसलें
| सहनशीलता | फसलें |
|---|---|
| अधिक सहनशील | जौ, कपास, चुकंदर, खजूर, ढैंचा, करनाल घास (Leptochloa fusca), रोड्स घास, बरमूडा घास |
| मध्यम सहनशील | गेहूँ (खारचिया 65, KRL 1-4, KRL 19), धान (CSR किस्में), सरसों (CS 52, CS 54), ज्वार, बाजरा, सूरजमुखी, अनार, बेर, अमरूद, आँवला |
| संवेदनशील | मक्का, दलहन (चना, मटर), मूँगफली, सोयाबीन, प्याज, गाजर |
5. अम्लीय और अम्ल सल्फेट मृदाओं का वर्गीकरण, सुधार व प्रबंधन
(क) अम्लीय मृदाएँ
pH प्रायः 6.5 से कम (अत्यधिक अम्लीय: 5.5 से कम)। भारत में लैटराइट, लाल और वन मृदाओं में (पूर्वोत्तर, केरल, ओडिशा, झारखंड, कर्नाटक)।
| कारण | समस्याएँ |
|---|---|
| अधिक वर्षा से क्षारकों (Ca, Mg, K) का निक्षालन; क्षार-रहित मूल पदार्थ (ग्रेनाइट); अम्ल बनाने वाले उर्वरक (अमोनियम सल्फेट, यूरिया, DAP); कार्बनिक अम्ल; Al³⁺ का जल-अपघटन | Al³⁺ व Mn²⁺ विषाक्तता; H⁺ विषाक्तता; Ca, Mg, Mo की कमी; Fe-Al द्वारा फॉस्फोरस का स्थिरीकरण; राइजोबियम व नाइट्रीकरण जीवाणुओं की कम क्रिया |
सुधार: चूना प्रयोग (Liming)
| चूना पदार्थ | लगभग CCE (%) |
|---|---|
| कैल्शियम कार्बोनेट (कृषि चूना पत्थर) | 100 |
| डोलोमाइट [CaMg(CO₃)₂] | लगभग 109 |
| बुझा चूना [Ca(OH)₂] | लगभग 136 |
| अनबुझा चूना (CaO) | लगभग 179 |
| बेसिक स्लैग (इस्पात उद्योग), लकड़ी की राख, प्रेसमड, कागज मिल का कीचड़ | पदार्थ के अनुसार भिन्न |
- चूने की आवश्यकता (LR): बफर विधि (SMP बफर), टाइट्रेशन या विनिमेय अम्लीयता पर आधारित। कैम्प्राथ सूत्र: LR (टन CaCO₃/हे.) ≈ 1.5 × विनिमेय Al (cmol(p⁺)/kg)।
- प्रयोग: बुवाई से 3–4 सप्ताह पहले महीन चूना खेत में मिलाना; कूँड़ में डालना (कम मात्रा); दलहन-तिलहन के बीज पर चूना पेलेट करना।
- अन्य उपाय: जैविक खाद, अम्ल-सहनशील फसलें (चाय, अनानास, जई, चावल, आलू), क्षारीय उर्वरक (कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, रॉक फॉस्फेट)।
(ख) अम्ल सल्फेट मृदाएँ
तटीय/ज्वारीय क्षेत्रों में पाइराइट (FeS₂) युक्त अवसादों के जलनिकास के बाद हवा के संपर्क में ऑक्सीकृत होने से बनती हैं। pH 3.5 से कम (प्रायः 2–3.5)। भारत में केरल (कुट्टनाड, पोक्कली, कैपाड़), पश्चिम बंगाल (सुंदरबन) और ओडिशा के तटीय क्षेत्र।
जारोसाइट [KFe₃(SO₄)₂(OH)₆] के हल्के पीले धब्बे (Mottles) पहचान हैं।
- समस्याएँ: अत्यधिक अम्लीयता, Al व Fe विषाक्तता, लवणता, H₂S, फॉस्फोरस की कमी।
- सुधार: मीठे जल या ज्वार के जल से निक्षालन व धुलाई; जलस्तर ऊँचा रखकर ऑक्सीकरण रोकना (जल से ढक कर रखना); भारी मात्रा में चूना; नियंत्रित जल निकास/जलकपाट (जैसे केरल में थन्नीरमुक्कम बैराज); P-K खाद; अम्ल व लवण सहनशील धान किस्में (पोक्कली, वयटिला)।
6. अति पारगम्य और अल्प पारगम्य मृदाएँ
| पारगम्यता वर्ग (USDA) | दर (सेमी/घंटा) |
|---|---|
| बहुत धीमी | < 0.125 |
| धीमी / मध्यम धीमी | 0.125–0.5 / 0.5–2.0 |
| मध्यम | 2.0–6.25 |
| मध्यम तेज / तेज / बहुत तेज | 6.25–12.5 / 12.5–25 / > 25 |
| बिंदु | अति पारगम्य (रेतीली, मोटी बनावट) | अल्प पारगम्य (भारी चिकनी, सोडिक, संघनित) |
|---|---|---|
| समस्याएँ | कम जल धारण, अत्यधिक रिसाव, पोषक तत्वों (N, K) का निक्षालन, सूखा, कम कार्बनिक पदार्थ, पवन क्षरण | जलभराव, खराब वायु संचार, पपड़ी, अपवाह व क्षरण, कठोर परत (Hard pan) |
| प्रबंधन | चिकनी मिट्टी/तालाब की गाद या बेंटोनाइट मिलाना; कार्बनिक पदार्थ (FYM, कम्पोस्ट); मल्चिंग; हल्की व बार-बार सिंचाई (ड्रिप/स्प्रिंकलर); रोपित धान में पडलिंग; भूमिगत अवरोध परत (मिट्टी/पॉलीथीन); खाद के कई बार प्रयोग; पवन अवरोधक; बाजरा, मूँगफली, लोबिया जैसी फसलें | सतही व उप-सतही जल निकास; गहरी जुताई (चिज़ल/सबसॉइलिंग); जिप्सम (सोडिक में); कार्बनिक पदार्थ; चौड़ी क्यारी-कूँड़ (BBF) या मेड़-कूँड़; गहरी जड़ वाली हरी खाद/फसलें; गीली मृदा में जुताई से बचाव |
7. दूर संवेदन (Remote Sensing) और GIS का उपयोग
दूर संवेदन: किसी वस्तु से सीधे संपर्क के बिना उपग्रह, विमान या ड्रोन पर लगे सेंसर से उसके परावर्तित/उत्सर्जित विद्युत-चुम्बकीय विकिरण द्वारा जानकारी प्राप्त करना। GIS (भौगोलिक सूचना प्रणाली): स्थानिक डेटा को एकत्र, संग्रहित, विश्लेषित और नक्शे के रूप में प्रदर्शित करने वाली कंप्यूटर प्रणाली; विभिन्न परतों (Layers) का ओवरले।
| तकनीक / उपकरण | उपयोग |
|---|---|
| IRS (Resourcesat: LISS-III, LISS-IV, AWiFS), Landsat, Sentinel-2 | लवणीय, क्षारीय, अम्लीय व जलमग्न क्षेत्रों का नक्शा; बंजर भूमि का मानचित्रण |
| स्पेक्ट्रल सूचकांक (NDVI = (NIR − Red)/(NIR + Red), लवणता सूचकांक) | फसल की सेहत व लवणता का आकलन; लवणीय मृदा की सतह पर उच्च परावर्तन |
| माइक्रोवेव (SAR), थर्मल, हाइपरस्पेक्ट्रल | बादलों में भी चित्र, मृदा नमी व लवणता मापना |
| EM38 जैसे भू-सेंसर | स्पष्ट चालकता (ECa) का क्षेत्र में मानचित्रण |
| GPS/NavIC | स्थान-निर्धारण, मृदा नमूना बिंदुओं का सटीक रिकॉर्ड |
| GIS | सुधार कार्यक्रम की निगरानी, जिप्सम/ट्यूबवेल हेतु स्थल चयन, भूमि उपयोग योजना, कटाव जोखिम का मॉडल (USLE), स्थान-विशिष्ट पोषक प्रबंधन |
भारत में इस कार्य में NRSC (हैदराबाद), NBSS&LUP (नागपुर), CSSRI (करनाल) और ISRO का "भुवन" पोर्टल प्रमुख हैं। परिवर्तन की पहचान (Change detection) के लिए अलग-अलग वर्षों के चित्रों की तुलना की जाती है।
8. बहुउद्देशीय वृक्षों (MPT) द्वारा मृदा का जैव-उपचार
जैव-उपचार (Bioremediation/Biological reclamation): पेड़-पौधों के प्रयोग से मृदा सुधार करना, जो रासायनिक सुधारकों की तुलना में सस्ता और टिकाऊ है।
- क्रियाविधि: जड़ों की क्रिया से मृदा में छिद्र व जल निकास बेहतर; पत्तियों से जैविक पदार्थ व कार्बनिक अम्ल; बढ़ा CO₂ और कार्बोनिक अम्ल से मृदा का CaCO₃ घुलकर Ca²⁺ देना; जल स्तर को नीचे करना (जैव-जल निकास, Bio-drainage); छाया से वाष्पन कम।
- क्षारीय/लवणीय मृदा के उपयुक्त वृक्ष: देशी बबूल (Acacia nilotica), विलायती बबूल (Prosopis juliflora), यूकेलिप्टस, अर्जुन (Terminalia arjuna), कैज़ुराइना, करंज (Pongamia pinnata), नीम, टैमेरिक्स, खेजड़ी (Prosopis cineraria; शुष्क क्षेत्र), खारी जाल (Salvadora persica)।
- अन्य उपयोग: खेत के चारों ओर पवन अवरोधक; ईंधन, चारा और लकड़ी; कृषि वानिकी प्रणाली (वृक्ष + फसल/घास)।
- फाइटोरेमेडिएशन (भारी धातु युक्त मृदा): सरसों (Pb, Cd), सूरजमुखी, वेटिवर घास और Pteris (आर्सेनिक) जैसे अतिसंचयी पौधे।
9. भूमि क्षमता वर्गीकरण और भूमि उपयुक्तता वर्गीकरण
(क) भूमि क्षमता वर्गीकरण (USDA; क्लिंगबील व मोंटगोमरी, 1961)
| वर्ग | सीमाएँ व उपयोग |
|---|---|
| I | बहुत कम सीमाएँ; समतल, गहरी, उपजाऊ; सघन खेती हेतु |
| II | मध्यम सीमाएँ; साधारण संरक्षण उपाय |
| III | गंभीर सीमाएँ; विशेष संरक्षण उपाय |
| IV | अत्यंत गंभीर सीमाएँ; फसल चयन सीमित; सावधानी से खेती |
| V | कटाव का खतरा कम, पर अन्य अपरिहार्य बाधाएँ (जलभराव, पथरीली); चारागाह/वन |
| VI | गंभीर सीमाएँ; खेती अनुपयुक्त; चारागाह व वन |
| VII | अत्यंत गंभीर सीमाएँ; चरागाह/वन्य |
| VIII | किसी वाणिज्यिक उत्पादन के लिए अनुपयुक्त; वन्यजीव, जल-ग्रहण क्षेत्र, मनोरंजन |
वर्ग I-IV खेती योग्य (Arable) और V-VIII खेती के लिए अयोग्य (Non-arable)। उप-वर्ग: e (कटाव), w (अधिक जल), s (मृदा/जड़ क्षेत्र की सीमा), c (जलवायु की सीमा)।
(ख) भूमि उपयुक्तता वर्गीकरण (FAO, 1976)
| क्रम/वर्ग | अर्थ |
|---|---|
| S (उपयुक्त) | S1: अत्यधिक उपयुक्त; S2: मध्यम उपयुक्त; S3: सीमांत रूप से उपयुक्त |
| N (अनुपयुक्त) | N1: वर्तमान में अनुपयुक्त पर सुधार से संभव; N2: स्थायी रूप से अनुपयुक्त |
उप-वर्ग सीमाओं को दर्शाता है (जैसे S2w, S3s)। मुख्य अंतर: क्षमता वर्गीकरण भूमि की सामान्य उपयोग-क्षमता (सीमाओं पर आधारित) बताता है, जबकि उपयुक्तता वर्गीकरण किसी विशिष्ट फसल/उपयोग के लिए भूमि की उपयुक्तता बताता है।
10. सिंचाई जल की गुणवत्ता: मापदंड, वर्गीकरण और मानक
गुणवत्ता के मापदंड
- कुल घुलनशील लवण/EC (लवणता का खतरा)।
- सोडियम का खतरा: SAR।
- अवशिष्ट सोडियम कार्बोनेट (RSC) = (CO₃²⁻ + HCO₃⁻) − (Ca²⁺ + Mg²⁺), me/L में।
- विशिष्ट आयन विषाक्तता: Na⁺, Cl⁻, बोरॉन; बाइकार्बोनेट; नाइट्रेट, फ्लोराइड व भारी धातुएँ; pH।
USSL वर्गीकरण (रिचर्ड्स, 1954)
| लवणता वर्ग | EC (µS/cm) | सोडियम वर्ग | SAR |
|---|---|---|---|
| C1 (कम) | 100–250 | S1 (कम) | < 10 |
| C2 (मध्यम) | 250–750 | S2 (मध्यम) | 10–18 |
| C3 (अधिक) | 750–2250 | S3 (अधिक) | 18–26 |
| C4 (बहुत अधिक) | > 2250 | S4 (बहुत अधिक) | > 26 |
RSC के मानक: < 1.25 me/L सुरक्षित; 1.25–2.5 सीमांत; > 2.5 असुरक्षित। भारत में AICRP (लवणीय जल) के मानकों में अच्छा जल: EC < 2 dS/m, SAR < 10, RSC < 2.5 me/L; लवणीय जल: EC > 4 dS/m; क्षारीय जल: RSC > 2.5। FAO (एयर्स व वेस्टकॉट, 1985) के अनुसार ECw < 0.7 dS/m पर कोई प्रतिबंध नहीं; 0.7–3.0 पर मध्यम; > 3.0 पर गंभीर सीमाएँ। बोरॉन 0.7 मिग्रा/ली से अधिक होने पर संवेदनशील फसलों को हानि।
11. खारे जल का प्रबंधन और कृषि में उपयोग
| फसल | उपज घटना शुरू होने की ECe (dS/m; सन्निकट) |
|---|---|
| जौ | 8.0 |
| कपास | 7.7 |
| चुकंदर | 7.0 |
| ज्वार | 6.8 |
| गेहूँ | 6.0 |
| सोयाबीन | 5.0 |
| मूँगफली | 3.2 |
| धान | 3.0 |
| मक्का | 1.7 |
| प्याज | 1.2 |
बीज अंकुरण और पौध अवस्था लवणता के प्रति सबसे संवेदनशील होती है।
प्रबंधन के उपाय
- फसल/किस्म चयन: जौ, कपास, चुकंदर, सरसों, गेहूँ की सहनशील किस्में (खारचिया 65, KRL), खजूर, बेर, अनार व अमरूद।
- सिंचाई विधियाँ: बार-बार हल्की सिंचाई (मृदा नमी अधिक बनाए रखने के लिए); ड्रिप सिंचाई (लवण जड़ क्षेत्र के बाहर धकेलना); फुहार (स्प्रिंकलर) में पत्तियों की जलन का ध्यान।
- मिश्रण (Blending) और चक्रीय (Cyclic) उपयोग: खारे जल को नहर जल से मिलाना, या संवेदनशील अवस्थाओं (अंकुरण, पौध) में अच्छा जल व सहनशील अवस्थाओं में खारा जल देना।
- निक्षालन: LR के अनुसार 10–15% अतिरिक्त जल; वर्षा ऋतु में प्राकृतिक निक्षालन।
- कृषि क्रियाएँ: मेड़-कूँड़ पर बुवाई, अधिक बीज दर, मल्चिंग, जैविक खाद व हरी खाद।
- RSC वाले जल: जिप्सम से उपचार (जिप्सम बेड तकनीक, CSSRI) या खेत में जिप्सम प्रयोग।
- जल निकास व निगरानी: जल स्तर और मृदा लवणता की नियमित जाँच।
- वैकल्पिक प्रयोग: लवण-सहनशील वृक्ष, चारा घास और हैलोफाइट (जैसे Atriplex, Salicornia) की जैव-लवणीय खेती।
राजस्थान के कई क्षेत्रों में भूजल लवणीय या फ्लोराइड युक्त है, इसलिए जल जाँच के बाद ही सिंचाई की योजना बनाएँ।
12. प्रैक्टिकल में क्या सीखेंगे
| प्रयोग | विधि (संक्षेप में) |
|---|---|
| अम्लीय, लवणीय, चूनेदार मृदाओं का लक्षण-वर्णन | pH, EC (मृदा : जल 1 : 2), विनिमेय अम्लीयता, CaCO₃ की जाँच |
| Ca²⁺ व Mg²⁺ (मृदा व भूजल) | EDTA (वर्सेनेट) टाइट्रेशन: Ca को pH 12 पर म्यूरेक्साइड सूचक से; Ca + Mg को pH 10 पर एरियोक्रोम ब्लैक T से; Mg = (Ca + Mg) − Ca |
| Na⁺ व K⁺ | फ्लेम फोटोमीटर से |
| CO₃²⁻ व HCO₃⁻ | H₂SO₄ से टाइट्रेशन: फिनॉल्फ्थेलिन से CO₃²⁻ और मिथाइल ऑरेंज से HCO₃⁻ |
| क्लोराइड (Cl⁻) | मोहर विधि: AgNO₃ से टाइट्रेशन, K₂CrO₄ सूचक (ईंट-लाल अवक्षेप) |
| सल्फेट (SO₄²⁻) | BaCl₂ से टर्बिडिमेट्रिक या ग्रैविमेट्रिक विधि |
| चूनेदार मृदा में CaCO₃ | रैपिड टाइट्रेशन: मानक HCl से उपचार और NaOH से वापसी टाइट्रेशन |
| जिप्सम की आवश्यकता (क्षारीय मृदा) | शूनोवर विधि (5N NaCl व EDTA) या ESP/CEC से गणना |
| चूने की आवश्यकता (अम्लीय मृदा) | SMP बफर विधि/टाइट्रेशन |
| SAR व RSC की गणना | नीचे दिए सूत्रों से |
SAR = Na⁺ / √[(Ca²⁺ + Mg²⁺)/2] (me/L)
RSC = (CO₃²⁻ + HCO₃⁻) − (Ca²⁺ + Mg²⁺) (me/L)
ESP = (विनिमेय Na⁺ / CEC) × 100
EC (dS/m) × 640 ≈ कुल घुलनशील लवण (mg/L) (EC 5 dS/m तक लगभग)
me/L = mg/L ÷ तुल्यांकी भार (Na 23, Ca 20, Mg 12.2, K 39, Cl 35.5, HCO₃ 61, SO₄ 48)
जिप्सम (टन/हे.) = 1.72 × ΔNa (me/100 ग्राम) ÷ शुद्धता
13. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)
- लवणीय: EC > 4 dS/m, ESP < 15, pH < 8.5; सोडिक: EC < 4, ESP > 15, pH > 8.5।
- सोडिक मृदा का सुधार जिप्सम से; पहली फसल धान; लवणीय मृदा का सुधार निक्षालन व जल निकास से।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड: 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (राजस्थान) से; 12 मानक।
- अम्लीय मृदा: चूना; अम्ल सल्फेट मृदा: पाइराइट ऑक्सीकरण; जलस्तर ऊँचा रखें।
- USSL जल वर्गीकरण: C1-C4 और S1-S4; RSC > 2.5 me/L असुरक्षित।
- भूमि क्षमता: 8 वर्ग (I-IV खेती योग्य); FAO उपयुक्तता: S1-S3, N1-N2।
- जिप्सम: 1 me Na/100 ग्राम के लिए लगभग 1.72 टन/हे. (15 सेमी गहराई)।
- जैव-उपचार: बबूल, यूकेलिप्टस, अर्जुन, कैज़ुराइना, करंज, खेजड़ी।
14. महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. लवणीय मृदा में ESP का मान होता है: (अ) > 15 (ब) < 15 (स) > 25 (द) शून्य। उत्तर: ब
Q2. सोडिक मृदा के सुधार के लिए सर्वाधिक प्रयुक्त पदार्थ है: (अ) चूना (ब) यूरिया (स) जिप्सम (द) पोटाश। उत्तर: स
Q3. सिंचाई जल में RSC के लिए सुरक्षित सीमा है: (अ) < 1.25 me/L (ब) 2.5–5 me/L (स) > 5 me/L (द) > 10 me/L। उत्तर: अ
Q4. मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना कहाँ से शुरू हुई? (अ) जयपुर (ब) सूरतगढ़ (स) नई दिल्ली (द) करनाल। उत्तर: ब
Q5. अम्ल सल्फेट मृदा का मुख्य कारण है: (अ) पाइराइट का ऑक्सीकरण (ब) चूने की अधिकता (स) अधिक Na⁺ (द) कम वर्षा। उत्तर: अ
Q6. USDA भूमि क्षमता वर्ग "VIII" का अर्थ है: (अ) अत्यधिक उपजाऊ (ब) मध्यम सीमा (स) खेती हेतु अनुपयुक्त, वन्यजीव/मनोरंजन (द) केवल धान। उत्तर: स
Q7. SAR के सूत्र में किसकी सांद्रता का वर्गमूल लिया जाता है? (अ) Na (ब) (Ca + Mg)/2 (स) K (द) Cl। उत्तर: ब
Q8. जैव-जल निकास (Bio-drainage) के लिए उपयुक्त पेड़ है: (अ) यूकेलिप्टस (ब) आम (स) अनार (द) केला। उत्तर: अ
15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: SSAC-221 के कितने क्रेडिट और लेक्चर हैं?
उत्तर: 2 क्रेडिट (1+1); थ्योरी के 16 और प्रैक्टिकल के 16 लेक्चर।
प्रश्न: लवणीय मृदा में जिप्सम क्यों नहीं डाला जाता?
उत्तर: इसमें Na⁺ की अधिकता नहीं होती (ESP < 15); मुख्य समस्या घुलनशील लवण है, जिसे निक्षालन व जल निकास से हटाया जाता है।
प्रश्न: चूना डालने से अम्लीय मृदा में क्या लाभ होता है?
उत्तर: pH बढ़ता है, Al व Mn की विषाक्तता घटती है, Ca-Mg मिलते हैं, फॉस्फोरस की उपलब्धता और सूक्ष्मजीव क्रिया बढ़ती है।
प्रश्न: खारे पानी से सिंचाई सुरक्षित कब होती है?
उत्तर: जब जल की EC सहनशील फसलों की सीमा में हो, फसल सहनशील हो, निक्षालन व जल निकास की व्यवस्था हो और RSC अधिक होने पर जिप्सम से उपचार किया जाए।
प्रश्न: भूमि क्षमता और उपयुक्तता में क्या अंतर है?
उत्तर: क्षमता सामान्य उपयोग-सीमाओं पर आधारित होती है, जबकि उपयुक्तता किसी विशेष फसल/उपयोग के लिए भूमि की योग्यता बताती है।
प्रश्न: RS और GIS का समस्याग्रस्त मृदा में क्या उपयोग है?
उत्तर: प्रभावित क्षेत्र की सीमा व गंभीरता का नक्शा, सुधार की निगरानी, स्थल चयन और भूमि उपयोग योजना बनाना।
16. Free Study Material Download करें
नीचे दी गई तालिका से Problematic Soils and their Management के नोट्स, किताबें, PPT और Word फाइल डाउनलोड करें।
| सामग्री | Download |
|---|---|
| हिंदी PDF नोट्स | Hindi PDF 1Hindi PDF 2Hindi PDF 3 |
| English PDF Notes | English PDF 1English PDF 2English PDF 3 |
| Books (किताबें) | Book 1Book 2Book 3 |
| PPT | PPT Download |
| Word File | Word Download |
संदर्भ पुस्तकें (Reference Books)
एफ.ई. बियर, Chemistry of the Soil, ऑक्सफोर्ड एवं IBH (1964); जे.जे. जुरिनाक, Salt-affected Soils, यूटा स्टेट यूनिवर्सिटी (1978); एल.ए. रिचर्ड्स (सं.), Diagnosis and Improvement of Saline and Alkali Soils, USDA Handbook No. 60 (1954); आई.पी. अबरोल एवं वी.वी. ध्रुवनारायण, Technologies for Wasteland Development, ICAR (1998); सिरसन पॉल, Principles of Remote Sensing, लॉन्गमैन (1985); एल.एल. सोमानी एवं के.एल. तोतावत, Management of Salt-affected Soils and Waters, एग्रोटेक पब्लिशिंग एकेडमी, उदयपुर (1993); अग्रवाल, यादव एवं गुप्ता, Saline-Alkali Soils of India, ICAR (1982); ISSS, Fundamentals of Soil Science, IARI, नई दिल्ली (2009)।
नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। क्षेत्रफल के आँकड़े और सहनशीलता सीमाएँ स्रोत के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती हैं; परीक्षा से पहले अपनी पाठ्यपुस्तक/ICAR की नवीनतम रिपोर्ट से मिलान करें। पाठ्यक्रम का स्रोत: Swami Keshwanand Rajasthan Agricultural University, Bikaner की Vth Deans' Committee Report।
