आनुवंशिकी के मूल सिद्धांत (Fundamentals of Genetics, GPB-121) B.Sc. (Hons.) Agriculture के दूसरे सेमेस्टर का 3 क्रेडिट (2+1) का कोर्स है और पादप प्रजनन (Plant Breeding), बीज प्रौद्योगिकी व जैव प्रौद्योगिकी जैसे विषयों की नींव है। सिलेबस में 32 थ्योरी और 16 प्रैक्टिकल लेक्चर हैं। इस लेख में सभी टॉपिक लेक्चर के क्रम में तालिकाओं, सूत्रों, MCQ और FAQ के साथ आसान हिंदी में समझाए गए हैं।
1. मेंडल पूर्व और मेंडल पश्चात आनुवंशिकता की अवधारणाएँ
| वैज्ञानिक / सिद्धांत | मुख्य विचार |
|---|---|
| हिप्पोक्रेटीज़: पैंजेनेसिस | शरीर के सभी अंगों से कण बनकर जनन कोशिकाओं में जाते हैं |
| पूर्वरचना बनाम उत्तरजनन (Preformation vs Epigenesis) | पूर्वरचना: भ्रूण में पूरा सूक्ष्म जीव पहले से मौजूद। उत्तरजनन (वुल्फ): अंग क्रमशः बनते हैं। |
| लैमार्क | उपार्जित लक्षणों की वंशागति और अंगों के उपयोग-अनुपयोग का सिद्धांत |
| डार्विन | प्राकृतिक चयन; पैंजेनेसिस का परिवर्तित रूप (जेम्यूल्स) |
| वीज़मान | जनन द्रव्य सिद्धांत (Germplasm); चूहों की पूँछ काटने के प्रयोग से उपार्जित लक्षणों की वंशागति का खंडन |
| मेंडल (1865; पुनः खोज 1900) | डी व्रीज, कोरेन्स और शेरमाक ने 1900 में स्वतंत्र रूप से मेंडल के नियमों की पुनः खोज की |
| सटन व बोवेरी (1902-03) | गुणसूत्र सिद्धांत: जीन गुणसूत्रों पर स्थित हैं |
| जोहान्सन (1909) | "जीन", "जीनोटाइप" व "फीनोटाइप" शब्द |
| मॉर्गन (1910) | ड्रोसोफिला पर प्रयोग; सहलग्नता और लिंग सहलग्न वंशागति; 1933 का नोबेल |
2. मेंडल के आनुवंशिकता के नियम
मेंडल ने मटर (Pisum sativum) पर 7 वर्षों तक प्रयोग किए। मटर चुनने के कारण: स्व-परागित, जीवन चक्र छोटा, स्पष्ट विपरीत लक्षण, संकरण आसान और अधिक संतति। उन्होंने सात लक्षण चुने: बीज का आकार (गोल/झुर्रीदार), बीज का रंग (पीला/हरा), फूल का रंग, फली का आकार, फली का रंग, फूल की स्थिति (कक्षीय/शीर्षस्थ) और पौधे की ऊँचाई (लंबा/बौना)।
| नियम | कथन |
|---|---|
| प्रभाविता का नियम | विपरीत लक्षणों वाले शुद्ध पैतृकों के संकरण से F₁ में केवल प्रभावी लक्षण दिखता है |
| पृथक्करण का नियम (युग्मकों की शुद्धता) | युग्मक बनते समय एलील अलग-अलग हो जाते हैं; प्रत्येक युग्मक में केवल एक एलील |
| स्वतंत्र वितरण का नियम | दो या अधिक लक्षणों के जीन युग्मक बनते समय एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वितरित होते हैं (केवल असहलग्न जीनों पर लागू) |
| संकरण | F₂ फीनोटाइप अनुपात | F₂ जीनोटाइप अनुपात |
|---|---|---|
| एकल संकर (Monohybrid) | 3 : 1 | 1 : 2 : 1 |
| द्विसंकर (Dihybrid) | 9 : 3 : 3 : 1 | 1:2:1:2:4:2:1:2:1 (9 जीनोटाइप) |
| त्रिसंकर (Trihybrid) | 27 : 9 : 9 : 9 : 3 : 3 : 3 : 1 | 27 जीनोटाइप |
सूत्र (n जीन जोड़ी, पूर्ण प्रभाविता): F₁ में युग्मक प्रकार = 2ⁿ; F₂ में फीनोटाइप = 2ⁿ; F₂ में जीनोटाइप = 3ⁿ।
परीक्षण संकरण (Test cross): F₁ (या अज्ञात जीनोटाइप वाले प्रभावी पौधे) का समयुग्मजी अप्रभावी पैतृक से संकरण। एकल संकर में अनुपात 1:1, द्विसंकर में 1:1:1:1। प्रतिसंकरण (Back cross): F₁ का किसी भी पैतृक से संकरण।
3. कोशिका विभाजन: समसूत्री और अर्धसूत्री
कोशिका चक्र के चरण: G₁, S (DNA प्रतिकृति), G₂ और M (विभाजन)।
| बिंदु | समसूत्री विभाजन (Mitosis) | अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) |
|---|---|---|
| स्थान | कायिक कोशिकाएँ | जनन कोशिकाएँ (पौधों में परागकोष व बीजांड) |
| विभाजन | एक; दो संतति कोशिकाएँ | दो क्रमिक; चार संतति कोशिकाएँ |
| गुणसूत्र संख्या | समान (2n → 2n) | आधी (2n → n) |
| क्रॉसिंग ओवर | सामान्यतः नहीं | पैकीटीन अवस्था में |
| महत्व | वृद्धि, मरम्मत, गुणसूत्र संख्या स्थिर रखना | युग्मक निर्माण, जीन पुनर्संयोजन से विविधता |
- समसूत्री अवस्थाएँ: प्रोफेज, मेटाफेज, एनाफेज, टीलोफेज।
- अर्धसूत्री प्रोफेज I की उप-अवस्थाएँ: लेप्टोटीन, जाइगोटीन (सिनैप्सिस), पैकीटीन (क्रॉसिंग ओवर), डिप्लोटीन (काएज्मेटा), डायकाइनेसिस (टर्मिनलाइजेशन)।
4. प्रायिकता और काई-वर्ग परीक्षण
- योग नियम: परस्पर अपवर्जी घटनाओं में प्रायिकताएँ जोड़ी जाती हैं।
- गुणन नियम: स्वतंत्र घटनाओं के एक साथ घटित होने की प्रायिकता, उनकी प्रायिकताओं का गुणनफल।
- द्विपद प्रसार (a + b)ⁿ का उपयोग बड़ी संख्या में संभावनाओं के आकलन में।
काई-वर्ग (χ²) परीक्षण: प्रेक्षित और अपेक्षित संख्या में अंतर सार्थक है या संयोगवश, यह जाँचने की विधि।
उदाहरण: 200 पौधों में 160 लंबे और 40 बौने मिले। 3:1 अनुपात की अपेक्षा: 150 और 50। χ² = (160−150)²/150 + (40−50)²/50 = 0.667 + 2.0 = 2.67। df = 1 पर 5% स्तर का सारणी मान 3.84 है। गणना मान 3.84 से कम है, इसलिए प्रेक्षित अनुपात 3:1 के अनुरूप (उपयुक्त) माना जाएगा।
5. प्रभाविता संबंध और जीन अंतःक्रिया
| प्रकार | विवरण / उदाहरण |
|---|---|
| पूर्ण प्रभाविता | F₁ में प्रभावी जैसा लक्षण; 3:1 (मटर) |
| अपूर्ण प्रभाविता | F₁ मध्यवर्ती; F₂ में 1:2:1 (गुलबाँस/Mirabilis jalapa में लाल × सफेद = गुलाबी) |
| सह-प्रभाविता (Codominance) | दोनों एलील का प्रभाव प्रकट; ABO रक्त समूह का AB, रोन (Roan) पशु |
| अति-प्रभाविता (Overdominance) | विषमयुग्मजी, दोनों समयुग्मजियों से बेहतर; संकर ओज का एक सिद्धांत |
जीन अंतःक्रिया: जब दो भिन्न जीन युग्म एक ही लक्षण को प्रभावित करते हैं तो मेंडल का 9:3:3:1 अनुपात बदल जाता है, पर जीन का वितरण स्वतंत्र ही रहता है।
6. एपीस्टेसिस (Epistatic) जीन अंतःक्रियाएँ और उदाहरण
| अंतःक्रिया | F₂ अनुपात | उदाहरण |
|---|---|---|
| पूरक जीन (Complementary) | 9 : 7 | मीठी मटर (Sweet pea) के फूल का रंग |
| अनुपूरक जीन (Supplementary) | 9 : 3 : 4 | मक्का में एल्यूरोन का रंग |
| द्विगुणित (Duplicate) प्रभावी जीन | 15 : 1 | शेफर्ड्स पर्स (Capsella) की फली का आकार |
| पॉलीमेरिक/योगात्मक (Duplicate with cumulative effect) | 9 : 6 : 1 | कद्दू (Summer squash) के फल का आकार |
| आच्छादन (Masking / प्रभावी एपीस्टेसिस) | 12 : 3 : 1 | कद्दू व जई में रंग |
| निरोधी (Inhibitory) | 13 : 3 | मुर्गी (White Leghorn × White Wyandotte) के पंखों का रंग |
| अप्रभावी एपीस्टेसिस | 9 : 3 : 4 | चूहों में कोट का रंग |
याद रखने का सूत्र: अंतःक्रिया में कुल 16 संयोजन रहते हैं; केवल फीनोटाइप वर्ग मिल जाते हैं (जैसे 9:7 में 9+7 = 16)। एपीस्टेसिस का अर्थ है, एक जीन द्वारा दूसरे जीन (जो भिन्न स्थान पर है) की अभिव्यक्ति को ढकना; जबकि प्रभाविता में एक ही स्थान के एलील आते हैं।
7. बहुएलीलता, बहुप्रभाविता, छद्मएलीलता और रक्त समूह आनुवंशिकी
- बहुएलीलता (Multiple alleles): एक ही जीन स्थान पर दो से अधिक एलील। उदाहरण: ABO रक्त समूह (Iᴬ, Iᴮ, i), खरगोश में कोट रंग (C, cᶜʰ, cʰ, c), तंबाकू (Nicotiana) में स्वअसंगतता (S एलील)।
- बहुप्रभाविता (Pleiotropism): एक जीन का एक से अधिक लक्षणों पर प्रभाव। उदाहरण: मटर में फूल का रंग, बीज आवरण का रंग व पत्ती-कक्ष के धब्बे; मनुष्य में सिकल सेल एनीमिया।
- छद्मएलील (Pseudoalleles): पास-पास स्थित जीन जो एलील की तरह व्यवहार करते हैं, पर क्रॉसिंग ओवर द्वारा अलग किए जा सकते हैं (ड्रोसोफिला का Lozenge स्थान)।
| रक्त समूह | जीनोटाइप |
|---|---|
| A | IᴬIᴬ या Iᴬi |
| B | IᴮIᴮ या Iᴮi |
| AB | IᴬIᴮ (सह-प्रभाविता) |
| O | ii |
ABO रक्त समूह की खोज कार्ल लैंडस्टाइनर (1900-01) ने की। Rh कारक की खोज लैंडस्टाइनर और वीनर (1940) ने रीसस बंदर में की।
8. लिंग निर्धारण और लिंग संबंधी लक्षण
| प्रकार | विवरण / उदाहरण |
|---|---|
| XX-XY (Lygaeus प्रकार) | मादा समजननी (XX), नर विषमजननी (XY); मनुष्य, ड्रोसोफिला, अधिकांश स्तनधारी |
| XX-XO (Protenor प्रकार) | नर में केवल एक X; टिड्डा (ग्रासहॉपर) |
| ZW-ZZ (Abraxas प्रकार) | मादा विषमजननी (ZW); पक्षी, तितली, मॉथ |
| अगुणित-द्विगुणित | मधुमक्खी में निषेचित अंडे से मादा (रानी/श्रमिक, 2n) और अनिषेचित अंडे से नर (ड्रोन, n) |
| पर्यावरणीय | कुछ सरीसृपों में तापमान से, Bonellia में पर्यावरण से |
| जीन संतुलन सिद्धांत (ब्रिजेस) | ड्रोसोफिला में X:A अनुपात: 1.0 = मादा; 0.5 = नर; 0.5 से 1 के बीच = अंतर्लिंगी; >1 = अधिमादा; <0.5 = अधिनर |
मनुष्य में लिंग निर्धारण Y गुणसूत्र (SRY जीन) द्वारा होता है। पौधों में एकलिंगी (Dioecious) प्रजातियाँ: पपीता, खजूर, भांग, पालक, शतावरी।
लिंग सीमित, लिंग प्रभावित और लिंग सहलग्न लक्षण
| लक्षण | अर्थ व उदाहरण |
|---|---|
| लिंग सीमित (Sex-limited) | केवल एक लिंग में प्रकट; दूध उत्पादन, अंडे देना (मादा), दाढ़ी (नर)। जीन ऑटोसोम पर भी हो सकते हैं। |
| लिंग प्रभावित (Sex-influenced) | एक लिंग में प्रभावी, दूसरे में अप्रभावी; गंजापन (नर में प्रभावी), डोरसेट भेड़ में सींग |
| लिंग सहलग्न (Sex-linked) | लिंग गुणसूत्र पर स्थित जीन; X-सहलग्न: वर्णांधता, हीमोफिलिया, ड्रोसोफिला में सफेद आँख (मॉर्गन 1910)। Y-सहलग्न (होलैंड्रिक): कान में बाल (Hypertrichosis)। |
लिंग सहलग्न वंशागति में क्रिस-क्रॉस वंशागति होती है: पुत्र को X-सहलग्न लक्षण माँ से मिलता है। इन लक्षणों के प्रत्यागामी (Reciprocal) संकरण के परिणाम भिन्न होते हैं।
9. सहलग्नता (Linkage) और उसका आकलन
एक ही गुणसूत्र पर स्थित जीन का साथ-साथ वंशागत होना सहलग्नता कहलाता है। बेटसन और पनेट (1906) ने मीठी मटर में संयोजन (Coupling) और प्रतिकर्षण (Repulsion) की खोज की; मॉर्गन ने ड्रोसोफिला में इसकी व्याख्या की।
- पूर्ण सहलग्नता: कोई पुनर्संयोजन नहीं (नर ड्रोसोफिला, मादा रेशम कीट)। अपूर्ण सहलग्नता: कुछ पुनर्संयोजन।
- पुनर्संयोजन आवृत्ति (RF) % = (पुनर्संयोजी संतति / कुल संतति) × 100। यह जीनों की दूरी का माप है; 1% RF = 1 मानचित्र इकाई = 1 सेंटीमॉर्गन (cM)। अधिकतम RF 50% (जीन असहलग्न की तरह व्यवहार)।
- आकलन: द्वि-बिंदु परीक्षण संकरण और त्रि-बिंदु परीक्षण संकरण (Three-point test cross) द्वारा।
10. जीन विनिमय (Crossing Over): परिचय और क्रियाविधि
समजात गुणसूत्रों के अभगिनी क्रोमैटिडों के बीच खंडों के आदान-प्रदान को क्रॉसिंग ओवर कहते हैं; यह अर्धसूत्री विभाजन की पैकीटीन अवस्था में होता है। सहलग्न जीनों के नए संयोजन (पुनर्संयोजन) इसी से बनते हैं।
- साइटोलॉजिकल प्रमाण: स्टर्न (ड्रोसोफिला, 1931) और क्रेइटन-मैक्लिंटॉक (मक्का, 1931)।
- क्रियाविधि: विच्छेदन-पुनर्मिलन (Breakage-reunion) मॉडल, हॉलिडे मॉडल, कॉपी-चॉइस सिद्धांत (बेलिंग)। जेनसेंस का काएज्मेटाइप सिद्धांत।
- प्रभावित करने वाले कारक: जीनों की दूरी, तापमान, आयु, लिंग, विकिरण, संरचनात्मक परिवर्तन (प्रतिलोमन क्रॉसिंग ओवर घटाता है)।
11. गुणसूत्र मानचित्रण (Chromosome Mapping)
गुणसूत्र पर जीनों की रेखीय व्यवस्था और उनकी आपेक्षिक दूरी दर्शाने वाला आरेख। स्टर्टवेंट (1913) ने मॉर्गन के सुझाव पर ड्रोसोफिला का पहला आनुवंशिक मानचित्र बनाया।
त्रि-बिंदु परीक्षण संकरण से मानचित्रण के चरण: (1) सबसे अधिक संख्या वाले दो वर्ग = मूल (Parental) और सबसे कम संख्या वाले दो वर्ग = द्विक विनिमय (DCO)। (2) मूल और DCO की तुलना से बीच वाला जीन ज्ञात करें। (3) प्रत्येक अंतराल की RF निकालें (एकल + द्विक विनिमय जोड़कर)। (4) मानचित्र बनाएँ।
हस्तक्षेप (I) = 1 − समन्वय गुणांक
अपेक्षित DCO = दो अंतरालों की RF का गुणनफल × कुल संतति
12. गुणसूत्र में संरचनात्मक और संख्यात्मक परिवर्तन
(क) संरचनात्मक परिवर्तन
| परिवर्तन | विवरण |
|---|---|
| विलोपन (Deletion) | खंड का लुप्त होना; मनुष्य में Cri-du-chat (5p विलोपन) |
| द्विगुणन (Duplication) | खंड का दोहराव; ड्रोसोफिला में Bar आँख |
| प्रतिलोमन (Inversion) | खंड का 180° पलटना; पैरासेंट्रिक व पेरीसेंट्रिक; क्रॉसिंग ओवर घटाता है |
| स्थानांतरण (Translocation) | गैर-समजात गुणसूत्रों के बीच खंड का आदान-प्रदान; अर्ध-बंध्यता; Oenothera में सम्मिश्र विषमयुग्मजता |
(ख) संख्यात्मक परिवर्तन
| वर्ग | विवरण / उदाहरण |
|---|---|
| यूप्लॉइडी | पूरे गुणसूत्र सेटों की संख्या में परिवर्तन: एकगुणित (n), द्विगुणित (2n), त्रिगुणित (3n), बहुगुणित |
| स्वबहुगुणित (Autopolyploid) | एक ही प्रजाति के सेट बढ़ना; बीजरहित तरबूज (3n), केला, आलू (4n) |
| परबहुगुणित (Allopolyploid) | भिन्न प्रजातियों के संकर से; ट्रिटिकेल (गेहूँ × राई), Raphanobrassica (Karpechenko), गेहूँ (AABBDD, 6x = 42), कपास (AADD, 52) |
| एन्यूप्लॉइडी | एक या कुछ गुणसूत्र कम/अधिक: नलीसोमिक (2n−2), मोनोसोमिक (2n−1), ट्राइसोमिक (2n+1), टेट्रासोमिक (2n+2) |
कोल्चिसिन (Colchicum autumnale से) तर्क (Spindle) बनना रोककर कृत्रिम बहुगुणन कराता है। मनुष्य में डाउन सिंड्रोम (21वें गुणसूत्र की ट्राइसोमी), टर्नर (45, X) और क्लाइनफेल्टर (47, XXY) एन्यूप्लॉइडी के उदाहरण हैं। प्रमुख फसलों में गुणसूत्र संख्या: धान 24, मक्का 20, मटर 14, बाजरा 14, मूँगफली 40, गेहूँ 42, कपास 52।
13. उत्परिवर्तन (Mutation): परिचय, लक्षण और वर्गीकरण
आनुवंशिक पदार्थ में अचानक होने वाला स्थायी परिवर्तन उत्परिवर्तन कहलाता है। शब्द: ह्यूगो डी व्रीज (1901, Oenothera lamarckiana)।
लक्षण
यादृच्छिक, सामान्यतः अप्रभावी व हानिकारक, पुनरावर्ती, प्रतिवर्ती (Reverse mutation) और वंशागत (जनन-कोशिका में हुए होने पर)।
| आधार | प्रकार |
|---|---|
| उत्पत्ति | स्वतः (Spontaneous) और प्रेरित (Induced) |
| कोशिका | कायिक (Somatic) और जनन (Germinal) |
| स्तर | जीन उत्परिवर्तन (बिंदु), गुणसूत्र उत्परिवर्तन, जीनोम उत्परिवर्तन |
| क्षार स्तर पर | प्रतिस्थापन: संक्रमण (प्यूरीन ↔ प्यूरीन, पिरीमिडीन ↔ पिरीमिडीन) और परिवर्तन (Transversion: प्यूरीन ↔ पिरीमिडीन); फ्रेमशिफ्ट (क्षार का निवेशन/विलोपन); साइलेंट, मिसेंस, नॉनसेंस |
| प्रभाव | पूर्वगामी (Forward) और प्रतिगामी (Reverse); मैक्रो और माइक्रो उत्परिवर्तन |
14. उत्परिवर्तजन (Mutagens): भौतिक और रासायनिक
| वर्ग | उदाहरण व विशेषता |
|---|---|
| आयनकारी विकिरण | X-किरणें, गामा किरणें (Co-60), α, β कण, न्यूट्रॉन; गुणसूत्र टूटना, जीन उत्परिवर्तन |
| अनायनकारी विकिरण | पराबैंगनी (लगभग 260 nm); थायमिन डाइमर बनाती है; कम भेदन क्षमता, इसलिए पराग/सूक्ष्मजीव पर उपयोगी |
| क्षार अनुरूप (Base analogues) | 5-ब्रोमोयूरेसिल, 2-अमीनोप्यूरीन |
| एल्काइलीकरण कारक | EMS (एथिल मेथेन सल्फोनेट), MMS, ईथिलीन ऑक्साइड; पौधों में सर्वाधिक प्रयुक्त |
| अन्य रसायन | नाइट्रस अम्ल (डीएमिनेशन), हाइड्रॉक्सिलैमिन, सोडियम एजाइड, एक्रीडीन रंजक (फ्रेमशिफ्ट) |
मुलर (1927) ने ड्रोसोफिला में X-किरणों से उत्परिवर्तन प्रेरित किए (नोबेल 1946); स्टैडलर (1928) ने जौ व मक्का में; ऑरबैक और रॉबसन (1941) ने सरसों गैस से रासायनिक उत्परिवर्तन दर्शाए।
15. उत्परिवर्तन प्रेरण की विधियाँ और CIB तकनीक
- सामग्री: बीज (सबसे आम), पराग, कलिकाएँ, कलमें, कंद।
- मात्रा: LD₅₀ (आधे जीवों को मारने वाली मात्रा) के आसपास; रसायन प्रयोग में पूर्व-भिगोना, उपचार और धोना।
- चयन: M₁ पीढ़ी में उत्परिवर्तन प्रायः दिखते नहीं; M₂ पीढ़ी में पृथक्करण होने पर चयन।
- उपलब्धियाँ: गेहूँ की शरबती सोनोरा (गामा किरण उत्परिवर्तन), धान की जगन्नाथ, मूँगफली की ट्रॉम्बे किस्में (TG 37A आदि)।
CIB तकनीक (मुलर)
ड्रोसोफिला में लिंग सहलग्न अप्रभावी घातक उत्परिवर्तन पहचानने की विधि। C = क्रॉसिंग ओवर निरोधक (प्रतिलोमन), I = अप्रभावी घातक जीन, B = Bar आँख (प्रभावी चिह्नक)।
- उपचारित जंगली नर को CIB मादा से संकरित करें।
- F₁ में Bar आँख वाली मादा (CIB/+) चुनें और जंगली नर से संकरित करें।
- F₂ में यदि जंगली (सामान्य) नर अनुपस्थित हों तो उपचारित X गुणसूत्र पर घातक उत्परिवर्तन प्रेरित हुआ माना जाता है।
16. गुणात्मक व मात्रात्मक लक्षण, पॉलीजीन और बहुकारक परिकल्पना
| बिंदु | गुणात्मक लक्षण | मात्रात्मक लक्षण |
|---|---|---|
| विविधता | असतत (स्पष्ट वर्ग) | सतत (घंटीनुमा वितरण) |
| जीन | एक या कुछ मुख्य जीन (ओलिगोजीन) | अनेक छोटे प्रभाव वाले जीन (पॉलीजीन) |
| पर्यावरण का प्रभाव | कम | अधिक |
| उदाहरण | मटर का बीज आकार, फूल का रंग | उपज, ऊँचाई, तेल प्रतिशत, दाने का वजन |
| विश्लेषण | मेंडेलियन अनुपात | सांख्यिकीय माप (माध्य, प्रसरण) |
बहुकारक परिकल्पना (Multiple Factor Hypothesis): निल्सन-एहले (1909) ने गेहूँ में दाने के लाल रंग पर प्रयोग किए और ईस्ट ने तंबाकू में पुष्प-नलिका की लंबाई पर। इसके मुख्य बिंदु: (1) लक्षण अनेक जीनों से नियंत्रित, (2) प्रत्येक का छोटा व संचयी (योगात्मक) प्रभाव, (3) कोई प्रभाविता नहीं, (4) पर्यावरण का प्रभाव, (5) F₂ में सतत वितरण। गेहूँ में दो जीन युग्म पर F₂ का अनुपात 1:4:6:4:1 और तीन जीन युग्म पर 1:6:15:20:15:6:1 होता है (दाने के लाल रंग में कुछ संकरों में 15:1 तथा 63:1 का अनुपात)।
17. कोशिकाद्रव्यीय वंशागति (Cytoplasmic Inheritance)
वह वंशागति जिसमें लक्षण केन्द्रक के बाहर स्थित आनुवंशिक पदार्थ (प्लास्टिड, माइटोकॉन्ड्रिया, प्लाज्मिड) से नियंत्रित होते हैं। इसमें मेंडेलियन अनुपात नहीं मिलता, प्रत्यागामी संकरण के परिणाम भिन्न होते हैं और वंशागति मातृ पक्ष से होती है।
| उदाहरण | विवरण |
|---|---|
| प्लास्टिड वंशागति | कोरेन्स (1909), गुलबाँस (Mirabilis jalapa) में पत्तियों की चितकबरी; बाउर, Pelargonium |
| कोशिकाद्रव्यी नर बंध्यता (CMS) | माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम से नियंत्रित; मक्का (T-कोशिकाद्रव्य), बाजरा (A₁ पद्धति)। संकर बीज उत्पादन में अत्यंत उपयोगी (जैसे बाजरा संकर HHB 67)। |
| कप्पा कण | पैरामीशियम में (सोनेबोर्न) |
| मातृ प्रभाव | घोंघे Limnaea peregra में कवच का कुंडलन (स्टर्टवेंट 1923) |
18. आनुवंशिक विकार (Genetic Disorders)
| वर्ग | उदाहरण |
|---|---|
| ऑटोसोमल अप्रभावी | सिकल सेल एनीमिया, फिनाइलकीटोन्यूरिया (PKU), एल्बिनिज्म, थैलेसीमिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस |
| ऑटोसोमल प्रभावी | हंटिंगटन कोरिया, एकॉन्ड्रोप्लेसिया, पॉलीडैक्टिली |
| X-सहलग्न अप्रभावी | वर्णांधता, हीमोफिलिया, ड्यूशेन मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी |
| गुणसूत्रीय | डाउन सिंड्रोम (21 ट्राइसोमी), क्लाइनफेल्टर (XXY), टर्नर (XO), पटाऊ (13 ट्राइसोमी), एडवर्ड (18 ट्राइसोमी), Cri-du-chat (विलोपन) |
पौधों में एल्बिनो पौधे, क्लोरोफिल की कमी वाले उत्परिवर्ती और नर बंध्यता आनुवंशिक विकार के उदाहरण हैं।
19. आनुवंशिक पदार्थ: प्रकृति, संरचना और प्रकार
- खोज: फ्रेडरिक मीशर (1869) ने "न्यूक्लिन" अलग किया। चारगाफ के नियम: A = T और G = C (प्यूरीन = पिरीमिडीन)।
- वॉटसन व क्रिक (1953): DNA की द्विकुंडलित संरचना (विल्किंस और फ्रैंकलिन के X-किरण चित्रों पर आधारित)। B-DNA: दो विपरीत समानांतर (Antiparallel) श्रृंखलाएँ, व्यास लगभग 20 Å, प्रत्येक कुंडल में 10 क्षार युग्म, कुंडल की लंबाई 34 Å, क्षारों के बीच दूरी 3.4 Å। A-T के बीच 2 और G-C के बीच 3 हाइड्रोजन बंध।
- DNA के रूप: A, B (सबसे सामान्य) और Z (बायाँ कुंडलित)।
- RNA के प्रकार: mRNA, tRNA (तिपतिया/क्लोवरलीफ आकृति), rRNA। TMV और रेट्रोवायरस में RNA आनुवंशिक पदार्थ है।
20. DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है: प्रमाण
| प्रयोग | निष्कर्ष |
|---|---|
| ग्रिफिथ (1928): Streptococcus pneumoniae | रूपांतरण (Transformation): मृत S-प्रकार के जीवाणु ने जीवित R-प्रकार को रोगजनक बनाया |
| एवरी, मैक्लियोड व मैक्कार्टी (1944) | रूपांतरणकारी सिद्धांत DNA है (प्रोटीन या RNA नहीं) |
| हर्शी व चेज़ (1952): T₂ जीवाणुभोजी | ³²P (DNA) जीवाणु में प्रवेश करता है, ³⁵S (प्रोटीन) बाहर रहता है, इसलिए DNA आनुवंशिक पदार्थ |
| फ्रेंकेल-कॉनराट (1957): TMV | कुछ विषाणुओं में RNA आनुवंशिक पदार्थ |
21. आनुवंशिक पदार्थ की प्रतिकृति (Replication)
DNA प्रतिकृति अर्धसंरक्षी (Semiconservative) होती है, जिसे मेसेल्सन और स्टाल (1958) ने E. coli में ¹⁵N/¹⁴N और CsCl घनत्व प्रवणता से सिद्ध किया।
| एंजाइम / घटक | कार्य |
|---|---|
| हेलिकेज़ | DNA की दोनों श्रृंखलाएँ खोलता है |
| SSB प्रोटीन | खुली एकल श्रृंखलाओं को स्थिर रखता है |
| टोपोआइसोमरेज़/जाइरेज़ | कुंडलन का तनाव कम करता है |
| प्राइमेज़ | RNA प्राइमर बनाता है |
| DNA पॉलीमरेज़ III | 5′→3′ दिशा में मुख्य संश्लेषण (E. coli) |
| DNA पॉलीमरेज़ I | प्राइमर हटाकर रिक्त स्थान भरता है |
| DNA लाइगेज़ | ओकाजाकी खंडों को जोड़ता है |
अग्रणी (Leading) श्रृंखला सतत बनती है, पश्चगामी (Lagging) श्रृंखला छोटे खंडों (ओकाजाकी खंड) के रूप में अनिरंतर बनती है। प्रतिकृति उत्पत्ति स्थल (ori) से द्विदिशीय होती है।
22. आनुवंशिक कूट (Genetic Code) और प्रोटीन संश्लेषण
केंद्रीय सिद्धांत (क्रिक, 1958): DNA → RNA → प्रोटीन।
आनुवंशिक कूट की विशेषताएँ
- त्रिक कूट (Triplet): 3 क्षार = 1 कोडॉन; कुल 64 कोडॉन (61 अमीनो अम्ल के लिए, 3 विराम कोडॉन: UAA, UAG, UGA)।
- प्रारंभ कोडॉन AUG (मेथियोनीन)।
- अपभ्रंश (Degenerate), अधिव्यापी नहीं (Non-overlapping), विरामरहित (Commaless), प्रायः सार्वत्रिक (माइटोकॉन्ड्रिया में अपवाद)।
- निरेनबर्ग और मैथाई (1961) ने poly-U से फेनिलएलानिन का कोडॉन (UUU) सिद्ध किया; खुराना ने कूट को संश्लेषित किया। क्रिक का वॉबल परिकल्पना: कोडॉन के तीसरे क्षार पर लचीलापन।
23. अनुलेखन (Transcription) की क्रियाविधि
DNA की एक श्रृंखला (टेम्पलेट) से RNA का संश्लेषण RNA पॉलीमरेज़ द्वारा 5′→3′ दिशा में।
- प्रारंभन: प्रोमोटर (प्रोकैरियोट में Pribnow बॉक्स/−10, −35 क्षेत्र; यूकैरियोट में TATA बॉक्स) से सिग्मा कारक की सहायता से जुड़ना।
- दीर्घीकरण: RNA श्रृंखला का बढ़ना।
- समापन: रो-निर्भर या रो-स्वतंत्र समापन।
यूकैरियोट में RNA प्रसंस्करण: 5′ सिरे पर 7-मिथाइलग्वानोसिन कैप, 3′ सिरे पर पॉली-A पूँछ और इंट्रॉन हटाकर एक्सॉन जोड़ना (स्प्लाइसिंग)।
24. अनुवादन (Translation) की क्रियाविधि
- राइबोसोम: प्रोकैरियोट 70S (50S + 30S); यूकैरियोट 80S (60S + 40S)। स्थल: A, P और E।
- अमीनो अम्ल सक्रियण: एमिनोएसिल tRNA सिंथेटेज़ अमीनो अम्ल को tRNA से जोड़ता है।
- प्रारंभन: AUG पर प्रारंभक tRNA (प्रोकैरियोट में fMet-tRNA) और Shine-Dalgarno क्रम।
- दीर्घीकरण: पेप्टाइडिल ट्रांसफरेज़ द्वारा पेप्टाइड बंध; राइबोसोम का आगे सरकना (ट्रांसलोकेशन)।
- समापन: विराम कोडॉन पर रिलीज़ कारकों द्वारा पॉलीपेप्टाइड का अलग होना।
25. जीन की अवधारणा: संरचना और कार्य
बेंज़र (Benzer) ने जीन की सूक्ष्म इकाइयाँ बताईं: सिस्ट्रॉन (कार्यात्मक इकाई), रीकॉन (पुनर्संयोजन इकाई) और म्यूटॉन (उत्परिवर्तन इकाई)। जीन संरचना में प्रोमोटर, कोडिंग क्षेत्र और समापन क्षेत्र होते हैं। यूकैरियोट में जीन खंडित (Split genes) होते हैं, जिनमें एक्सॉन (कोडिंग) और इंट्रॉन (गैर-कोडिंग) होते हैं (शार्प व रॉबर्ट्स, 1977)। बीडल व टैटम (1941) की "एक जीन-एक एंजाइम" परिकल्पना जीन के कार्य की मूल अवधारणा है।
26. जीन नियमन: ओपेरॉन, Lac व Trp ओपेरॉन
जैकब और मोनो (1961) ने E. coli में Lac ओपेरॉन का मॉडल दिया (नोबेल 1965)। ओपेरॉन में संरचनात्मक जीन, प्रचालक (Operator) और प्रोमोटर होते हैं; नियामक जीन दमनकारी (Repressor) बनाता है।
| बिंदु | Lac ओपेरॉन | Trp ओपेरॉन |
|---|---|---|
| प्रकार | प्रेरणीय (Inducible); अपचयी मार्ग | दमनीय (Repressible); जैव-संश्लेषी मार्ग |
| संरचनात्मक जीन | lacZ (β-गैलेक्टोसिडेज़), lacY (परमिएज़), lacA (ट्रांसएसिटाइलेज़) | trpE, D, C, B, A (ट्रिप्टोफैन संश्लेषण के एंजाइम) |
| नियामक जीन | lacI (दमनकारी) | trpR (अक्रिय दमनकारी) |
| नियंत्रण | लैक्टोज (एलोलैक्टोज़) प्रेरक बनकर दमनकारी से जुड़ता है, ओपेरॉन चालू | ट्रिप्टोफैन सह-दमनकारी बनकर दमनकारी को सक्रिय करता है, ओपेरॉन बंद; क्षीणन (Attenuation) भी |
| अतिरिक्त नियंत्रण | ग्लूकोज की कमी पर cAMP-CAP से धनात्मक नियंत्रण (उपचय दमन) | ट्रिप्टोफैन अधिक होने पर संश्लेषण बंद |
27. प्रैक्टिकल में क्या सीखेंगे
- सूक्ष्मदर्शी के भाग व प्रकार; कोशिका संरचना का अध्ययन
- एकल, द्वि व त्रिसंकर, परीक्षण संकरण और प्रतिसंकरण पर प्रयोग तथा एपीस्टेसिस के अभ्यास
- अभिरंजक (जैसे ऐसीटोकार्मिन, ऐसीटो-ऑर्सीन) और स्थिरक (जैसे कार्नॉय द्रव: एथेनॉल व एसिटिक अम्ल 3:1) बनाना
- प्याज की जड़ के शीर्ष में समसूत्री विभाजन और परागकोष में अर्धसूत्री विभाजन का अवलोकन
- प्रायिकता व काई-वर्ग के प्रश्न
- द्वि-बिंदु और त्रि-बिंदु परीक्षण संकरण से सहलग्नता और क्रॉसिंग ओवर विश्लेषण
- ड्रोसोफिला में लिंग सहलग्न वंशागति और DNA/RNA मॉडल का अध्ययन
28. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)
- मेंडल: मटर; 3:1, 9:3:3:1; परीक्षण संकरण 1:1 (एकल) और 1:1:1:1 (द्वि)।
- एपीस्टेसिस अनुपात: 9:7, 9:3:4, 15:1, 9:6:1, 12:3:1, 13:3।
- सहलग्नता: बेटसन-पनेट; 1% RF = 1 cM; अधिकतम 50%।
- DNA प्रमाण: ग्रिफिथ → एवरी → हर्शी-चेज़। अर्धसंरक्षी प्रतिकृति: मेसेल्सन-स्टाल।
- 64 कोडॉन; AUG प्रारंभ; UAA, UAG, UGA विराम।
- Lac ओपेरॉन: जैकब-मोनो; प्रेरणीय; Trp: दमनीय।
- CIB तकनीक: C = क्रॉसओवर निरोधक, I = घातक, B = Bar आँख।
29. महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. आनुवंशिकी का जनक किसे कहा जाता है? (अ) डार्विन (ब) मेंडल (स) मॉर्गन (द) वॉटसन। उत्तर: ब
Q2. द्विसंकर संकरण में F₂ फीनोटाइप अनुपात है: (अ) 3:1 (ब) 1:2:1 (स) 9:3:3:1 (द) 9:7। उत्तर: स
Q3. पूरक जीन अंतःक्रिया का अनुपात है: (अ) 9:7 (ब) 12:3:1 (स) 15:1 (द) 13:3। उत्तर: अ
Q4. DNA प्रतिकृति के मॉडल को किसने सिद्ध किया? (अ) मेसेल्सन व स्टाल (ब) हर्शी व चेज़ (स) ग्रिफिथ (द) चारगाफ। उत्तर: अ
Q5. प्रारंभ कोडॉन है: (अ) UAA (ब) AUG (स) UGA (द) GGG। उत्तर: ब
Q6. Lac ओपेरॉन की खोज किसने की? (अ) जैकब व मोनो (ब) बीडल व टैटम (स) क्रिक (द) खुराना। उत्तर: अ
Q7. कोल्चिसिन किसमें सहायक है? (अ) उत्परिवर्तन (ब) बहुगुणन (स) विलोपन (द) प्रतिलोमन। उत्तर: ब
Q8. गेहूँ में गुणसूत्र संख्या (2n) है: (अ) 14 (ब) 28 (स) 42 (द) 56। उत्तर: स
30. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: GPB-121 के कितने क्रेडिट और लेक्चर हैं?
उत्तर: 3 क्रेडिट (2+1); थ्योरी के 32 और प्रैक्टिकल के 16 लेक्चर।
प्रश्न: जीनोटाइप और फीनोटाइप में क्या अंतर है?
उत्तर: जीनोटाइप जीव की आनुवंशिक संरचना है और फीनोटाइप उसके बाहरी लक्षण।
प्रश्न: एपीस्टेसिस और प्रभाविता में अंतर क्या है?
उत्तर: प्रभाविता एक ही स्थान के एलील के बीच होती है, जबकि एपीस्टेसिस भिन्न स्थानों के जीनों के बीच।
प्रश्न: क्रॉसिंग ओवर कब होता है?
उत्तर: अर्धसूत्री विभाजन की प्रोफेज I की पैकीटीन अवस्था में।
प्रश्न: बहुगुणन का कृषि में क्या महत्व है?
उत्तर: बीजरहित फल, ट्रिटिकेल जैसी नई फसलें और बड़े आकार वाले अंग (गिगास प्रभाव)।
प्रश्न: CMS का फसल सुधार में क्या उपयोग है?
उत्तर: संकर बीज उत्पादन में हस्त-विपुंसन के बिना नर बंध्य पैतृक बनाना।
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संदर्भ पुस्तकें (Reference Books)
पी.के. गुप्ता, Cytology, Genetics and Evolution (हिंदी संस्करण), रस्तोगी पब्लिकेशन्स, मेरठ; क्लग एवं कमिंग्स, Concepts of Genetics; बी.डी. सिंह, Genetics, कल्याणी पब्लिशर्स; स्ट्रिकबर्गर, Genetics; ए.के. शर्मा एवं आर.ए. शर्मा, Crop Improvement and Mutagenesis।
नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। पाठ्यक्रम का स्रोत: Swami Keshwanand Rajasthan Agricultural University, Bikaner की Vth Deans' Committee Report।
