पादप प्रजनन के मूल सिद्धांत (Fundamentals of Plant Breeding, GPB-211) B.Sc. (Hons.) Agriculture के तीसरे सेमेस्टर का 3 क्रेडिट (2+1) का कोर्स है। नई उन्नत किस्में कैसे बनती हैं, संकर बीज कैसे तैयार होते हैं और किस्मों का पंजीकरण व किसानों के अधिकार कैसे सुरक्षित रहते हैं, यह सब इसी विषय में पढ़ाया जाता है। सिलेबस में 32 थ्योरी और 16 प्रैक्टिकल लेक्चर हैं। इस लेख में सभी टॉपिक लेक्चर के क्रम में तालिकाओं, सूत्रों, MCQ और FAQ के साथ समझाए गए हैं।
1. पादप प्रजनन: संकल्पना, प्रकृति, उद्देश्य और भूमिका
पादप प्रजनन में कला (उत्तम पौधे की पहचान) और विज्ञान (आनुवंशिकी, कोशिका विज्ञान, सांख्यिकी, रोग व कीट विज्ञान) दोनों का मेल है। यह जीव विज्ञान की एक अनुप्रयुक्त शाखा है।
मुख्य उद्देश्य
- उच्च उपज: अधिक उत्पादन देने वाली किस्में (HYV) और संकर।
- गुणवत्ता में सुधार: प्रोटीन, तेल, पाक/पिसाई गुण, भंडारण क्षमता (जैसे गुणवत्ता प्रोटीन मक्का, कम यूरुसिक अम्ल वाली सरसों)।
- प्रतिरोधकता: रोग, कीट और निमेटोड के प्रति।
- प्रतिकूल पर्यावरण सहनशीलता: सूखा, लवणता, पाला, ऊष्मा, जलमग्नता।
- शीघ्र पकना और विस्तृत अनुकूलन: बहुफसली प्रणाली के अनुकूल कम अवधि की किस्में; प्रकाशकाल-असंवेदी किस्में।
- अन्य: बौनापन (गिरने से रोकथाम), यंत्रीकृत कटाई के अनुकूल पौधे, हानिकारक पदार्थों (जैसे ODAP, ग्लूकोसिनोलेट) की कमी।
भूमिका: खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, कृषि आय में वृद्धि, रासायनिक आदानों पर निर्भरता में कमी और टिकाऊ खेती।
2. पादप प्रजनन का ऐतिहासिक विकास
| काल / वैज्ञानिक | योगदान |
|---|---|
| लगभग 10,000 वर्ष पूर्व | फसलों का पालतूकरण; किसानों द्वारा अच्छे बीज का चयन |
| कैमरेरियस (1694) | पौधों में लिंग की खोज |
| कोएलरेटर (1760 के दशक) | पहले नियंत्रित संकर तैयार किए |
| विल्मोरिन (1856) | संतति परीक्षण (Progeny test) का सिद्धांत |
| मेंडल (1865; पुनः खोज 1900) | आनुवंशिकता के नियम |
| जोहान्सन (1903) | शुद्ध वंशक्रम (Pure line) सिद्धांत |
| शल (1908-09) | अंतःप्रजात वंशक्रम और संकर मक्का; हेटेरोसिस शब्द (1914) |
| जोन्स (1918) | द्वि-संकर (Double cross) की विधि |
| नॉर्मन बोरलॉग (1960 का दशक) | बौनी गेहूँ किस्में; हरित क्रांति; 1970 का नोबेल शांति पुरस्कार |
भारत में: पूसा (बिहार) में इंपीरियल कृषि अनुसंधान संस्थान (1905), ICAR (1929), NBPGR (1976), तथा अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजनाएँ (AICRP)।
3. प्रमुख उपलब्धियाँ और भविष्य की संभावनाएँ
- हरित क्रांति: 1960 के दशक में बौनी, उर्वरक-प्रतिक्रियाशील गेहूँ (सोनालिका, कल्याण सोना) और धान (IR-8, जया)।
- संकर किस्में: संकर मक्का (1961), संकर ज्वार CSH-1 (1964), संकर बाजरा HB-1 (1965), संकर कपास (1970 का दशक, विश्व में पहली व्यावसायिक कपास संकर किस्म), संकर धान (1994)।
- जैव प्रबलीकरण: गुणवत्ता प्रोटीन मक्का (QPM), आयरन-जिंक युक्त बाजरा व गेहूँ की किस्में।
- द्वि-शून्य सरसों (कम यूरुसिक अम्ल व ग्लूकोसिनोलेट) और Bt कपास (2002)।
- भविष्य: जीनोम संपादन (CRISPR), जीनोमिक चयन, तीव्र पीढ़ी उन्नति (Speed breeding), जलवायु-सहनशील व पोषण-समृद्ध किस्में।
4. पादप प्रजनन के संदर्भ में आनुवंशिकी
प्रजनन का आधार आनुवंशिक विविधता है। फीनोटाइप (P) = जीनोटाइप (G) + पर्यावरण (E) + जीनोटाइप × पर्यावरण अंतःक्रिया (GE)। केवल वंशागत (आनुवंशिक) भिन्नता पर चयन प्रभावी होता है। गुणात्मक लक्षण (रोग प्रतिरोध, बौनापन) कम जीनों से और मात्रात्मक लक्षण (उपज) अनेक जीनों से नियंत्रित होते हैं।
5. जनन की विधियाँ, परागण और असंगजनन (Apomixis)
| वर्ग | स्वपरागण (Self-pollinated) | परपरागण (Cross-pollinated) |
|---|---|---|
| परपरागण दर | सामान्यतः 4% से कम | सामान्यतः 5% से अधिक (अधिकतर 95% तक) |
| उदाहरण | गेहूँ, धान, जौ, चना, मटर, मूँगफली, सोयाबीन, टमाटर, मूँग | मक्का, बाजरा, सूरजमुखी, चुकंदर, राई, रिजका, कद्दूवर्गीय फसलें, नारियल |
| अधिकांश स्वपरागित फिर भी कुछ पर-परागण | कपास, अरहर, ज्वार, कुसुम, सरसों: "अक्सर पर-परागित" (Often cross-pollinated) | |
| पौधे की आनुवंशिक स्थिति | समयुग्मजी (Homozygous) | विषमयुग्मजी (Heterozygous) |
| अंतःप्रजनन का प्रभाव | कोई हानि नहीं | अंतःप्रजनन अवसाद |
- स्वपरागण को बढ़ावा देने वाली स्थितियाँ: उभयलिंगी फूल, क्लीस्टोगैमी (बंद फूल), समकालिकता, परागकोष का वर्तिकाग्र के पास होना।
- परपरागण को बढ़ावा देने वाली स्थितियाँ: एकलिंगता (मक्का में एकलिंगाश्रयी; पपीते में द्विलिंगाश्रयी), डाइकोगैमी (पुंपूर्वता या स्त्रीपूर्वता; बाजरा स्त्रीपूर्वी), हर्कोगैमी, विषमवर्तिकत्व (Heterostyly), स्वअसंगतता, नर बंध्यता।
- वानस्पतिक (अलैंगिक) जनन: गन्ना, आलू, केला, शकरकंद, आम (कलम, कंद, राइजोम से)।
असंगजनन (Apomixis)
बिना निषेचन के बीज बनना। प्रकार: आवर्ती (द्विगुणित बीजाणुता व अपबीजाणुता), अनावर्ती, आकस्मिक भ्रूणता (Adventive embryony; नींबू वर्गीय फल, आम) और कायिक असंगजनन (बल्बिल; Agave)। महत्व: संकर ओज को स्थायी रखना संभव, परंतु इसे प्रजनन में उपयोग करना कठिन है।
6. स्वअसंगतता (Self-incompatibility)
उर्वर पराग और अंडाशय होते हुए भी, एक ही पौधे के पराग से निषेचन का न हो पाना। यह S-जीन द्वारा नियंत्रित होती है।
| प्रकार | विशेषता / उदाहरण |
|---|---|
| विषमरूपी (Heteromorphic) | पुष्पों के आकार भिन्न (Pin व Thrum); प्रिमुला |
| समरूपी – युग्मकोद्भिदीय (Gametophytic) | पराग का स्वयं का जीनोटाइप निर्णायक; प्रायः एक S स्थान; आलू, तंबाकू, राई |
| समरूपी – बीजाणूद्भिदीय (Sporophytic) | पराग प्रदान करने वाले पौधे का जीनोटाइप निर्णायक; अवरोध वर्तिकाग्र पर; ब्रैसिका (गोभी, मूली), सूरजमुखी |
उपयोग: संकर बीज उत्पादन में हस्त-विपुंसन से बचाव (जैसे ब्रैसिका की सब्जियों में); कली अवस्था में परागण करके SI वंशक्रम बनाए रखे जाते हैं।
7. नर बंध्यता (Male Sterility) और आनुवंशिक परिणाम
| प्रकार | नियंत्रण व उपयोग |
|---|---|
| आनुवंशिक नर बंध्यता (GMS) | केन्द्रकीय अप्रभावी जीन (ms ms); अरहर व कपास में उपयोग; रख-रखाव कठिन (50% बंध्य पौधे) |
| कोशिकाद्रव्यी नर बंध्यता (CMS) | कोशिकाद्रव्य (माइटोकॉन्ड्रिया) द्वारा नियंत्रित; मक्का में T-कोशिकाद्रव्य (Southern corn leaf blight के प्रति संवेदी, 1970 में महामारी) |
| कोशिकाद्रव्यी-आनुवंशिक (CGMS), तीन वंशक्रम पद्धति | A (नर बंध्य), B (रख-रखाव वंशक्रम), R (पुनर्स्थापक वंशक्रम, Rf जीन); बाजरा (A₁ पद्धति), ज्वार, सूरजमुखी, धान (WA कोशिकाद्रव्य) |
| पर्यावरण-संवेदी (TGMS/PGMS) | तापमान/प्रकाशकाल से प्रभावित; धान में द्वि-वंशक्रम (Two-line) संकर |
| रासायनिक संकरण कारक (CHA) | गैमेटोसाइड्स (जैसे GA, मैलिक हाइड्राज़ाइड, इथ्रेल) से कृत्रिम नर बंध्यता |
सूत्र (CGMS में): A × B → A (बंध्य बीज), A × R → F₁ संकर (उर्वर)।
8. पालतूकरण, अनुकूलन, पादप परिचय और उत्पत्ति केंद्र
- पालतूकरण (Domestication): जंगली प्रजातियों को मनुष्य द्वारा खेती हेतु अनुकूलित करना।
- अनुकूलन (Acclimatization): किसी किस्म का नए वातावरण में धीरे-धीरे अभ्यस्त होना।
- पादप परिचय (Introduction): किसी किस्म या प्रजाति को नए क्षेत्र में ले जाना। प्राथमिक परिचय: किस्म सीधे उपयोगी (जैसे गेहूँ की सोनोरा 64 व लर्मा रोजो, धान की IR-8 व ताइचुंग नेटिव-1)। द्वितीयक परिचय: परिचित किस्म से चयन/संकरण करके नई किस्म (जैसे सोनोरा 64 से शरबती सोनोरा)।
- नोडल संस्था: NBPGR, नई दिल्ली (1976)।
उत्पत्ति / विविधता केंद्र (वाविलोव)
| केंद्र | प्रमुख फसलें (उदाहरण) |
|---|---|
| भारत-बर्मा (हिंदुस्तानी) केंद्र | धान, अरहर, मूँग, बैंगन, खीरा, आम, काली मिर्च, हल्दी |
| चीनी केंद्र | सोयाबीन, कंगनी (फॉक्सटेल मिलेट), सेब |
| मध्य एशियाई केंद्र | गेहूँ (सामान्य), मटर, मसूर, कपास |
| निकट पूर्वी/भूमध्यसागरीय | गेहूँ (Einkorn), जौ, मसूर, रिजका, गोभी |
| अबीसीनियाई (इथियोपियाई) | कॉफी, रागी, तिल, अरंडी, ज्वार की कुछ प्रजातियाँ |
| मध्य अमेरिकी (मैक्सिको) | मक्का, सेम, कपास (G. hirsutum), कद्दू |
| दक्षिण अमेरिकी | आलू, मूँगफली, कसावा |
9. आनुवंशिक विविधता के घटक, आनुवंशिकता और आनुवंशिक लाभ
फीनोटाइपिक प्रसरण (VP) = VG + VE (+ VGE)
VG = VA (योगात्मक) + VD (प्रभाविता) + VI (एपीस्टेटिक)
| माप | सूत्र / अर्थ |
|---|---|
| व्यापक अर्थ में आनुवंशिकता (h²b) | VG / VP × 100 |
| संकीर्ण अर्थ में आनुवंशिकता (h²n) | VA / VP × 100; चयन के लिए अधिक विश्वसनीय |
| वर्गीकरण | निम्न: <30%; मध्यम: 30–60%; उच्च: >60% |
| आनुवंशिक लाभ (GA) | GA = k × h² × σp (5% चयन तीव्रता पर k ≈ 2.06); GA % = (GA / माध्य) × 100 |
उच्च आनुवंशिकता के साथ उच्च आनुवंशिक लाभ होने पर योगात्मक जीन क्रिया मानी जाती है और चयन प्रभावी होता है।
10. स्वपरागित फसलों का आनुवंशिक आधार और शुद्ध वंशक्रम सिद्धांत
स्वपरागण से प्रत्येक पीढ़ी में विषमयुग्मजता आधी रह जाती है; n पीढ़ियों के बाद विषमयुग्मजता (½)ⁿ। अंततः पौधे समयुग्मजी बन जाते हैं।
शुद्ध वंशक्रम सिद्धांत (जोहान्सन, 1903): सेम (Phaseolus vulgaris) के बीज के भार पर प्रयोग। निष्कर्ष: (1) शुद्ध वंशक्रम एक समयुग्मजी स्वपरागित पौधे की संतति है; (2) शुद्ध वंशक्रमों के बीच चयन प्रभावी है; (3) शुद्ध वंशक्रम के भीतर चयन अप्रभावी है, क्योंकि भिन्नता केवल पर्यावरणीय है।
11. स्वपरागित फसलों में प्रजनन विधियाँ: समूह चयन और शुद्ध वंशक्रम चयन
| बिंदु | समूह चयन (Mass selection) | शुद्ध वंशक्रम चयन |
|---|---|---|
| विधि | अनेक अच्छे पौधों को फीनोटाइप के आधार पर चुनकर बीज मिलाना | एकल पौधे का चयन, उनकी संतति परीक्षण |
| संतति परीक्षण | नहीं | हाँ |
| उपयोग | स्थानीय किस्मों (Landraces) में सुधार | विषमजातीय स्थानीय किस्म से शुद्ध किस्म निकालना |
| समय | कम | लगभग 7–10 वर्ष |
| किस्म की एकरूपता | कम | अधिक |
12. संकरण की तकनीक (Hybridization)
- पैतृकों का चयन: उद्देश्य के अनुसार पूरक गुणों वाले जनक।
- विपुंसन (Emasculation): परागकोष के फटने से पहले मादा पैतृक के पुंकेसर निकालना। विधियाँ: हाथ से चिमटी द्वारा, गर्म जल (धान), सक्शन, अल्कोहल, नर बंध्यता और गैमेटोसाइड।
- थैलीबंदी (Bagging) व टैगिंग: अनचाहे पराग से बचाव; लेबल।
- परागण: नर पैतृक के पराग को वर्तिकाग्र पर लगाना।
- F₁ बीज की कटाई और अगली पीढ़ी का उगाना।
13. विच्छेदित (Segregating) समष्टि का प्रबंधन
| विधि | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| वंशावली विधि (Pedigree) | F₂ से एकल पौधों का चयन, पूरा अभिलेख; F₆–F₇ तक शुद्ध वंशक्रम। लाभ: प्रभावी चयन। हानि: अधिक श्रम, खर्च। |
| समूह विधि (Bulk) | F₂ से F₅/F₆ तक चयन के बिना एक साथ उगाना, प्राकृतिक चयन क्रिया करता है; फिर एकल पौधों का चयन। कम खर्च। निल्सन-एहले द्वारा सुझाई गई। |
| एकल बीज वंशागति (SSD) | प्रत्येक F₂ पौधे से एक बीज आगे बढ़ाना; ग्रीनहाउस में तेज पीढ़ी उन्नति; गोल्डन (1939) व ब्रिम (1966)। |
| प्रतिसंकरण (Backcross) विधि | अच्छी किस्म (आवर्ती पैतृक) में दाता पैतृक से एक सरल लक्षण (जैसे रोग प्रतिरोधकता) स्थानांतरित करना। |
BC₁ = 75%, BC₂ = 87.5%, BC₃ = 93.75%, BC₄ = 96.9%, BC₅ = 98.4%, BC₆ = 99.2%
14. बहुरेखीय (Multiline) अवधारणा
जेन्सन (1952) ने जई में तथा बोरलॉग ने गेहूँ में विकसित की। इसमें कृषि गुणों में समान, पर रोग प्रतिरोधी जीनों में भिन्न निकट-समजीनी रेखाओं का मिश्रण होता है। लाभ: रोगाणु की नस्लों का संचय धीमा, इसलिए प्रतिरोध दीर्घकालिक। उदाहरण: गेहूँ में कल्याण सोना पर आधारित बहुरेखीय किस्में (KSML 3, KSML 11)। सीमा: सभी रेखाएँ बनाने में अधिक समय और लागत।
15. समष्टि आनुवंशिकी और हार्डी-वाइनबर्ग नियम
जीन आवृत्ति: किसी एलील की समष्टि में अनुपात। जीनोटाइप आवृत्ति: विभिन्न जीनोटाइप का अनुपात।
हार्डी-वाइनबर्ग नियम (1908): बड़ी, यादृच्छिक संगम करने वाली समष्टि में, यदि उत्परिवर्तन, प्रवास, चयन और आनुवंशिक विचलन न हों तो जीन और जीनोटाइप आवृत्तियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी स्थिर रहती हैं। संतुलन एक पीढ़ी के यादृच्छिक संगम से ही स्थापित हो जाता है।
उदाहरण: यदि q = 0.2 तो p = 0.8; AA = 0.64, Aa = 0.32, aa = 0.04
जीन आवृत्ति बदलने वाले कारक: उत्परिवर्तन, प्रवास, चयन, आनुवंशिक विचलन (Genetic drift), अयादृच्छिक संगम।
16. परपरागित फसलों में आनुवंशिक आधार और प्रजनन विधियाँ
परपरागित फसलों की समष्टियाँ विषमयुग्मजी और विषमजातीय होती हैं और स्वपरागण पर अंतःप्रजनन अवसाद दिखाती हैं। इसलिए सुधार के लिए समष्टि सुधार, संकर किस्में और संश्लेषित/संकुल किस्में उपयोग होती हैं।
17. समष्टि सुधार और चयन के प्रकार
| विधि | विवरण |
|---|---|
| समूह चयन | फीनोटाइप आधारित; सरल; मक्का, बाजरा में पुरानी विधि |
| संतति चयन | अर्ध-सहोदर (Half-sib), पूर्ण-सहोदर (Full-sib), S₁/S₂ संतति पर आधारित चयन |
| पंक्ति-में-बाली (Ear-to-row) | हॉपकिन्स; मक्का में तेल/प्रोटीन पर दीर्घकालीन चयन |
| आवर्ती चयन (Recurrent selection) | सरल आवर्ती चयन, GCA हेतु, SCA हेतु तथा पारस्परिक आवर्ती चयन (कॉम्स्टॉक, रॉबिन्सन व हार्वे, 1949); बार-बार चयन व अंतः-संकरण से उपयोगी जीनों की आवृत्ति बढ़ाना |
18. हेटेरोसिस (संकर ओज) और अंतःप्रजनन अवसाद
हेटेरोसिस: F₁ संकर का एक या दोनों पैतृकों से अधिक ओज, उपज या अन्य गुण। शब्द: जी.एच. शल (1914)।
| प्रकार | सूत्र |
|---|---|
| माध्य जनक के ऊपर (Average/Relative heterosis) | (F₁ − MP) / MP × 100 |
| श्रेष्ठ जनक के ऊपर (Heterobeltiosis) | (F₁ − BP) / BP × 100 |
| मानक या आर्थिक हेटेरोसिस | (F₁ − मानक किस्म) / मानक किस्म × 100 |
सिद्धांत: प्रभाविता परिकल्पना (डेवनपोर्ट, ब्रूस, कीबल व पेलेव), अति-प्रभाविता परिकल्पना (शल व ईस्ट) और एपीस्टेसिस।
अंतःप्रजनन अवसाद (Inbreeding depression): परपरागित फसलों में स्वपरागण से ओज और उर्वरता का घटना। कारण: हानिकारक अप्रभावी जीनों का समयुग्मजी होना। मक्का में सर्वाधिक; स्वपरागित फसलों में नगण्य।
19. अंतःप्रजात वंशक्रम और संकर किस्मों का विकास
अंतःप्रजात वंशक्रम (Inbred line): 5–7 पीढ़ियों तक स्वपरागण और चयन से बनी समयुग्मजी रेखा। संकर बीज के लिए इनके संयोजन की क्षमता जाँची जाती है।
| संकर का प्रकार | संयोजन |
|---|---|
| एकल संकर (Single cross) | A × B |
| तीन-मार्गी संकर (Three-way) | (A × B) × C |
| द्वि-संकर (Double cross) | (A × B) × (C × D); जोन्स (1918) |
| टॉप क्रॉस | अंतःप्रजात वंशक्रम × खुले परागण वाली किस्म |
संयोजन क्षमता (स्प्रेग व टैटम, 1942): सामान्य संयोजन क्षमता (GCA: योगात्मक) और विशिष्ट संयोजन क्षमता (SCA: प्रभाविता/एपीस्टेसिस)।
द्वि-संकर के निष्पादन की भविष्यवाणी (Jenkins विधि B): (A×B)×(C×D) का अनुमान = चार अ-जनक एकल संकरों (A×C, A×D, B×C, B×D) का औसत।
20. संकुल (Composite) और संश्लेषित (Synthetic) किस्में
| बिंदु | संश्लेषित किस्म | संकुल किस्म |
|---|---|---|
| निर्माण | कुछ चुने हुए अंतःप्रजात वंशक्रमों/क्लोनों का संकरण (GCA परीक्षण के बाद) | अनेक विविध स्रोतों (किस्मों/वंशक्रमों) का मिश्रण, GCA परीक्षण आवश्यक नहीं |
| पुनर्निर्माण | जनक वंशक्रमों से पुनः बनाई जा सकती है | सामान्यतः नहीं |
| उपयोग | चारा घासें, मक्का, बाजरा, रिजका | मक्का, बाजरा |
| लाभ | किसान प्रत्येक वर्ष बीज नहीं खरीदता (2–3 वर्ष स्वयं का बीज); संकर की अपेक्षा सस्ता बीज | |
21. अलैंगिक रूप से प्रवर्धित फसलों में प्रजनन विधियाँ
गन्ना, आलू, केला, शकरकंद, आम, अंगूर, गुलाब आदि के क्लोन विषमयुग्मजी होते हैं और बीज से मातृक गुण नहीं रहते, इसलिए कलम, कंद आदि से प्रवर्धन करते हैं। इनमें विविधता का स्रोत स्वतः संकरण, कायिक उत्परिवर्तन (कली विचलन) और बहुगुणिता है।
22. क्लोनी चयन और संकरण
- क्लोनी चयन (Clonal selection): मिश्रित क्लोनों से सर्वश्रेष्ठ क्लोन की पहचान और प्रवर्धन। पुराने गन्ना-आलू-आम में प्रमुख विधि।
- संकरण व चयन: उत्तम जनकों का संकरण कर F₁ पौधों को उगाना और श्रेष्ठ विघटित पौधे का क्लोनन। उदाहरण: गन्ने की Co किस्में (गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर, 1912), आलू की कुफरी किस्में (केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला)।
- कायिक उत्परिवर्तन से बनी किस्में: नाशपाती, संतरे व सेब की कुछ किस्में।
23. दूरस्थ संकरण (Wide Hybridization) और पूर्व प्रजनन (Pre-breeding)
दूरस्थ संकरण: भिन्न प्रजातियों या वंशों के बीच संकरण। उद्देश्य: रोग-सहनशीलता, प्रतिकूल पर्यावरण सहनशीलता और नई फसलें बनाना।
| बाधा | उदाहरण व समाधान |
|---|---|
| निषेचन पूर्व | पराग अंकुरण या नलिका वृद्धि में रुकावट; समाधान: हार्मोन उपचार, पराग मिश्रण |
| निषेचन पश्चात | संकर भ्रूण मृत्यु, संकर बंध्यता; समाधान: भ्रूण बचाव (Embryo rescue), कोल्चिसिन से गुणसूत्र द्विगुणन, ऊतक संवर्धन |
उपलब्धियाँ: ट्रिटिकेल (गेहूँ × राई), Raphanobrassica, गेहूँ में Aegilops व राई से रतुआ प्रतिरोधी जीन का स्थानांतरण, गन्ने में Saccharum spontaneum का उपयोग, तंबाकू और कपास के अंतर-प्रजातीय संकर।
पूर्व प्रजनन (Pre-breeding): जंगली या अनुकूलित न होने वाले जर्मप्लाज्म से उपयोगी जीनों को प्रजनन-योग्य पदार्थ में स्थानांतरित करना, ताकि प्रजनक उनका सीधे उपयोग कर सकें।
24. पादप प्रजनन में बहुगुणिता (Polyploidy)
- स्वबहुगुणित: त्रिगुणित बीजरहित तरबूज, चुकंदर; चारा फसलों में चतुर्गुणित लाल क्लोवर।
- परबहुगुणित: ट्रिटिकेल, तंबाकू (N. tabacum), गेहूँ (AABBDD), Brassica juncea (AABB), B. napus (AACC), B. carinata (BBCC) (U का त्रिकोण, 1935)।
- प्रेरण: कोल्चिसिन से कृत्रिम बहुगुणन।
- एकगुणित और द्विगुणित एकगुणित (Doubled haploid): परागकोष संवर्धन से तेज समयुग्मजी वंशक्रम।
- लाभ: बड़े आकार (गिगास प्रभाव), बीजरहित फल, दूरस्थ संकर की बंध्यता में समाधान।
25. उत्परिवर्तन प्रजनन: विधियाँ और उपयोग
विकिरण (गामा किरण, X-किरण) या रसायनों (EMS) से उत्परिवर्तन प्रेरित कर उपयोगी उत्परिवर्ती चुने जाते हैं।
- विधि: बीज/पराग का उपचार, M₁ पीढ़ी में उपचार का प्रभाव, M₂ पीढ़ी में चयन और M₃-M₄ में स्थिरीकरण, फिर परीक्षण।
- उपयोग: बौनापन, शीघ्र परिपक्वता, रोग-सहनशीलता, गुणवत्ता में बदलाव। वानस्पतिक प्रवर्धित फसलों और स्वपरागित फसलों में अधिक उपयोगी।
- उदाहरण: शरबती सोनोरा (गेहूँ), जगन्नाथ (धान), मूँगफली की ट्रॉम्बे किस्में (TG 37A आदि)।
सीमाएँ: अधिकांश उत्परिवर्तन हानिकारक, विशाल समष्टि व कठोर जाँच आवश्यक।
26. जैविक तनाव प्रतिरोधी प्रजनन (Biotic Stress)
| प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| ऊर्ध्वाधर प्रतिरोध (Vertical) | नस्ल-विशिष्ट; एक या कुछ मुख्य जीन (ओलिगोजेनिक); फ्लोर का जीन-के-लिए-जीन सिद्धांत; उच्च प्रतिरोध, पर रोगाणु की नई नस्ल से टूट सकता है |
| क्षैतिज प्रतिरोध (Horizontal) | नस्ल-अविशिष्ट; अनेक जीन (पॉलीजेनिक); टिकाऊ पर आंशिक प्रतिरोध |
- कीट प्रतिरोध की क्रियाविधि (पेंटर): अप्रिय/अनाकर्षण (Antixenosis), प्रतिजीविता (Antibiosis) और सहनशीलता (Tolerance)।
- विधियाँ: परिचय, चयन, संकरण, प्रतिसंकरण, जीन पिरामिडिंग (कई प्रतिरोधी जीनों का एक किस्म में संयोजन), बहुरेखीय किस्में और ट्रांसजेनिक (जैसे Bt कपास)।
- उदाहरण: गेहूँ में रतुआ प्रतिरोध, धान में जीवाणु पर्ण झुलसा प्रतिरोध।
27. अजैविक तनाव सहनशील प्रजनन (Abiotic Stress)
| तनाव | प्रजनन रणनीति / उदाहरण |
|---|---|
| सूखा | पलायन (शीघ्र पकना), परिहार (गहरी जड़, मोमी पत्ते), सहनशीलता (परासरण समायोजन); बाजरा, मोठ |
| लवणता व क्षारीयता | गेहूँ की खारचिया 65; धान की CSR किस्में (CSSRI, करनाल) |
| जलमग्नता | धान की स्वर्णा-सब1 (Sub1 जीन) |
| गर्मी व पाला | ऊष्मा-सहनशील गेहूँ, चना/सरसों में पाला सहनशीलता |
| खनिज विषाक्तता व पोषक कमी | एल्यूमीनियम सहनशीलता, जिंक-दक्ष किस्में |
28. जैव प्रौद्योगिकी के उपकरण: DNA मार्कर
DNA मार्कर वे DNA अनुक्रम हैं जिनका उपयोग किसी जीन या लक्षण से जुड़ाव दर्शाने के लिए होता है। आदर्श मार्कर: बहुरूपी, सह-प्रभावी, वातावरण-स्वतंत्र, सस्ता और आसान।
| मार्कर | विशेषता |
|---|---|
| RFLP | प्रतिबंध एंजाइम से कटे खंडों की लंबाई में भिन्नता; सह-प्रभावी, पर श्रमसाध्य |
| RAPD | PCR आधारित, यादृच्छिक प्राइमर; प्रभावी मार्कर |
| AFLP | RFLP और PCR का संयोजन; अधिक बहुरूपता |
| SSR (माइक्रोसैटेलाइट) | सरल दोहराव; सह-प्रभावी, अत्यधिक बहुरूपी; प्रजनन में सर्वाधिक लोकप्रिय |
| SNP | एकल क्षार भिन्नता; बहुत अधिक संख्या; उच्च-थ्रूपुट जीनोटाइपिंग |
29. मार्कर सहायक चयन (Marker Assisted Selection, MAS)
किसी लक्षण के बजाय उससे जुड़े मार्कर के आधार पर चयन। लाभ: पौधे की छोटी अवस्था में चयन, पर्यावरण से मुक्त, तीव्र प्रजनन, जीन पिरामिडिंग आसान, QTL मानचित्रण में सहायक।
- मार्कर सहायक प्रतिसंकरण (MABC): बैकक्रॉस में मार्कर से दाता जीन और आवर्ती जनक जीनोम दोनों की जाँच।
- उदाहरण: इम्प्रूव्ड सांबा महसूरी (जीवाणु पर्ण झुलसा हेतु xa5, xa13, xa21 जीन), पूसा बासमती 1718 व 1728 (जीवाणु झुलसा प्रतिरोधी)।
30. सहभागी पादप प्रजनन (Participatory Plant Breeding)
इसमें किसान प्रजनक के साथ मिलकर लक्ष्य निर्धारण, जर्मप्लाज्म चयन, परीक्षण और किस्म के मूल्यांकन में भाग लेते हैं। लाभ: स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप किस्में, किसानों द्वारा तेज अपनाव, स्थानीय आनुवंशिक विविधता का संरक्षण। इसके रूप: सहभागी किस्म चयन (PVS) और किसान-सहभागी प्रजनन। संयुक्त रूप से ICAR, ICRISAT और कृषि विश्वविद्यालयों में चलाई जाती है।
31. किस्मों का विकास और अनुमोदन (Development & Release of Varieties)
- जर्मप्लाज्म संग्रह एवं मूल्यांकन।
- संकरण/चयन द्वारा पुनर्संयोजन और सुधार।
- उपज परीक्षण: प्रारंभिक परीक्षण → उन्नत परीक्षण → अखिल भारतीय समन्वित परीक्षण (AVT-I, AVT-II) बहु-स्थानों पर।
- अनुमोदन: राज्य किस्म विमोचन समिति (SVRC) अथवा केंद्रीय किस्म विमोचन समिति (CVRC) की संस्तुति से बीज अधिनियम, 1966 के अंतर्गत अधिसूचना।
- बीज गुणन: नाभिकीय (Nucleus) → प्रजनक (Breeder) → आधार (Foundation) → प्रमाणित (Certified) बीज।
32. बौद्धिक संपदा अधिकार, पेटेंट एवं पादप प्रजनक व कृषक अधिकार
| अवधारणा | मुख्य बिंदु |
|---|---|
| बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) | पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट, भौगोलिक संकेत (GI), औद्योगिक डिज़ाइन, पादप प्रजनक अधिकार; TRIPS (1995), UPOV, ITPGRFA जैसी अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ |
| भारत का कानून | पादप किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 (PPV&FR Act); प्राधिकरण: नई दिल्ली (2005 में गठित) |
| पंजीकरण योग्य किस्में | नई किस्म, विद्यमान (Extant) किस्म, कृषक किस्म |
| DUS कसौटी | विशिष्टता (Distinctness), एकरूपता (Uniformity), स्थिरता (Stability); नई किस्म हेतु नवीनता (Novelty) भी |
| प्रजनक के अधिकार | संरक्षित किस्म के उत्पादन, बिक्री, वितरण, आयात-निर्यात पर विशेष अधिकार |
| कृषक के अधिकार | संरक्षित किस्म का बीज भी बोने, बचाने, पुनः उपयोग, आदान-प्रदान और बिक्री का अधिकार (ब्रांडेड बीज बेचने को छोड़कर); किस्म पंजीकरण में मदद; जर्मप्लाज्म संरक्षण पर पुरस्कार; हानि की स्थिति में मुआवजा |
| शोधकर्ता के अधिकार | किसी संरक्षित किस्म का प्रयोग अनुसंधान में करने की स्वतंत्रता |
| लाभ-साझेदारी | राष्ट्रीय जीन कोष (National Gene Fund) |
सामान्यतः संरक्षण अवधि अधिकतर फसलों के लिए 15 वर्ष और वृक्षों व लताओं के लिए 18 वर्ष है।
33. प्रैक्टिकल में क्या सीखेंगे
- प्रजनक किट: चिमटी, कैंची, सुई, ब्रश, हैंड लेंस, पेपर बैग, टैग, लेबल, मार्कर, स्पिरिट आदि।
- विभिन्न फसलों के जर्मप्लाज्म का अध्ययन; स्वपरागित (गेहूँ, धान, चना) व परपरागित (मक्का, बाजरा) फसलों की पुष्प संरचना।
- विपुंसन और संकरण तकनीक, नर बंध्यता प्रणाली का अध्ययन, अंतःप्रजनन के परिणाम।
- विच्छेदित समष्टि का प्रबंधन; माध्य, परास, प्रसरण, मानक विचलन और आनुवंशिकता की गणना।
- RBD का विश्लेषण और आनुवंशिक प्रसरण घटक; प्राकृतिक परपरागण का मूल्यांकन; द्वि-संकर के निष्पादन की भविष्यवाणी।
माध्य = ΣX/n | प्रसरण = Σ(X − माध्य)² / (n − 1) | मानक विचलन = √प्रसरण
विचरण गुणांक (CV %) = (SD / माध्य) × 100
RBD में स्वतंत्रता कोटि: प्रतिकृति = r − 1, उपचार = t − 1, त्रुटि = (r − 1)(t − 1), कुल = rt − 1
परपरागण % = (परपरागित पौधे / कुल पौधे) × 100
34. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)
- शुद्ध वंशक्रम सिद्धांत: जोहान्सन (1903), सेम; संकर मक्का: शल; द्वि-संकर: जोन्स।
- हार्डी-वाइनबर्ग: p² + 2pq + q² = 1।
- CGMS में तीन वंशक्रम: A, B, R।
- प्रतिसंकरण: BC₆ पर लगभग 99.2% आवर्ती जनक जीनोम।
- वंशावली, समूह, SSD, प्रतिसंकरण: स्वपरागित फसलों की विघटित समष्टि की विधियाँ।
- ऊर्ध्वाधर प्रतिरोध: नस्ल-विशिष्ट; क्षैतिज: नस्ल-अविशिष्ट।
- PPV&FR Act, 2001; DUS परीक्षण; किसान को बीज बचाने व बेचने का अधिकार।
35. महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. शुद्ध वंशक्रम सिद्धांत किसने दिया? (अ) मेंडल (ब) जोहान्सन (स) शल (द) जोन्स। उत्तर: ब
Q2. द्वि-संकर (Double cross) का सुझाव किसने दिया? (अ) जोन्स (ब) ईस्ट (स) बोरलॉग (द) डार्विन। उत्तर: अ
Q3. स्वपरागित फसल है: (अ) मक्का (ब) बाजरा (स) गेहूँ (द) सूरजमुखी। उत्तर: स
Q4. A-B-R प्रणाली किससे संबंधित है? (अ) GMS (ब) CGMS (स) स्वअसंगतता (द) उत्परिवर्तन। उत्तर: ब
Q5. BC₃ पर आवर्ती जनक का जीनोम कितना होता है? (अ) 75% (ब) 87.5% (स) 93.75% (द) 98%। उत्तर: स
Q6. सूखे का "परिहार" (Avoidance) तंत्र है: (अ) शीघ्र पकना (ब) गहरी जड़ (स) परासरण समायोजन (द) लवणता। उत्तर: ब
Q7. ट्रिटिकेल किन फसलों का संकर है? (अ) गेहूँ × जौ (ब) गेहूँ × राई (स) धान × गेहूँ (द) जौ × राई। उत्तर: ब
Q8. भारत में PPV&FR Act कब पारित हुआ? (अ) 1966 (ब) 1986 (स) 2001 (द) 2005। उत्तर: स
36. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: GPB-211 के कितने क्रेडिट और लेक्चर हैं?
उत्तर: 3 क्रेडिट (2+1); थ्योरी के 32 और प्रैक्टिकल के 16 लेक्चर।
प्रश्न: किस्म और संकर में क्या अंतर है?
उत्तर: किस्म का बीज अगले वर्ष भी प्रयोग हो सकता है, जबकि संकर के F₂ बीज से ओज घट जाता है, इसलिए हर वर्ष नया बीज लेना पड़ता है।
प्रश्न: स्वपरागित फसलों में हेटेरोसिस का उपयोग क्यों कम है?
उत्तर: हाथ से विपुंसन महँगा है; इसलिए नर बंध्यता या गैमेटोसाइड की आवश्यकता पड़ती है।
प्रश्न: आनुवंशिकता और आनुवंशिक लाभ में अंतर क्या है?
उत्तर: आनुवंशिकता कुल भिन्नता में आनुवंशिक भिन्नता का अनुपात है, जबकि आनुवंशिक लाभ चयन से अगली पीढ़ी में माध्य में वास्तविक सुधार है।
प्रश्न: किसान संरक्षित किस्म का बीज बेच सकता है?
उत्तर: हाँ, पर ब्रांडेड नाम से नहीं; PPV&FR Act के अंतर्गत यह अधिकार है।
प्रश्न: MAS से क्या लाभ है?
उत्तर: लक्षण का चयन पौध अवस्था में ही मार्कर से हो जाता है, जिससे समय और लागत बचती है।
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संदर्भ पुस्तकें (Reference Books)
आर.डब्ल्यू. एलार्ड, Principles of Plant Breeding; जी.एस. चहल एवं एस.एस. घोषाल, Principles and Procedures of Plant Breeding; बी.डी. सिंह, Plant Breeding; फूंदन सिंह, Essentials of Plant Breeding; एच.के. जैन एवं एम.सी. खरकवाल, Plant Breeding: Mendelian to Molecular Approach; ए.के. शर्मा (सं.), Breeding Technology of Crop Plants, यश पब्लिशिंग हाउस, बीकानेर; एस.एस. शेखावत (सं.), Advances and Current Issues in Agriculture, Vol. III, शिक्षा प्रकाशन, जयपुर।
नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। पाठ्यक्रम का स्रोत: Swami Keshwanand Rajasthan Agricultural University, Bikaner की Vth Deans' Committee Report।
