मृदा विज्ञान के मूल सिद्धांत (Fundamentals of Soil Science, SSAC) | B.Sc. Ag. Notes Hindi & English (PDF,BOOK,PPT)

B.Sc. Agriculture ke Fundamentals of Soil Science (SSAC-111) ke notes: mrida utpatti, weathering, texture, structure, soil water, pH, soil colloids, C

मृदा विज्ञान के मूल सिद्धांत (Fundamentals of Soil Science, SSAC-111) B.Sc. (Hons.) Agriculture के पहले वर्ष का 3 क्रेडिट (2+1) का आधारभूत कोर्स है। फसल उत्पादन, उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई और भूमि सुधार सब मिट्टी की समझ पर टिके हैं। सिलेबस में 32 थ्योरी (21 टॉपिक) और 16 प्रैक्टिकल लेक्चर हैं। इस लेख में सभी टॉपिक क्रमवार, तालिकाओं, सूत्रों, MCQ और FAQ के साथ आसान हिंदी में समझाए गए हैं।

मृदा (Soil) पृथ्वी की सबसे ऊपरी वह परत है, जो चट्टानों के अपक्षय और जैविक पदार्थों के अपघटन से बनी है और जिसमें पौधे उगते हैं। इसे दो दृष्टिकोणों से देखा जाता है: मृदा-उत्पत्ति विज्ञान (Pedology) और पौध-उत्पादन विज्ञान (Edaphology)।

1. मृदा एक प्राकृतिक पिंड के रूप में: पेडोलॉजिकल और एडाफोलॉजिकल अवधारणाएँ

अवधारणाअर्थ
पेडोलॉजिकल (Pedological)मृदा को स्वतंत्र प्राकृतिक पिंड मानकर उसकी उत्पत्ति, आकारिकी, वर्गीकरण और वितरण का अध्ययन। वी.वी. डोकुचैव (रूस) को आधुनिक मृदा विज्ञान का जनक माना जाता है।
एडाफोलॉजिकल (Edaphological)(Edaphos = भूमि) मृदा को पौधों के उगने के माध्यम के रूप में देखना; उर्वरता, उत्पादकता और फसल प्रबंधन पर ध्यान।

एक आदर्श मृदा का आयतन के अनुसार संघटन: खनिज पदार्थ लगभग 45%, कार्बनिक पदार्थ लगभग 5%, जल लगभग 25% और वायु लगभग 25%। जल और वायु का अनुपात बदलता रहता है, पर दोनों मिलकर लगभग 50% (रंध्र स्थान) होते हैं।

2. मृदा की उत्पत्ति: मृदा निर्माणकारी चट्टानें और खनिज

(क) चट्टानों का वर्गीकरण

प्रकारबनना / विशेषताउदाहरण
आग्नेय (Igneous)पिघले मैग्मा के ठंडे होने से। सिलिका के आधार पर: अम्लीय (>65%; ग्रेनाइट), मध्यम, क्षारीय (45–52%; बेसाल्ट, गैब्रो)। जमाव के अनुसार: अंतर्वेधी (मोटे कण) और बाह्य (बारीक कण)।ग्रेनाइट, बेसाल्ट (डेक्कन ट्रैप), गैब्रो
अवसादी (Sedimentary)अपरदित पदार्थ के जमाव से परतों में बनीबलुआ पत्थर, शेल, चूना पत्थर
कायांतरित (Metamorphic)ताप और दाब से रूप बदलने परनीस (ग्रेनाइट से), स्लेट (शेल से), संगमरमर (चूना पत्थर से), क्वार्टजाइट (बलुआ पत्थर से)

(ख) प्रमुख खनिज

  • प्राथमिक खनिज (चट्टानों में मूल): क्वार्ट्ज, फेल्डस्पार (ऑर्थोक्लेज़, प्लैजियोक्लेज़), अभ्रक (मस्कोवाइट, बायोटाइट), हॉर्नब्लेंड, ऑगाइट, ओलिवीन।
  • द्वितीयक खनिज (अपक्षय से बने): मृत्तिका खनिज (काओलिनाइट, मॉन्टमोरिलोनाइट, इलाइट, क्लोराइट), आयरन व एल्युमीनियम ऑक्साइड (हेमेटाइट, गोएथाइट, जिब्साइट), कैल्साइट, डोलोमाइट, जिप्सम।
  • अपक्षय के प्रति प्रतिरोध: क्वार्ट्ज सर्वाधिक प्रतिरोधी, ओलिवीन सबसे कम।

3. चट्टानों का अपक्षय (Weathering)

प्रकारप्रक्रियाएँ
भौतिक (विघटन)तापमान में परिवर्तन से फैलाव-संकुचन, पाला (जमना-पिघलना), पर्त उतरना (Exfoliation), जल, वायु और हिमनदों से घिसाव, पौधों की जड़ों और जीवों की क्रिया
रासायनिक (अपघटन)जल-अपघटन (Hydrolysis; सबसे महत्वपूर्ण): फेल्डस्पार → काओलिनाइट; जलयोजन: हेमेटाइट → लिमोनाइट; ऑक्सीकरण: Fe²⁺ → Fe³⁺ (लाल/पीला रंग); अपचयन: नीला-भूरा (Gley) रंग; कार्बोनेशन: CaCO₃ + H₂O + CO₂ → Ca(HCO₃)₂ (घुलनशील); घोलन: लवण, जिप्सम घुलना
जैविकलाइकेन, काई, सूक्ष्मजीव और जड़ों द्वारा कार्बनिक अम्ल का स्राव; चट्टान की दरारों में जड़ों का प्रवेश

4. मृदा निर्माण के कारक और प्रक्रियाएँ

जेनी का समीकरण (1941): S = f (Cl, O, R, P, T, ...)
S = मृदा; Cl = जलवायु; O = जीव; R = उच्चावच/भू-आकृति; P = मूल पदार्थ; T = समय
  • सक्रिय कारक: जलवायु (तापमान, वर्षा) और जीव (वनस्पति, सूक्ष्मजीव, केंचुए)।
  • निष्क्रिय कारक: मूल पदार्थ, भू-आकृति (ढलान, ऊँचाई) और समय।

मृदा निर्माण की मूल प्रक्रियाएँ

प्रक्रियाविवरण
एल्यूवियेशन / इल्यूवियेशनकणों का ऊपरी परत से निकलकर निचली परत में जमा होना (क्रमशः निक्षालन व संचय)
निक्षालन (Leaching)घुलनशील पदार्थों का जल के साथ नीचे बहना
कैल्सीकरणअर्ध-शुष्क क्षेत्रों में CaCO₃ का जमाव (मॉलिसोल)
पॉडज़ोलीकरणठंडी, नम, अम्लीय जलवायु और चीड़-वनों में Fe, Al व जैविक पदार्थों का निक्षालन; राख जैसी धूसर परत
लैटराइटीकरणगर्म आर्द्र क्षेत्रों में सिलिका का निक्षालन और Fe, Al ऑक्साइड का संचय; लैटराइट मृदा
लवणीकरण व क्षारीकरणशुष्क क्षेत्रों में घुलनशील लवण व Na⁺ का संचय
ग्लेइकरण (Gleization)जलभराव में अपचयन से नीला-धूसर रंग
ह्यूमीकरणकार्बनिक पदार्थ का ह्यूमस में परिवर्तन

सामान्य प्रक्रियाएँ (सिमोन्सन, 1959): योग (Additions), हानि (Losses), स्थानांतरण (Translocations), रूपांतरण (Transformations)।

5. मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile) और मृदा के घटक

मृदा परिच्छेदिका: सतह से मूल चट्टान तक मृदा का ऊर्ध्वाधर काट, जो विभिन्न संस्तरों (Horizons) में बँटा रहता है।

संस्तरविवरण
Oकार्बनिक पदार्थ की सतही परत (वन मृदाओं में)
A (ऊपरी मृदा)खनिज + ह्यूमस का मिश्रण; सर्वाधिक जैविक क्रिया, जड़ें और निक्षालन
Eअधिकतम निक्षालन वाली हल्के रंग की परत
B (अधोमृदा)इल्यूवियल; चिकनी मिट्टी, Fe, Al का संचय
Cआंशिक अपक्षयित मूल पदार्थ
Rअपरिवर्तित आधार चट्टान
  • सोलम (Solum): A + B (वास्तविक मृदा)।
  • पेडॉन: मृदा की सबसे छोटी त्रि-आयामी इकाई (लगभग 1–10 वर्ग मीटर); कई समान पेडॉन मिलकर पॉलीपेडॉन।

मृदा के चार घटक: खनिज पदार्थ, कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस), जल और वायु।

6. मृदा के भौतिक गुण: मृदा बनावट (Texture)

बनावट का अर्थ मृदा में रेत, गाद (Silt) और चिकनी मिट्टी (Clay) के कणों का आपेक्षिक अनुपात है (2 मिमी से छोटे कण)। इसे कृषि कार्यों से सुधारना कठिन है।

कणअंतर्राष्ट्रीय पद्धति (Atterberg)USDA पद्धति
मोटी रेत2.0–0.2 मिमी2.0–0.5 मिमी (बहुत मोटी, मोटी व मध्यम रेत सहित)
महीन रेत0.2–0.02 मिमी0.5–0.05 मिमी (महीन व बहुत महीन रेत सहित)
गाद (Silt)0.02–0.002 मिमी0.05–0.002 मिमी
चिकनी मिट्टी (Clay)< 0.002 मिमी< 0.002 मिमी

बनावट के वर्ग: USDA के बनावट त्रिभुज (Textural triangle) में 12 वर्ग हैं: रेतीली, लोमी रेत, बलुई दोमट, दोमट, गाद दोमट, गाद, बलुई चिकनी दोमट, चिकनी दोमट, गादयुक्त चिकनी दोमट, बलुई चिकनी, गादयुक्त चिकनी और चिकनी।

महत्व

जल धारण क्षमता, निक्षालन, वायु संचार, उर्वरता, CEC, जुताई की सुगमता और फसल चयन सब बनावट पर निर्भर हैं। रेतीली मृदा में जल निकास अच्छा पर जल धारण कम; चिकनी मृदा में जल धारण अधिक पर जल निकास व जुताई कठिन।

कण आकार विश्लेषण और स्टोक्स का नियम

विधियाँ: बाउयूकस हाइड्रोमीटर विधि और अंतर्राष्ट्रीय पिपेट विधि। पहले कार्बनिक पदार्थ को H₂O₂ से हटाया जाता है और कणों को सोडियम हेक्सामेटाफॉस्फेट (कैल्गॉन) से फैलाया (Dispersion) जाता है।

स्टोक्स का नियम: v = [2 g r² (ds − dl)] / (9 η)
v = कण के बैठने का वेग; g = गुरुत्व त्वरण; r = कण की त्रिज्या; ds = कण का घनत्व; dl = द्रव का घनत्व; η = द्रव की श्यानता
निष्कर्ष: बड़े कण तेजी से (वेग r² के समानुपाती) और छोटे कण धीरे बैठते हैं। मान्यताएँ: कण गोल, चिकने, कठोर हों और स्वतंत्र रूप से गिरें।

7. मृदा संरचना (Soil Structure)

मृदा के कणों का समूहों (Peds/Aggregates) में व्यवस्थित होना संरचना कहलाता है।

प्रकारआकृति व स्थानकृषि महत्व
गोलाकार (दानेदार/क्रंब)गोल, A संस्तर मेंसर्वोत्तम; वायु-जल संतुलन
परतदार (Platy)चपटी परतें, संघनित मृदा मेंजल निकास व जड़ वृद्धि बाधित
प्रिज़्मीय व स्तंभाकार (Prismatic, Columnar)ऊर्ध्वाधर स्तंभ; स्तंभाकार में गोल शीर्ष (सोडिक मृदा)B संस्तर में; जल निकास कम
ब्लॉकी (कोणीय/उपकोणीय)घनाकार; B संस्तर मेंमध्यम जल निकास
एकल दाने (Single grain)बिना जुड़े कण, रेतीली मृदाअधिक जल निकास, कम जल धारण
संपिंडित (Massive)कणों का ठोस पिंडखराब; जड़ प्रवेश कठिन

संरचना का वर्णन: प्रकार (आकृति), वर्ग (आकार: बहुत सूक्ष्म से बहुत मोटा) और श्रेणी (मजबूती: संरचनाहीन, कमजोर, मध्यम, मजबूत)।

संरचना निर्माण की क्रियाविधि

  • स्कंदन (Flocculation): Ca²⁺ जैसे धनायनों से चिकनी मिट्टी कणों का जुड़ना।
  • सीमेंटिंग पदार्थ: कार्बनिक पदार्थ (पॉलीसैकेराइड, ह्यूमस), Fe-Al ऑक्साइड, CaCO₃।
  • गीला-सूखा और जमना-पिघलना, जड़ों की क्रिया, कवक तंतु, केंचुए।

संरचना का प्रबंधन

FYM, कम्पोस्ट और हरी खाद का प्रयोग; उचित नमी पर जुताई और कम जुताई; फसल चक्र (घास/दलहन); मल्चिंग; भारी मशीन से संघनन से बचाव; क्षारीय मृदा में जिप्सम, अम्लीय मृदा में चूना।

8. आयतन घनत्व, कण घनत्व और सरंध्रता

मापपरिभाषा / सूत्र
आयतन घनत्व (Bulk density, Db)सूखी मृदा का भार / कुल आयतन (रंध्र सहित); g/cm³ या Mg/m³। सामान्यतः 1.1–1.6 g/cm³; जैविक मृदा में बहुत कम।
कण घनत्व (Particle density, Dp)ठोस कणों का भार / ठोस का आयतन; खनिज मृदा के लिए औसत 2.65 g/cm³
सरंध्रता (Porosity)= (1 − Db/Dp) × 100 %
रिक्ति अनुपात (Void ratio)रंध्र आयतन / ठोस आयतन
  • प्रभावित करने वाले कारक: बनावट, संरचना, कार्बनिक पदार्थ, संघनन और गहराई। रेतीली मृदा में Db अधिक, चिकनी में कम; Dp कार्बनिक पदार्थ बढ़ने पर घटता है।
  • महत्व: जल अंतःस्यंदन, जड़ प्रवेश (Db 1.6 से अधिक होने पर बाधा), वायु संचार, खेत की मृदा के भार का आकलन।
  • खेत की सतह के 15 सेमी (फ़रो स्लाइस) का भार: 1 हेक्टेयर में लगभग 2 × 10⁶ किग्रा (Db ≈ 1.33 पर)।
  • नियंत्रण: जैविक पदार्थ और गहरी जुताई से Db घटाना; भारी मशीनों के प्रयोग से बचना।

9. मृदा संसंजकता (Consistence) और सुघट्यता (Plasticity)

नमी की अवस्थावर्णन के शब्द
गीलीचिपचिपी (Sticky), सुघट्य (Plastic)
नमढीली, भुरभुरी (Friable), दृढ़ (Firm)
सूखीढीली, मुलायम, कठोर

सुघट्यता: दबाव में बिना टूटे आकार बदलने और दबाव हटने पर आकार बनाए रखने का गुण; चिकनी मिट्टी की मात्रा व प्रकार (मॉन्टमोरिलोनाइट में अधिक) पर निर्भर।

एटरबर्ग सीमाएँ

  • निम्न सुघट्य सीमा (Plastic limit): वह नमी %, जिस पर मृदा से 3 मिमी मोटी धागेनुमा रचना बिना टूटे बन सके।
  • उच्च सुघट्य सीमा (Liquid limit): वह नमी %, जिस पर मृदा बहने लगती है।
  • सुघट्यता सूचकांक (PI) = उच्च सीमा − निम्न सीमा।

कृषि महत्व: जुताई का सही समय (भुरभुरी अवस्था) चुनना; बहुत गीली या बहुत सूखी मृदा में जुताई से ढेले/संघनन।

10. मृदा रंग और मन्सेल रंग चार्ट

मन्सेल पद्धति में रंग तीन घटकों से लिखा जाता है: ह्यू (मुख्य रंग), वैल्यू (चमक/हल्कापन) और क्रोमा (रंग की शुद्धता)। उदाहरण: 10YR 5/3 (ह्यू 10YR, वैल्यू 5, क्रोमा 3)।

रंगकारण
गहरा काला/भूराकार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस), मॉन्टमोरिलोनाइट
लालहेमेटाइट (अच्छा जल निकास)
पीलागोएथाइट (जलयोजित आयरन ऑक्साइड)
नीला-धूसर (Gley)जलभराव, Fe का अपचयन
सफेदCaCO₃, जिप्सम, लवण, सिलिका
चितकबरा (Mottles)बारी-बारी से गीला-सूखा

महत्व: जल निकास, कार्बनिक पदार्थ, तापमान (गहरी मृदा अधिक ऊष्मा सोखती है) और मृदा वर्गीकरण का संकेतक।

11. मृदा वर्गीकरण (Soil Taxonomy) और भारत की मृदाएँ

USDA सॉयल टैक्सोनॉमी (1975, संशोधित 1999) में छह श्रेणियाँ हैं: ऑर्डर → सबऑर्डर → ग्रेट ग्रुप → सबग्रुप → फैमिली → सीरीज़। 12 मृदा ऑर्डर हैं: एल्फिसोल, एंडिसोल, एरिडिसोल, एंटिसोल, जेलिसोल, हिस्टोसोल, इन्सेप्टिसोल, मॉलिसोल, ऑक्सिसोल, स्पोडोसोल, अल्टिसोल, वर्टिसोल।

भारतीय मृदाUSDA ऑर्डर (मुख्य)क्षेत्र व विशेषता
जलोढ़ (Alluvial)इन्सेप्टिसोल, एंटिसोलसबसे बड़े क्षेत्र में; गंगा-सिंधु मैदान; उपजाऊ; पुरानी (बाँगर) व नई (खादर); गेहूँ, धान, गन्ना
काली (रेगुर)वर्टिसोलडेक्कन ट्रैप (बेसाल्ट) से; महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात; राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में; नमी धारण अधिक, सूखने पर दरारें; कपास, सोयाबीन
लालएल्फिसोल, अल्टिसोलआयरन ऑक्साइड के कारण लाल; तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा; कम उर्वर
लैटराइटऑक्सिसोल, अल्टिसोलअधिक वर्षा व तापमान; केरल, कर्नाटक; अम्लीय, निक्षालित; चाय, कॉफी, काजू
मरुस्थलीयएरिडिसोल, एंटिसोलराजस्थान का पश्चिमी भाग; रेतीली, कार्बनिक पदार्थ कम; बाजरा, मोठ, ग्वार
पर्वतीय/वनइन्सेप्टिसोल, एल्फिसोलहिमालय क्षेत्र; फल, चाय
लवणीय-क्षारीय—शुष्क-अर्धशुष्क क्षेत्र; विशेष सुधार आवश्यक
पीट/दलदलीहिस्टोसोलकेरल (कुट्टनाड), ओडिशा, पश्चिम बंगाल तटीय क्षेत्र

भारत के मृदा आदेशों में सबसे अधिक क्षेत्र इन्सेप्टिसोल (लगभग 39%), फिर एंटिसोल, एल्फिसोल, वर्टिसोल और एरिडिसोल का है (आँकड़े सन्निकट)।

12. मृदा जल: वर्गीकरण और धारण करने वाले बल

जल का प्रकारविवरण
गुरुत्वीय जलबड़े रंध्रों में, गुरुत्व से नीचे बह जाता है; पौधों को प्रायः उपलब्ध नहीं (अधिक देर रहने पर हानिकारक)
केशिका जलसूक्ष्म रंध्रों में केशिका बल से; पौधों को उपलब्ध मुख्य जल
आर्द्रताग्राही जल (Hygroscopic)कणों की सतह पर कसकर चिपका हुआ; पौधों को अनुपलब्ध

प्रमुख मृदा जल नियतांक

नियतांकअर्थतनाव / pF
अधिकतम जल धारण क्षमता (MWHC)सभी रंध्र जल से भरे (संतृप्ति)—
क्षेत्र क्षमता (Field capacity)अतिरिक्त जल निकलने के 2–3 दिन बाद रोकी गई नमीलगभग −1/3 बार; pF ≈ 2.5
स्थायी म्लानि बिंदु (PWP)जहाँ पौधा स्थायी रूप से मुरझा जाता है−15 बार; pF ≈ 4.2
आर्द्रताग्राही गुणांकशुष्क मृदा द्वारा संतृप्त वायु से सोखी नमीलगभग −31 बार; pF ≈ 4.5
उपलब्ध जल (Available water) = क्षेत्र क्षमता − स्थायी म्लानि बिंदु
pF = log₁₀ (जल तनाव, सेमी जल स्तंभ में)

जल धारण के बल: आसंजन (जल-ठोस सतह), संसंजन (जल-जल) और पृष्ठ तनाव। जल विभव के घटक: आव्यूह (Matric), परासरणी, गुरुत्वीय और दाब विभव।

13. मृदा जल की गति और पौधों को उपलब्धता

  • संतृप्त प्रवाह: डार्सी के नियम से: q = K × (ΔH / L); K = जलीय चालकता, ΔH/L = जलीय प्रवणता।
  • असंतृप्त प्रवाह: अधिक नमी/अधिक विभव से कम नमी की ओर; केशिका बल से।
  • वाष्प की गति: तापमान व वाष्प दाब के अंतर से।
  • अंतःस्यंदन, परिस्रवण, पारगम्यता: जल का सतह से भीतर जाना, नीचे बहना और मृदा में से गुजर पाने की क्षमता।
  • केशिका उत्थान: जूरिन का नियम; सूक्ष्म नली में जल ऊँचाई ∝ 1/त्रिज्या (h ≈ 0.15/r सेमी, r सेमी में)। महीन रंध्र में अधिक ऊँचाई, पर धीमी गति।
  • उपलब्धता को प्रभावित करने वाले कारक: बनावट (दोमट/गाद दोमट में सर्वाधिक उपलब्ध जल), संरचना, कार्बनिक पदार्थ, जड़ की गहराई, वाष्पोत्सर्जन की माँग।

13A. मृदा वायु: संघटन, गैस विनिमय और पौध वृद्धि में महत्व

गैसवायुमंडलमृदा वायु
नाइट्रोजनलगभग 78–79%लगभग 79%
ऑक्सीजनलगभग 21%कम (प्रायः 18–20.6%)
कार्बन डाइऑक्साइडलगभग 0.04%अधिक (0.2–3% या अधिक)
जलवाष्पपरिवर्तनशीललगभग संतृप्त (RH ≈ 100%)
अन्य—जलभराव में मीथेन, H₂S, एथिलीन
  • गैस विनिमय: मास फ्लो (दाब, तापमान, वर्षा, हवा से) और विसरण (Diffusion; सबसे प्रमुख; आंशिक दाब के अंतर से)।
  • वायु संचार का माप: ऑक्सीजन विसरण दर (ODR); लगभग 20 × 10⁻⁸ ग्राम/सेमी²/मिनट से नीचे जड़ वृद्धि रुक जाती है। रेडॉक्स विभव (Eh) भी संकेतक है।
  • महत्व: बीज अंकुरण, जड़ श्वसन, पोषक तत्वों का अवशोषण, नाइट्रीकरण, सूक्ष्मजीव क्रिया और रोग (जैसे जलभराव में जड़ गलन)।
  • प्रबंधन: जल निकास, जुताई, कार्बनिक पदार्थ, संघनन से बचाव और ऊँची क्यारी।

14. मृदा तापमान

  • स्रोत: सौर विकिरण (मुख्य), पृथ्वी की भीतरी ऊष्मा (नगण्य) और जैव-रासायनिक अपघटन से ऊष्मा।
  • ऊष्मा प्रवाह: मुख्यतः चालन से; मृदा की ऊष्मीय चालकता, विशिष्ट ऊष्मा (जल की लगभग 1 कैलोरी/ग्राम/°C बनाम खनिजों की लगभग 0.2) पर निर्भर। इसलिए गीली मृदा देर से गर्म और देर से ठंडी होती है।
  • प्रभावित करने वाले कारक: मृदा का रंग, ढलान और दिशा, वनस्पति आवरण, नमी, बनावट, कार्बनिक पदार्थ और मल्च।
  • दैनिक परिवर्तन: सतह पर अधिकतम तापमान दोपहर बाद (लगभग 2–3 बजे); गहराई के साथ परिवर्तन घटता है और अधिकतम में देरी होती है।
  • पौध वृद्धि पर प्रभाव: बीज अंकुरण, जड़ वृद्धि, पोषक तत्वों का अवशोषण, सूक्ष्मजीव क्रिया (इष्टतम लगभग 25–35 °C) और नाइट्रीकरण।
  • नियंत्रण: मल्चिंग, सिंचाई, छाया, जुताई और पाले से बचाव।

15. मृदा अभिक्रिया (pH), अम्लीयता, क्षारीयता और बफर क्षमता

pH = −log₁₀ [H⁺] | पैमाना 0–14 | 7 = उदासीन; 7 से कम = अम्लीय; 7 से अधिक = क्षारीय
pH सीमावर्ग
4.5 से कम / 4.5–5.0 / 5.1–5.5अत्यधिक अम्लीय / बहुत प्रबल अम्लीय / प्रबल अम्लीय
5.6–6.0 / 6.1–6.5मध्यम अम्लीय / हल्की अम्लीय
6.6–7.3उदासीन
7.4–7.8 / 7.9–8.4हल्की क्षारीय / मध्यम क्षारीय
8.5–9.0 / > 9.0प्रबल क्षारीय / अत्यंत प्रबल क्षारीय

अम्लीयता के प्रकार

  • सक्रिय अम्लीयता: मृदा विलयन में H⁺।
  • विनिमेय अम्लीयता: कोलॉइड की सतह पर अधिशोषित H⁺ और Al³⁺।
  • अवशिष्ट (Residual) अम्लीयता: कार्बनिक पदार्थ व Fe-Al हाइड्रॉक्साइड से बंधी।
  • कुल अम्लीयता = सक्रिय + विनिमेय + अवशिष्ट।

क्षारीयता: Na₂CO₃, NaHCO₃ व CaCO₃ की उपस्थिति या Na⁺ की अधिकता (ESP > 15 पर सोडिक मृदा) के कारण। विस्तृत सुधार SSAC-221 में पढ़ाया जाता है।

बफर क्षमता: pH में परिवर्तन के विरोध की क्षमता। यह मृदा कोलॉइड (चिकनी मिट्टी व ह्यूमस), कार्बोनेट और कमजोर अम्ल-क्षार लवणों के कारण होती है। चिकनी और कार्बनिक पदार्थ वाली मृदा में बफर क्षमता अधिक होती है, इसलिए उनमें pH बदलने के लिए चूना या सल्फर अधिक चाहिए।

16. pH का पोषक तत्वों की उपलब्धता पर प्रभाव

तत्वpH के साथ उपलब्धता
N, SpH 6–8 में अधिकतम; अम्लीय में नाइट्रीकरण कम
PpH 6–7 में अधिकतम; अम्लीय में Fe-Al से और क्षारीय में Ca से स्थिरीकृत
K, Ca, Mgअम्लीय में कम (निक्षालन); उदासीन-क्षारीय में अधिक
Fe, Mn, Zn, Cuअम्लीय में अधिक (अधिक अम्लीय में Mn विषाक्तता); pH बढ़ने पर घटती है
Bक्षारीय में घटती है
MopH बढ़ने पर बढ़ती है (अन्य सूक्ष्म तत्वों के विपरीत)

अधिकांश फसलों के लिए आदर्श pH लगभग 6.0–7.0 है, जहाँ सूक्ष्मजीव (विशेषकर जीवाणु) अधिक सक्रिय होते हैं।

17. मृदा कोलॉइड (Soil Colloids)

कोलॉइड वे अत्यंत सूक्ष्म कण हैं (व्यास लगभग 0.001–0.002 मिमी या कम), जिनका सतही क्षेत्रफल अधिक होता है और जिन पर विद्युत आवेश होता है। ये मृदा की रासायनिक सक्रियता का केंद्र हैं।

प्रकारउदाहरण
अकार्बनिकसिलिकेट मृत्तिका (काओलिनाइट, मॉन्टमोरिलोनाइट, इलाइट, वर्मीक्यूलाइट, क्लोराइट), Fe व Al के हाइड्रस ऑक्साइड, एलोफेन
कार्बनिकह्यूमस (उच्च CEC व सतही क्षेत्रफल)

महत्व

पोषक तत्वों का अधिशोषण और धारण, CEC, बफर क्षमता, जल धारण, संरचना निर्माण, मृदा की सुघट्यता और फूलना-सिकुड़ना।

18. परतदार सिलिकेट (1:1, 2:1, 2:1:1): संरचना और गुण; आवेश के स्रोत

सिलिकेट मृत्तिका में दो प्रकार की चादरें होती हैं: चतुष्फलकीय (Tetrahedral; Si–O) और अष्टफलकीय (Octahedral; Al/Mg–O, OH)।

प्रकारसंरचनाउदाहरण व गुण
1:1एक चतुष्फलकीय + एक अष्टफलकीय चादर; परत अंतराल लगभग 7.2 Åकाओलिनाइट; विस्तार रहित, कम CEC (3–15 cmol(p⁺)/kg), कम फूलना; आवेश मुख्यतः pH-निर्भर
2:1 प्रसारशील (Expanding)दो चतुष्फलकीय + एक अष्टफलकीयस्मेक्टाइट/मॉन्टमोरिलोनाइट: अधिक फूलना-सिकुड़ना (वर्टिसोल), CEC 80–120; वर्मीक्यूलाइट: CEC 100–150
2:1 अप्रसारशीलपरतों के बीच K⁺ बंधा हुआ; लगभग 10 Åइलाइट (जलयोजित अभ्रक): CEC 10–40; पोटैशियम का स्रोत
2:1:12:1 परत + अंतराल में Mg/Al हाइड्रॉक्साइड चादर; लगभग 14 Åक्लोराइट: विस्तार रहित, मध्यम CEC

आवेश के स्रोत

  • स्थायी आवेश: समरूप प्रतिस्थापन (Isomorphous substitution), जैसे चतुष्फलकीय में Si⁴⁺ की जगह Al³⁺ या अष्टफलकीय में Al³⁺ की जगह Mg²⁺। pH से स्वतंत्र; 2:1 मृत्तिकाओं में प्रमुख।
  • pH-निर्भर (परिवर्तनीय) आवेश: टूटे किनारों, OH समूहों (काओलिनाइट, ऑक्साइड) और कार्बनिक पदार्थ के कार्बोक्सिल व फिनॉलिक समूहों से; pH बढ़ने पर ऋणात्मक आवेश बढ़ता है।

19. आयन विनिमय, CEC और भू-क्षारक संतृप्ति

धनायन विनिमय: कोलॉइड की सतह पर अधिशोषित धनायनों का मृदा विलयन के धनायनों से उत्क्रमणीय, तुल्यांकी विनिमय (जल्दी होने वाली क्रिया)।

धनायन विनिमय क्षमता (CEC): मृदा के प्रति इकाई भार पर विनिमेय धनायनों की कुल मात्रा; इकाई cmol(p⁺)/kg (पूर्व में meq/100 ग्राम)।
क्षारक संतृप्ति (%) = (विनिमेय Ca + Mg + K + Na / CEC) × 100
  • CEC को प्रभावित करने वाले कारक: मृत्तिका की मात्रा और प्रकार, कार्बनिक पदार्थ, मृदा pH (pH-निर्भर आवेश), बनावट।
  • धनायनों की अधिशोषण शक्ति (लायोट्रॉपिक श्रेणी): Al³⁺ > H⁺ > Ca²⁺ > Mg²⁺ > K⁺ = NH₄⁺ > Na⁺।
  • अनायन विनिमय (AEC): Cl⁻, NO₃⁻, SO₄²⁻ और H₂PO₄⁻ का अधिशोषण; ऑक्साइड, काओलिनाइट और अम्लीय मृदा में अधिक। NO₃⁻ कमजोर रूप से (निक्षालित हो सकता है), फॉस्फेट कसकर (स्थिरीकरण) रोका जाता है।
  • महत्व: पोषक तत्वों का संचय व निक्षालन से बचाव, pH की स्थिरता (बफरिंग), संरचना व उर्वरता।
कोलॉइडलगभग CEC (cmol(p⁺)/kg)
काओलिनाइट3–15
इलाइट व क्लोराइट10–40
मॉन्टमोरिलोनाइट80–120
वर्मीक्यूलाइट100–150
ह्यूमस200–400

20. प्रैक्टिकल में क्या सीखेंगे

  • खेत में मृदा परिच्छेदिका का अध्ययन: गड्ढा (लगभग 1 × 1 × 1.5 मी), संस्तरों की मोटाई, रंग (मन्सेल), बनावट, संरचना, जड़ें और सीमा।
  • मृदा नमूना: औज़ार (ऑगर, खुरपी, मृदा ट्यूब, कोर सैम्पलर); एक समान खेत में 10–15 स्थानों से V-आकार का कटाव बनाकर (प्रायः 0–15 सेमी गहराई) नमूना लेना; मिलाकर चतुर्थांश (Quartering) विधि से लगभग 500 ग्राम; छाया में सुखाना, 2 मिमी की छलनी से छानना; लेबल लगाकर कपड़े की थैली में भंडारण। सूक्ष्म तत्वों के लिए धातु के औजार से बचें।
  • चट्टानें और खनिज पहचानना।
  • घनत्व: कोर सैम्पलर विधि (अविक्षुब्ध मृदा) और RD बोतल विधि (विक्षुब्ध मृदा; कण घनत्व), और सरंध्रता की गणना।
  • एटरबर्ग सीमाएँ (निम्न व उच्च सुघट्य सीमा); क्षेत्र क्षमता, स्थायी म्लानि बिंदु और WHC का निर्धारण।
  • बनावट: स्पर्श (Feel) विधि और बाउयूकस हाइड्रोमीटर विधि।
  • pH और EC: सामान्यतः मृदा : जल (1 : 2.5 pH के लिए; 1 : 2 EC के लिए) का निलंबन, pH मीटर व चालकता मापी से।
  • CEC का निर्धारण: सोडियम एसीटेट (1N, pH 8.2) से संतृप्ति, अल्कोहल से धुलाई और अमोनियम एसीटेट से Na निष्कर्षण, फ्लेम फोटोमीटर से मापन।
  • मृदा रंग मन्सेल चार्ट से।
उपयोगी सूत्र:
नमी % (शुष्क भार आधार) = (गीला भार − सूखा भार) / सूखा भार × 100 (ओवन 105 °C, 24 घंटे)
आयतन नमी (θv) = भारात्मक नमी (θw) × Db
Db = सूखी मृदा का भार / कोर का आयतन
Dp = (W₂ − W₁) / [(W₄ − W₁) − (W₃ − W₂)] × जल का घनत्व
(W₁ = खाली बोतल, W₂ = बोतल + सूखी मृदा, W₃ = बोतल + मृदा + जल, W₄ = बोतल + जल)
सरंध्रता % = (1 − Db/Dp) × 100
उपलब्ध जल = FC − PWP
क्षारक संतृप्ति % = विनिमेय क्षारक / CEC × 100

स्पर्श विधि (Feel method): रेत किरकिरी, गाद चिकनी-आटे जैसी, चिकनी मिट्टी चिपचिपी और लंबी रिबन (पट्टी) बनाने वाली होती है।

21. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)

  • डोकुचैव: मृदा विज्ञान के जनक; जेनी का समीकरण S = f(Cl, O, R, P, T)।
  • आदर्श मृदा: खनिज 45%, कार्बनिक पदार्थ 5%, जल 25%, वायु 25%।
  • क्वार्ट्ज सर्वाधिक अपक्षय-प्रतिरोधी; जल-अपघटन सबसे महत्वपूर्ण रासायनिक अपक्षय।
  • कण आकार (अंतर्राष्ट्रीय): रेत 2–0.02 मिमी, गाद 0.02–0.002 मिमी, चिकनी मिट्टी < 0.002 मिमी।
  • कण घनत्व औसत 2.65 g/cm³; सरंध्रता = (1 − Db/Dp) × 100।
  • FC ≈ −1/3 बार (pF 2.5); PWP = −15 बार (pF 4.2)।
  • सर्वाधिक क्षेत्र: जलोढ़ मृदा; कपास के लिए काली मृदा (वर्टिसोल); पश्चिमी राजस्थान: मरुस्थलीय मृदा।
  • CEC क्रम: ह्यूमस > वर्मीक्यूलाइट > मॉन्टमोरिलोनाइट > इलाइट > काओलिनाइट।
  • pH 6–7 पर अधिकांश पोषक तत्व सर्वाधिक उपलब्ध।

22. महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)

Q1. मृदा विज्ञान का जनक किसे माना जाता है? (अ) जेनी (ब) डोकुचैव (स) जैक्सन (द) ब्रैडी। उत्तर: ब

Q2. मृदा निर्माण का निष्क्रिय कारक है: (अ) जलवायु (ब) जीव (स) मूल पदार्थ (द) वर्षा। उत्तर: स

Q3. रेत के कण का व्यास (अंतर्राष्ट्रीय पद्धति) है: (अ) > 2 मिमी (ब) 2–0.02 मिमी (स) 0.02–0.002 मिमी (द) < 0.002 मिमी। उत्तर: ब

Q4. क्षेत्र क्षमता पर जल तनाव होता है: (अ) −1/3 बार (ब) −15 बार (स) −31 बार (द) 0 बार। उत्तर: अ

Q5. उच्च CEC वाला मृत्तिका खनिज है: (अ) काओलिनाइट (ब) मॉन्टमोरिलोनाइट (स) इलाइट (द) क्लोराइट। उत्तर: ब

Q6. काली कपास मृदा किस ऑर्डर में आती है? (अ) एल्फिसोल (ब) वर्टिसोल (स) एरिडिसोल (द) ऑक्सिसोल। उत्तर: ब

Q7. 1:1 मृत्तिका खनिज का उदाहरण है: (अ) मॉन्टमोरिलोनाइट (ब) काओलिनाइट (स) इलाइट (द) क्लोराइट। उत्तर: ब

Q8. मृदा के रंग को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त चार्ट है: (अ) मन्सेल (ब) बाउयूकस (स) एटरबर्ग (द) जेनी। उत्तर: अ

23. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: SSAC-111 के कितने क्रेडिट और लेक्चर हैं?
उत्तर: 3 क्रेडिट (2+1); थ्योरी के 32 और प्रैक्टिकल के 16 लेक्चर।

प्रश्न: बनावट और संरचना में क्या अंतर है?
उत्तर: बनावट रेत-गाद-चिकनी मिट्टी के अनुपात से तय होती है, जबकि संरचना कणों के समूह बनाकर जुड़ने से बनती है; संरचना को सुधारा जा सकता है, बनावट को नहीं।

प्रश्न: रेतीली मृदा में अधिक बार सिंचाई क्यों करनी पड़ती है?
उत्तर: इसमें बड़े रंध्र अधिक और सूक्ष्म रंध्र कम होते हैं, इसलिए जल धारण क्षमता कम होती है और पानी जल्दी निकल जाता है।

प्रश्न: CEC अधिक होना क्यों अच्छा है?
उत्तर: अधिक CEC वाली मृदा पोषक धनायनों को अधिक रोकती है, निक्षालन कम होता है और बफर क्षमता भी अधिक होती है।

प्रश्न: मृदा pH कृषि में क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: pH पोषक तत्वों की उपलब्धता, सूक्ष्मजीव क्रिया और विषाक्त तत्वों (Al, Mn) की घुलनशीलता को नियंत्रित करता है।

प्रश्न: मृदा नमूना कैसे लेना चाहिए?
उत्तर: खेत के एकसमान हिस्से से 10–15 स्थानों से, V आकार के कटाव से समान गहराई पर लेकर मिलाएँ और चतुर्थांश विधि से लगभग 500 ग्राम का प्रतिनिधि नमूना बनाएँ।

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संदर्भ पुस्तकें (Reference Books)

एन.सी. ब्रैडी व आर.आर. वेइल, The Nature and Properties of Soils; टी.डी. विश्वास व एस.के. मुखर्जी, Textbook of Soil Science, टाटा मैकग्रा-हिल; आर.के. मेहरा, Textbook of Soil Science, ICAR, नई दिल्ली; डी.के. दास, Introductory Soil Science, कल्याणी; ISSS (2009), Fundamentals of Soil Science, मृदा विज्ञान संभाग, IARI, नई दिल्ली; बाउल, होल, मैकक्रैकन व साउथर्ड, Soil Genesis and Classification; बेवर, गार्डनर व गार्डनर, Soil Physics; जे. सहगल, Pedology: Concepts and Applications, कल्याणी; एम.एल. जैक्सन, Soil Chemical Analysis; पाइपर, Soil and Plant Analysis।

नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। आँकड़े (जैसे CEC, क्षेत्रफल प्रतिशत) सन्निकट हैं और स्रोत के अनुसार थोड़े बदल सकते हैं। पाठ्यक्रम का स्रोत: Swami Keshwanand Rajasthan Agricultural University, Bikaner की Vth Deans' Committee Report।

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