कृषि प्रणाली एवं सतत कृषि (Farming System & Sustainable Agriculture, AGRON-223) B.Sc. (Hons.) Agriculture के चौथे सेमेस्टर का 1 क्रेडिट (1+0) का कोर्स है। आज किसान की आय बढ़ाने, जोखिम घटाने और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए केवल एक फसल पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। इस विषय में हम सीखते हैं कि खेती के विभिन्न घटकों (फसल, पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन आदि) को मिलाकर कैसे टिकाऊ और लाभकारी मॉडल बनाया जाता है। सिलेबस में 16 थ्योरी लेक्चर हैं। इस लेख में सभी टॉपिक तालिकाओं, सूत्रों, MCQ और FAQ के साथ समझाए गए हैं।
1. कृषि प्रणाली (Farming System): संकल्पना, क्षेत्र और महत्व
कृषि प्रणाली एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें किसान परिवार अपने संसाधनों, पर्यावरण और लक्ष्यों के अनुसार फसल, पशुधन, मछली, वानिकी आदि उद्यमों को एक साथ संचालित करता है। इसमें खेत एक इकाई के रूप में देखा जाता है, न कि केवल फसल का उत्पादन।
क्षेत्र (Scope)
फसल उत्पादन, पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन, रेशम कीट पालन, कृषि प्रसंस्करण और विपणन तक विस्तार।
महत्व
- वर्षभर आय और रोजगार, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए
- एक उद्यम के असफल होने पर दूसरे से जोखिम की भरपाई
- अवशेषों और उप-उत्पादों का पुनः उपयोग (संसाधन चक्रण)
- पोषण सुरक्षा और संतुलित आहार की उपलब्धता
- मृदा स्वास्थ्य व पर्यावरण संरक्षण
2. कृषि प्रणाली के प्रकार और उन्हें प्रभावित करने वाले कारक
| आधार | प्रकार |
|---|---|
| जल उपलब्धता | सिंचित खेती, बारानी/वर्षा आधारित खेती, शुष्क खेती (Dryland farming; सामान्यतः 750 मिमी से कम वर्षा वाले क्षेत्र) |
| उत्पादन उद्देश्य | निर्वाह खेती (Subsistence), वाणिज्यिक खेती (Commercial) |
| फसल/उद्यम का स्वरूप | विशिष्ट खेती (Specialized), विविध खेती (Diversified), मिश्रित खेती (Mixed farming: फसल + पशुधन) |
| स्वामित्व/संगठन | सहकारी खेती, सामूहिक खेती, राजकीय खेती, संविदा (Contract) खेती |
| विशेष पद्धतियाँ | झूम (स्थानांतरी) खेती, सीढ़ीनुमा खेती, रोपण खेती (चाय, कॉफी, रबर), जैविक खेती, लेय फार्मिंग (घास-फसल चक्र) |
प्रभावित करने वाले कारक
| वर्ग | कारक |
|---|---|
| भौतिक | जलवायु, वर्षा, मृदा, भू-आकृति, जल स्रोत |
| जैविक | फसल प्रजातियाँ, कीट-रोग, पशु नस्लें |
| सामाजिक-आर्थिक | जोत का आकार, पूँजी, श्रम, बाजार, ऋण, भूमि स्वामित्व, परिवार का आकार |
| संस्थागत व तकनीकी | सरकारी नीति, सब्सिडी, MSP, अनुसंधान और प्रसार सेवाएँ, यंत्रीकरण |
3. कृषि प्रणाली के घटक और उनका रखरखाव
- फसल घटक: अनाज, दलहन, तिलहन, चारा, सब्जी, फल।
- पशुधन: गाय-भैंस (डेयरी), बकरी, भेड़, ऊँट (राजस्थान में विशेष); गोबर और दूध-ऊन-मांस।
- मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, बत्तख पालन।
- कृषि वानिकी: खेजड़ी, बेर, नीम, सफेदा; ईंधन, चारा, छाया, जैविक खाद।
- सहायक उद्यम: मधुमक्खी पालन, मशरूम, रेशम कीट पालन, वर्मीकम्पोस्ट, बायोगैस।
रखरखाव: प्रत्येक घटक के लिए संतुलित पोषण, रोग प्रबंधन, उचित आवास, रिकॉर्ड रखना और घटकों के बीच उप-उत्पादों का आदान-प्रदान करना आवश्यक है।
4. फसल प्रणाली और फसल प्रतिरूप (Cropping System & Pattern)
- फसल प्रतिरूप (Cropping pattern): किसी निश्चित समय पर विभिन्न फसलों के अंतर्गत क्षेत्र का अनुपात।
- फसल प्रणाली (Cropping system): किसी खेत में फसल प्रतिरूप और उसके प्रबंधन का संयुक्त रूप।
- फसल सघनता (Cropping intensity): (कुल बोया गया क्षेत्र / शुद्ध बोया गया क्षेत्र) × 100।
बहुफसली प्रणाली (Multiple Cropping)
एक ही खेत में एक वर्ष में एक से अधिक फसल उगाना।
| पद्धति | अर्थ व उदाहरण |
|---|---|
| एकल फसली (Monoculture) | वर्षों तक एक ही फसल उगाना |
| फसल चक्र (Crop rotation) | निश्चित क्रम में फसलों को बदलना; जैसे मूँग - गेहूँ |
| क्रमिक फसल (Sequential cropping) | एक फसल के बाद दूसरी फसल; दो/तीन फसल प्रणाली |
| अंतरफसल (Intercropping) | एक ही खेत में एक साथ दो या अधिक फसलें पंक्तियों में; जैसे बाजरा + मूँग, मक्का + सोयाबीन, गेहूँ + सरसों (9:1) |
| मिश्रित फसल (Mixed cropping) | बिना पंक्ति व्यवस्था के बीजों को मिलाकर बोना |
| रिले फसल (Relay cropping) | खड़ी फसल में अगली फसल की बुवाई |
| पट्टीदार फसल (Strip cropping) | कई पंक्तियों की पट्टियों में अलग-अलग फसलें |
| रेटून फसल | कटाई के बाद ठूँठ से उगी फसल (जैसे गन्ना) |
अंतरफसल के लाभ: भूमि, प्रकाश और जल का बेहतर उपयोग, जोखिम में कमी, दलहनी फसल से नाइट्रोजन लाभ, कीट-रोग में कमी और अधिक आय।
5. कुशल फसल प्रणालियाँ और उनका मूल्यांकन
किसी प्रणाली की तुलना के लिए निम्न सूचकांक प्रयोग किए जाते हैं:
| सूचकांक | सूत्र / अर्थ |
|---|---|
| भूमि समतुल्य अनुपात (LER) | LER = (अंतरफसल में फसल A की उपज / एकल A की उपज) + (अंतरफसल में फसल B की उपज / एकल B की उपज)। LER > 1 का अर्थ अंतरफसल लाभदायक। |
| क्षेत्र-समय समतुल्य अनुपात (ATER) | LER के साथ फसल अवधि का भी ध्यान रखता है |
| फसल समतुल्य उपज (CEY) | अंतरफसल की उपज को मुख्य फसल की उपज के समतुल्य बाजार मूल्य अनुसार बदलना |
| उत्पादन क्षमता (Production efficiency) | कुल उपज (किग्रा) / कुल फसल अवधि (दिन); इकाई: किग्रा/हेक्टेयर/दिन |
| भूमि उपयोग क्षमता | साल भर में कितने दिन फसल खेत में रही, उसका प्रतिशत |
| सापेक्ष भीड़ गुणांक (K) और आक्रामकता (Aggressivity) | अंतरफसल में एक फसल की दूसरी पर प्रतिस्पर्धा मापने के लिए |
| लाभ-लागत अनुपात (B:C) | कुल आय / कुल लागत; शुद्ध आय = कुल आय − कुल लागत |
6. सहायक उद्यम और उनका महत्व
| उद्यम | महत्व |
|---|---|
| डेयरी | दैनिक आय, गोबर से खाद व बायोगैस, फसल अवशेष का चारे में उपयोग |
| बकरी/भेड़ पालन | शुष्क क्षेत्रों में कम लागत; ऊन, मांस, खाद |
| मुर्गी पालन | कम समय में आय; बीट से खाद व मछली दाना |
| मत्स्य पालन | तालाब का पानी सिंचाई में उपयोगी; प्रोटीन व अतिरिक्त आय |
| मधुमक्खी पालन | शहद, मोम; परागण से फसल उपज में वृद्धि |
| वर्मीकम्पोस्ट व मशरूम | कृषि अवशेष का मूल्य संवर्धन; कम जगह में अधिक आय |
| कृषि वानिकी | लकड़ी, चारा, छाया, मृदा संरक्षण, जोखिम में कमी |
उत्पादन व क्षमता निर्धारण के उपकरण (Tools)
शुद्ध आय व B:C अनुपात, उत्पादन क्षमता, ऊर्जा विश्लेषण (ऊर्जा निर्गत / ऊर्जा निवेश), रोजगार सृजन (श्रम दिवस/हेक्टेयर), संसाधन उपयोग क्षमता (जल, पोषक तत्व), स्थायी उपज सूचकांक (SYI) और रैखिक प्रोग्रामिंग (Linear programming) जैसी अनुकूलन तकनीकें।
7. सतत कृषि (Sustainable Agriculture): समस्याएँ और प्रभाव
सतत कृषि का आशय ऐसी खेती से है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करे और भविष्य की पीढ़ियों की क्षमता को हानि न पहुँचाए (ब्रंटलैंड रिपोर्ट, 1987 की अवधारणा)। यह तीन स्तंभों पर आधारित है: पारिस्थितिक, आर्थिक और सामाजिक।
| समस्या | प्रभाव |
|---|---|
| मृदा क्षरण, कार्बनिक पदार्थ में कमी, लवणता | उत्पादकता में गिरावट |
| भूजल का अत्यधिक दोहन | जल स्तर गिरना, सिंचाई लागत बढ़ना |
| रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का असंतुलित प्रयोग | प्रदूषण, कीट प्रतिरोधकता, स्वास्थ्य पर असर, उर्वरक उपयोग क्षमता में कमी |
| फसल विविधता में कमी | जोखिम और कीट-रोग बढ़ना |
| जलवायु परिवर्तन व ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन | अनिश्चित वर्षा, ऊष्मा तनाव, सूखे-बाढ़ की घटनाएँ |
| छोटी जोत और कम आय | सीमित निवेश क्षमता |
8. सततता के संकेतक, अनुकूलन और शमन
- संकेतक (Indicators): मृदा जैविक कार्बन और मृदा स्वास्थ्य, भूजल स्तर, उपज की प्रवृत्ति और स्थिरता, स्थायी उपज सूचकांक (SYI), शुद्ध आय, ऊर्जा क्षमता, जैव विविधता और पर्यावरणीय गुणवत्ता।
- स्थायी उपज सूचकांक: SYI = (औसत उपज − मानक विचलन) / अधिकतम उपज।
- अनुकूलन (Adaptation): जलवायु-सहनशील किस्में, बुवाई समय में बदलाव, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण, फसल बीमा।
- शमन (Mitigation): ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाना और कार्बन अवशोषण बढ़ाना; जैसे संरक्षण जुताई, कृषि वानिकी, धान में जल प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग।
9. संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture)
संरक्षण कृषि में मिट्टी, जल और जैव विविधता का संरक्षण करते हुए उत्पादन लिया जाता है। इसके तीन मूल सिद्धांत हैं:
| सिद्धांत | विवरण |
|---|---|
| 1. न्यूनतम मृदा विक्षोभ | शून्य या न्यूनतम जुताई; जैसे ज़ीरो-टिल ड्रिल या हैप्पी सीडर से बुवाई |
| 2. स्थायी मृदा आवरण | फसल अवशेष मल्च या आवरण फसलें; नमी बचती है और कटाव घटता है |
| 3. विविध फसल चक्र | अनाज-दलहन-तिलहन का समुचित चक्र; कीट-रोग चक्र टूटता है |
संबंधित रणनीतियाँ: अवशेष प्रबंधन (पराली न जलाना), लेजर लैंड लेवलिंग, उठी हुई क्यारी (Raised bed) पर बुवाई, नियंत्रित आवागमन और एकीकृत पोषक तत्व व खरपतवार प्रबंधन।
10. HEIA, LEIA और LEISA
| प्रणाली | पूर्ण रूप | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| HEIA | High External Input Agriculture | उच्च उपज हेतु अधिक उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और यंत्र (हरित क्रांति मॉडल)। लाभ: उच्च उत्पादकता। हानि: पर्यावरणीय क्षति, ऊँची लागत, संसाधन ह्रास। |
| LEIA | Low External Input Agriculture | बाहरी आदानों का न्यूनतम उपयोग; अधिकतर स्थानीय संसाधन (गोबर खाद, देसी बीज) पर निर्भर। इसमें उपज कम रह सकती है। |
| LEISA | Low External Input and Sustainable Agriculture | स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग और बाहरी आदानों का आवश्यकता अनुसार संतुलित प्रयोग; सततता पर जोर। |
सततता के लिए तकनीकें (LEISA)
हरी खाद, कम्पोस्ट व वर्मीकम्पोस्ट, जैव उर्वरक, फसल चक्र और अंतरफसल, समेकित कीट प्रबंधन (IPM), मल्चिंग, वर्षा जल संग्रहण, कृषि वानिकी, जैविक और प्राकृतिक खेती।
11. समेकित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System, IFS)
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में परंपरागत रूप से किसान फसल और पशुपालन साथ-साथ करते थे। हरित क्रांति के बाद फसल-केंद्रित खेती बढ़ी, पर छोटे किसानों की आय व पर्यावरण पर दबाव के कारण 1970-80 के दशक से कृषि प्रणाली अनुसंधान (Farming Systems Research) पर जोर दिया गया। ICAR का भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (IIFSR) मोदीपुरम (मेरठ) में स्थित है।
उद्देश्य और विशेषताएँ
- प्रति इकाई भूमि से अधिक और स्थिर आय व रोजगार
- जोखिम में कमी और वर्षभर नकद प्रवाह
- अपशिष्ट का पुनर्चक्रण और बाहरी आदानों में कमी
- पोषण सुरक्षा और संसाधनों का संरक्षण
- विशेषताएँ: घटकों में सहक्रिया (Synergism), विविधता, संसाधन चक्रण और ऊर्जा का सक्षम प्रवाह
IFS के घटक और लाभ
मुख्य घटक: फसलें, डेयरी/पशुपालन, मुर्गी/बत्तख, मछली, मधुमक्खी, कृषि वानिकी, मशरूम, वर्मीकम्पोस्ट, बायोगैस। लाभ: अधिक शुद्ध आय, कम लागत, उत्पादकता में वृद्धि, रोजगार सृजन, पर्यावरण अनुकूल, छोटी जोत में भी उपयुक्त।
12. कृषि-जलवायु क्षेत्र अनुसार IFS मॉडल (Site-specific)
| क्षेत्र | उपयुक्त IFS संयोजन (उदाहरण) |
|---|---|
| शुष्क/अर्द्ध-शुष्क (पश्चिमी राजस्थान) | बाजरा-मूँग-ग्वार आधारित फसलें + बकरी/भेड़/देशी गाय/ऊँट + खेजड़ी, बेर कृषि वानिकी + सेवण-धामन घास चारागाह + वर्षा जल संग्रहण (टांका, खड़ीन) |
| सिंचित उत्तर-पश्चिम मैदान | गेहूँ-धान/कपास/मक्का/सरसों + डेयरी + मछली पालन + मधुमक्खी + मुर्गी पालन |
| पूर्वी आर्द्र क्षेत्र | धान-मछली-बत्तख + बागवानी + डेयरी |
| पहाड़ी क्षेत्र | सीढ़ीनुमा खेती + फल + सब्जी + पशुधन + मधुमक्खी |
| तटीय क्षेत्र | नारियल + मछली/झींगा + धान + सब्जियाँ |
संसाधन उपयोग क्षमता और अनुकूलन तकनीकें
जल उपयोग क्षमता (WUE), पोषक तत्व उपयोग क्षमता, ऊर्जा उपयोग क्षमता और श्रम उपयोग क्षमता बढ़ाना। अनुकूलन हेतु बजटिंग, रैखिक प्रोग्रामिंग (LP) और लक्ष्य प्रोग्रामिंग जैसी विधियाँ लागत घटाने और आय बढ़ाने के उद्यमों का सही अनुपात तय करने में सहायक हैं।
13. संसाधन चक्रण और ऊर्जा प्रवाह
- चक्रण का उदाहरण: फसल अवशेष → पशु चारा → गोबर → बायोगैस/खाद → खेत। मुर्गी की बीट → मछली दाना/खाद। तालाब का पोषक युक्त पानी → सिंचाई।
- ऊर्जा प्रवाह: सूर्य की ऊर्जा → उत्पादक (फसलें) → उपभोक्ता (पशु, मनुष्य) → अपघटक। पोषी स्तर पर लगभग 10% ऊर्जा ही अगले स्तर तक पहुँचती है (लिंडमैन का 10% नियम)।
- ऊर्जा अनुपात = कुल ऊर्जा निर्गत / कुल ऊर्जा निवेश; अनुपात अधिक होने पर ऊर्जा क्षमता अधिक।
14. कृषि प्रणाली और पर्यावरण; IFS मॉडल का भ्रमण
सही प्रणाली से मृदा कार्बन बढ़ता है, कृत्रिम आदानों से प्रदूषण घटता है, जैव विविधता और जल संरक्षण बेहतर होते हैं। सिलेबस के अनुसार विद्यार्थियों को नजदीकी राज्यों के विश्वविद्यालयों, संस्थानों (जैसे IIFSR मोदीपुरम, CAZRI जोधपुर) और किसानों के खेतों पर IFS मॉडल का भ्रमण कराया जाता है, ताकि वे उत्पादन, आय और संसाधन चक्रण का प्रत्यक्ष अध्ययन कर सकें।
15. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)
- फसल सघनता = (कुल बोया क्षेत्र / शुद्ध बोया क्षेत्र) × 100।
- LER > 1 हो तो अंतरफसल लाभदायक।
- संरक्षण कृषि के 3 सिद्धांत: न्यूनतम विक्षोभ, स्थायी आवरण, फसल विविधता।
- HEIA = अधिक बाहरी आदान; LEISA = कम बाहरी आदान + सततता।
- सततता के तीन आयाम: पारिस्थितिक, आर्थिक, सामाजिक।
- IFS का मुख्य लाभ: सहक्रिया, जोखिम में कमी, संसाधन चक्रण।
16. महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. LER का मान 1 से अधिक होने का अर्थ है: (अ) अंतरफसल लाभदायक (ब) एकल फसल अच्छी (स) हानि (द) कोई अंतर नहीं। उत्तर: अ
Q2. संरक्षण कृषि का सिद्धांत नहीं है: (अ) न्यूनतम मृदा विक्षोभ (ब) स्थायी आवरण (स) गहरी जुताई बार-बार (द) फसल विविधीकरण। उत्तर: स
Q3. LEISA का पूर्ण रूप है: (अ) Low External Input and Sustainable Agriculture (ब) Local Energy Input and Soil Agriculture (स) Low Energy Intensive Sustainable Agriculture (द) Long Established Integrated Sustainable Agriculture। उत्तर: अ
Q4. पोषी स्तर पर ऊर्जा प्रवाह का लिंडमैन का नियम कहलाता है: (अ) 5% (ब) 10% (स) 25% (द) 50% नियम। उत्तर: ब
Q5. रिले क्रॉपिंग में: (अ) दोनों फसलें साथ बोई जाती हैं (ब) खड़ी फसल में अगली फसल बोई जाती है (स) बीज मिलाकर बोते हैं (द) केवल सब्जियाँ। उत्तर: ब
17. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: AGRON-223 में कितने क्रेडिट हैं?
उत्तर: 1 क्रेडिट (1+0), यानी केवल थ्योरी; कुल 16 लेक्चर।
प्रश्न: फसल प्रतिरूप और फसल प्रणाली में अंतर क्या है?
उत्तर: प्रतिरूप केवल फसलों के क्षेत्र का अनुपात बताता है, जबकि प्रणाली उसमें प्रबंधन भी शामिल करती है।
प्रश्न: IFS क्यों जरूरी है?
उत्तर: यह छोटे किसानों की आय बढ़ाता है, जोखिम घटाता है और संसाधनों का पुनर्चक्रण करता है।
प्रश्न: HEIA और LEISA में क्या अंतर है?
उत्तर: HEIA में बाहरी आदान अधिक होते हैं, जबकि LEISA में स्थानीय संसाधनों का अधिकतम और बाहरी आदानों का संतुलित उपयोग होता है।
प्रश्न: सतत कृषि के प्रमुख संकेतक क्या हैं?
उत्तर: मृदा स्वास्थ्य, उपज की स्थिरता (SYI), जल स्तर, शुद्ध आय और जैव विविधता।
प्रश्न: शुष्क क्षेत्रों में कौन से उद्यम अच्छे हैं?
उत्तर: बकरी-भेड़ पालन, देशी गाय/ऊँट, कृषि वानिकी, चारागाह विकास और वर्षा जल संग्रहण।
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संदर्भ पुस्तकें (Reference Books)
एस.सी. पांडा, Cropping Systems and Farming Systems; एस.सी. पांडा, Modern Concepts and Advance Principles in Crop Production; अरुण के. शर्मा, A Handbook of Organic Farming; बालासुब्रमणियन व पलानीअप्पन, Principles and Practices of Agronomy; राजीव के. शुक्ला, Sustainable Agriculture; एस.पी. पलानीअप्पन, Cropping Systems in the Tropics; एस.आर. रेड्डी, Principles of Agronomy; गौतम आर.सी. एवं सिंह, टिकाऊ खेती (ICAR)।
नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। पाठ्यक्रम का स्रोत: Swami Keshwanand Rajasthan Agricultural University, Bikaner की Vth Deans' Committee Report।
