कृषि वित्त एवं सहकारिता (Agricultural Finance and Co-operation, AECON-211) B.Sc. (Hons.) Agriculture के तीसरे सेमेस्टर का 3 क्रेडिट (2+1) का कोर्स है। खेती में बीज-खाद से लेकर ट्रैक्टर और कुआँ तक हर चीज के लिए पैसा चाहिए। इस कोर्स में सीखा जाता है कि कृषि ऋण कहाँ से और कैसे मिलता है, बैंक ऋण का मूल्यांकन कैसे करते हैं, फसल बीमा कैसे काम करता है और सहकारी संस्थाएँ किसानों की मदद कैसे करती हैं। सिलेबस में 32 थ्योरी और 16 प्रैक्टिकल लेक्चर हैं। इस लेख में सभी टॉपिक क्रमवार, सूत्रों, तालिकाओं, MCQ और FAQ के साथ दिए गए हैं।
भाग-I: कृषि वित्त (Agricultural Finance)
1. कृषि वित्त: अर्थ, क्षेत्र और महत्व
कृषि वित्त वह अध्ययन है जिसमें कृषि क्षेत्र में पूँजी की व्यवस्था, उपयोग और प्रबंधन किया जाता है। इसके दो स्तर हैं: सूक्ष्म वित्त (Micro finance) यानी खेत/किसान स्तर पर और समष्टि वित्त (Macro finance) यानी राष्ट्रीय स्तर पर ऋण संस्थाओं और नीतियों का अध्ययन।
महत्व
- उन्नत बीज, उर्वरक, सिंचाई, मशीन जैसी आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए पूँजी।
- छोटी जोत वाले किसान की कम बचत और मौसमी आय के कारण ऋण पर निर्भरता।
- उत्पादन, आय और रोजगार में वृद्धि; पूँजी निर्माण; ऋणग्रस्तता कम करना।
कृषि में ऋण की आवश्यकता (प्रकार)
| आवश्यकता | उदाहरण |
|---|---|
| उत्पादन (मौसमी) | बीज, खाद, कीटनाशी, मजदूरी, सिंचाई |
| निवेश (पूँजीगत) | भूमि सुधार, ट्यूबवेल, ट्रैक्टर, डेयरी, ड्रिप |
| विपणन | उपज की ग्रेडिंग, भंडारण, परिवहन; फसल को तुरंत न बेचकर रोकना |
| उपभोग/आकस्मिक | शादी-विवाह, बीमारी, त्योहार; अनुत्पादक ऋण |
2. कृषि ऋण: अर्थ, परिभाषा, आवश्यकता और वर्गीकरण
कृषि ऋण वह मौद्रिक या वस्तु-रूप में सहायता है जो किसान को किसी निश्चित अवधि में ब्याज सहित वापस चुकाने के वादे पर मिलती है।
| आधार | वर्गीकरण |
|---|---|
| अवधि के अनुसार | अल्पकालीन (12–18 माह तक; फसल ऋण), मध्यकालीन (18 माह से 5 वर्ष; पंपसेट, छोटे उपकरण, बैल), दीर्घकालीन (5 वर्ष से अधिक; भूमि खरीद, ट्रैक्टर, कुआँ) |
| उद्देश्य के अनुसार | उत्पादक, निवेश (पूँजी निर्माण), विपणन, उपभोग |
| सुरक्षा के अनुसार | सुरक्षित (गिरवी/बंधक) और असुरक्षित (व्यक्तिगत जमानत) |
| स्रोत के अनुसार | संस्थागत और गैर-संस्थागत |
3. ऋण विश्लेषण: 3 R, 5 C और 7 P
| सिद्धांत | तत्व |
|---|---|
| 3 R (ऋण विश्लेषण) | Returns from investment (निवेश से प्रतिफल), Repayment capacity (चुकाने की क्षमता), Risk-bearing ability (जोखिम सहने की क्षमता) |
| 5 C (उधार लेने वाले का मूल्यांकन) | Character (चरित्र/साख), Capacity (क्षमता), Capital (पूँजी), Collateral (जमानत), Condition (परिस्थितियाँ) |
| 7 P (ऋण देने के सिद्धांत) | Productive purpose (उत्पादक उद्देश्य), Personality (व्यक्तित्व), Productivity (उत्पादकता), Phased disbursement (किस्तों में वितरण), Proper utilization (सही उपयोग), Payment (भुगतान/चुकौती), Protection (बीमा/सुरक्षा) |
4. कृषि वित्त के स्रोत
| गैर-संस्थागत स्रोत | संस्थागत स्रोत |
|---|---|
| साहूकार, जमींदार, व्यापारी/आढ़तिया, रिश्तेदार-मित्र। अधिक ब्याज दर (24–60% तक), शोषण, परंतु सरल व तुरंत उपलब्ध। | सहकारी संस्थाएँ (PACS, DCCB, राज्य सहकारी बैंक, भूमि विकास बैंक), वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB), NABARD, सरकार (तकावी ऋण)। कम ब्याज, नियमन, पर औपचारिकताएँ अधिक। |
वाणिज्यिक बैंक, सामाजिक नियंत्रण और राष्ट्रीयकरण
- सामाजिक नियंत्रण (1967): बैंकों के बोर्ड में विविध क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व; कृषि व छोटे उद्योगों को ऋण की प्राथमिकता।
- राष्ट्रीयकरण: 1969 में 14 बड़े बैंक और 1980 में 6 और बैंक। उद्देश्य: ग्रामीण शाखाओं का विस्तार, कृषि को ऋण, क्षेत्रीय संतुलन।
- प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL): घरेलू वाणिज्यिक बैंकों के लिए कुल ऋण का 40% प्राथमिकता क्षेत्र को; इसमें कृषि के लिए लगभग 18%।
सूक्ष्म वित्त (Micro finance) और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)
- सूक्ष्म वित्त: गरीबों व छोटे किसानों को छोटी राशि का ऋण। स्व-सहायता समूह-बैंक लिंकेज कार्यक्रम (NABARD, 1992), संयुक्त देयता समूह (JLG), सूक्ष्म वित्त संस्थाएँ (MFI)।
- किसान क्रेडिट कार्ड (KCC; 1998-99): फसल उत्पादन हेतु सरल, लचीली व चक्रीय (Revolving) ऋण सुविधा; सीमा फसल की "वित्त का स्तर (Scale of finance)" पर आधारित; सामान्यतः 3 वर्ष की वैधता; पशुपालन व मत्स्य पालन के लिए भी विस्तारित; आधुनिक रुपे KCC। ब्याज अनुदान योजना (MISS) के अंतर्गत समय पर चुकौती पर प्रभावी ब्याज दर कम (लगभग 4%)। सीमा समय-समय पर संशोधित (हाल में ₹5 लाख तक की घोषणा)।
अग्रणी बैंक योजना और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
- अग्रणी बैंक योजना (1969; गाडगिल अध्ययन समूह की सिफारिश): प्रत्येक जिले के लिए एक बैंक "अग्रणी बैंक" होता है जो जिले में ऋण योजना बनाता और समन्वय करता है; जिला परामर्शदात्री समिति (DCC)।
- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB; 1975; अधिनियम 1976): छोटे व सीमांत किसानों, कारीगरों और भूमिहीन मजदूरों को ऋण। स्वामित्व: केंद्र सरकार 50%, राज्य सरकार 15%, प्रायोजक बैंक 35%।
वित्त का स्तर (Scale of finance) और इकाई लागत (Unit cost)
- वित्त का स्तर: किसी फसल की प्रति हेक्टेयर/एकड़ लागत के आधार पर स्वीकृत ऋण की राशि, जिसे जिला स्तरीय तकनीकी समिति (DLTC) तय करती है।
- इकाई लागत: किसी निवेश परिसंपत्ति (जैसे ट्यूबवेल, डेयरी की एक पशु इकाई, पॉलीहाउस) की प्रति इकाई मानक लागत, जिसके आधार पर निवेश ऋण दिया जाता है।
- ऋण राशि = वित्त का स्तर × क्षेत्रफल (फसल ऋण) या इकाइयाँ × इकाई लागत (निवेश ऋण); इसमें मार्जिन मनी (किसान का हिस्सा) घटाकर।
5. उच्च वित्तीय संस्थाएँ: RBI, NABARD, ADB, IMF और विश्व बैंक
| संस्था | स्थापना / मुख्यालय | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) | 1 अप्रैल 1935; मुंबई (1949 में राष्ट्रीयकृत) | नोट निर्गमन, सरकार का बैंकर, बैंकों का बैंक, ऋण नियंत्रण (CRR, SLR, रेपो दर, बैंक दर), विदेशी मुद्रा प्रबंधन; कृषि ऋण विभाग; प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के निर्देश |
| नाबार्ड (NABARD) | 12 जुलाई 1982 (शिवरामन समिति/CRAFICARD की सिफारिश; NABARD अधिनियम 1981); मुंबई | कृषि व ग्रामीण विकास का शीर्ष बैंक; पुनर्वित्त (Refinance), ग्रामीण अवसंरचना विकास कोष (RIDF), सहकारी बैंकों व RRB की देखरेख, SHG-बैंक लिंकेज, KCC को प्रोत्साहन, वाटरशेड व जनजातीय विकास |
| एशियाई विकास बैंक (ADB) | 1966; मनीला (फिलीपींस) | एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विकास ऋण; सिंचाई, ग्रामीण अवसंरचना, कृषि परियोजनाएँ; भारत संस्थापक सदस्य |
| अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) | ब्रेटन वुड्स सम्मेलन 1944; कार्य 1947 से; वाशिंगटन डी.सी. | अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग, भुगतान संतुलन में अल्पकालिक सहायता, विनिमय दर स्थिरता, SDR |
| विश्व बैंक (IBRD + IDA आदि) | 1944-45; वाशिंगटन डी.सी. | दीर्घकालीन विकास ऋण; भारत में सिंचाई, वाटरशेड, कृषि अनुसंधान (जैसे NAIP) परियोजनाएँ |
6. फसल बीमा और उसका क्षेत्र
फसल बीमा किसान को प्राकृतिक आपदा (सूखा, बाढ़, ओला, कीट-रोग) से होने वाली उपज की हानि की भरपाई करता है; इससे आय स्थिर रहती है और ऋण चुकाने की क्षमता बनी रहती है।
| वर्ष | योजना |
|---|---|
| 1972-73 | पहली व्यक्तिगत आधार की योजना (H-4 कपास, GIC) |
| 1979 | पायलट फसल बीमा योजना (PCIS) |
| 1985 | समग्र फसल बीमा योजना (CCIS) |
| 1999 | राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (NAIS) |
| 2007-08 | मौसम आधारित फसल बीमा योजना (WBCIS) |
| 2016 | प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) |
बीमा के दृष्टिकोण: क्षेत्र आधारित (Area approach; परिभाषित क्षेत्र/ग्राम पंचायत के औसत उपज से तुलना) और व्यक्तिगत (Individual) दृष्टिकोण।
7. क्रेडिट गारंटी निगम
- क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CGCI; 1971): छोटे उधारकर्ताओं को दिए गए बैंक ऋण की गारंटी देकर बैंकों का जोखिम कम किया। 1978 में जमा बीमा निगम से मिलकर जमा बीमा एवं ऋण गारंटी निगम (DICGC) बना (RBI की सहायक); अब जमाओं का बीमा प्रति जमाकर्ता प्रति बैंक ₹5 लाख तक।
- आज सूक्ष्म व लघु उद्यमों के लिए CGTMSE (2000) और FPO हेतु SFAC की क्रेडिट गारंटी निधि जैसी योजनाएँ।
8. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): विशेषताएँ, महत्व और सीमाएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| आरंभ | 18 फरवरी 2016; खरीफ 2016 से लागू |
| किसान का प्रीमियम | खरीफ में खाद्यान्न व तिलहन फसलों हेतु 2%; रबी में 1.5%; वाणिज्यिक/बागवानी फसलों हेतु 5%। शेष प्रीमियम केंद्र व राज्य सरकार बराबर-बराबर (सब्सिडी की कोई ऊपरी सीमा नहीं)। |
| कवरेज | बुवाई/रोपण में बाधा (Prevented sowing), खड़ी फसल (बुवाई से कटाई तक), कटाई के बाद 14 दिन तक की हानि (खेत में सूखती फसल पर ओला, चक्रवात, बेमौसम बारिश), स्थानीय आपदाएँ (ओला, भूस्खलन, जलभराव, बादल फटना, आग; खेत स्तर पर), मध्य-मौसम प्रतिकूलता (क्षतिपूर्ति का लगभग 25% तक) |
| तकनीक | फसल कटाई प्रयोग (CCE), स्मार्टफोन, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन; दावों का भुगतान DBT से |
| नामांकन | शुरू में ऋणी किसानों के लिए अनिवार्य; खरीफ 2020 से सभी के लिए स्वैच्छिक |
महत्व
जोखिम में कमी, आय में स्थिरता, ऋण की उपलब्धता और नई तकनीक/निवेश के लिए प्रोत्साहन, खाद्य सुरक्षा।
सीमाएँ
- दावों के भुगतान में देरी; क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण में "बेसिस जोखिम" (किसान को व्यक्तिगत हानि के बावजूद क्षेत्र औसत के कारण भुगतान न मिलना)।
- CCE की गुणवत्ता व उपज अनुमान पर विवाद; किसानों में जागरूकता की कमी।
- बटाईदार/पट्टेदार किसानों की कवरेज कठिन; बीमा कंपनियों की कम सहभागिता; प्रशासनिक लागत।
9. ऋण की लागत और कृषि ऋण में हाल के घटनाक्रम
- ऋण की लागत: केवल ब्याज नहीं, बल्कि प्रसंस्करण शुल्क, बीमा, दस्तावेज़ी खर्च, यात्रा और समय की लागत, कभी-कभी अनौपचारिक भुगतान भी। सरल ब्याज (SI) = P × r × t / 100; चक्रवृद्धि ब्याज: A = P(1 + r/100)ⁿ।
- हाल के घटनाक्रम: KCC का पशुपालन व मत्स्य पालन तक विस्तार, ब्याज अनुदान योजना (MISS), कृषि अवसंरचना कोष (AIF; ₹1 लाख करोड़; ब्याज अनुदान व क्रेडिट गारंटी), FPO के लिए क्रेडिट गारंटी, बिना जमानत (Collateral-free) कृषि ऋण की सीमा में वृद्धि (हाल में ₹2 लाख तक), डिजिटल KCC व किसान ऋण पोर्टल, PM-KISAN, जन धन खाते, ई-NWR (भंडार रसीद पर ऋण)।
10. वित्तीय विवरण: तुलन-पत्र (Balance Sheet) और आय विवरण (Income Statement)
| विवरण | अर्थ व घटक |
|---|---|
| तुलन-पत्र (संपत्ति-दायित्व विवरण) | किसी निश्चित तिथि पर किसान की वित्तीय स्थिति। परिसंपत्तियाँ: चालू (नकदी, भंडार, अग्रिम), स्थायी (भूमि, भवन, मशीन, पशुधन)। देयताएँ: चालू (अल्पकालीन ऋण), दीर्घकालीन ऋण। निवल मूल्य (Net worth) = कुल परिसंपत्तियाँ − कुल देयताएँ |
| आय विवरण (लाभ-हानि खाता) | एक वर्ष की आय व व्यय। सकल आय (बिक्री + स्टॉक में वृद्धि + स्वयं उपभोग) − कुल व्यय (नकद + मूल्यह्रास) = शुद्ध कृषि आय |
चालू अनुपात = चालू परिसंपत्तियाँ ÷ चालू देयताएँ (सामान्यतः 1.5–2 या अधिक वांछनीय)
ऋण-इक्विटी अनुपात = कुल ऋण ÷ निवल मूल्य
परिसंपत्ति पर प्रतिफल = शुद्ध आय ÷ कुल परिसंपत्तियाँ × 100
11. परियोजना रिपोर्ट, बैंक मानक और SWOT विश्लेषण
परियोजना रिपोर्ट के मुख्य घटक
- परियोजना का परिचय, उद्देश्य व औचित्य।
- तकनीकी पहलू: स्थान, भूमि, जल, तकनीक, इकाई का आकार, श्रम।
- वित्तीय पहलू: परियोजना लागत, वित्त के स्रोत (किसान का मार्जिन + बैंक ऋण), कार्यशील पूँजी, आय-व्यय, नकदी प्रवाह, चुकौती अनुसूची।
- आर्थिक पहलू: लाभ-लागत अनुपात (BCR), शुद्ध वर्तमान मूल्य (NPV), आंतरिक प्रतिफल दर (IRR), वापसी अवधि (Payback)।
- विपणन, संगठन व प्रबंधन, जोखिम व उपाय।
बैंक मानक
मार्जिन मनी (सामान्यतः परियोजना लागत का 15–25%), ऋण चुकौती क्षमता, ऋण सेवा आवरण अनुपात (DSCR) सामान्यतः 1.5 से अधिक, उपयुक्त जमानत व बीमा, तकनीकी-आर्थिक व्यवहार्यता।
BCR = लाभों का वर्तमान मूल्य ÷ लागतों का वर्तमान मूल्य (BCR > 1 व्यवहार्य)
SWOT विश्लेषण
| S (Strengths) | W (Weaknesses) | O (Opportunities) | T (Threats) |
|---|---|---|---|
| इकाई की आंतरिक ताकत (जैसे अनुभव, बाजार की निकटता) | आंतरिक कमजोरियाँ (पूँजी, तकनीकी ज्ञान) | बाहरी अवसर (माँग, सरकारी योजना) | बाहरी खतरे (कीमत उतार-चढ़ाव, मौसम) |
12. वित्तीय साधन और विधियाँ: ई-बैंकिंग, किसान कार्ड और कोर बैंकिंग
- ई-बैंकिंग: इंटरनेट/मोबाइल बैंकिंग, ATM, डेबिट-क्रेडिट कार्ड, NEFT, RTGS, IMPS, UPI (BHIM आदि) से घर बैठे लेन-देन।
- किसान कार्ड: किसान क्रेडिट कार्ड (रुपे KCC), किसान डेबिट कार्ड; ATM व PoS से भुगतान और निकासी।
- कोर बैंकिंग (CBS): सभी शाखाएँ केंद्रीय सर्वर से जुड़ी; किसी भी शाखा से लेन-देन, तेज निपटान, पारदर्शिता।
- जन धन खाते, आधार-सक्षम भुगतान, माइक्रो ATM, DBT से अनुदान सीधे खाते में।
भाग-II: कृषि सहकारिता (Agricultural Cooperation)
13. सहकारिता: अर्थ, इतिहास, उद्देश्य और सिद्धांत
सहकारिता समान आवश्यकताओं वाले लोगों का स्वैच्छिक संगठन है जो आर्थिक हित में परस्पर सहयोग से कार्य करते हैं ("एक सबके लिए, सब एक के लिए")।
| वर्ष | मील का पत्थर |
|---|---|
| 1844 | रॉकडेल (इंग्लैंड) में उपभोक्ता सहकारी की स्थापना; आधुनिक सहकारिता की शुरुआत; जर्मनी में रायफाइसेन (ऋण सहकारिता) |
| 1904 | सहकारी साख समिति अधिनियम (भारत का पहला कानून; ग्रामीण ऋणग्रस्तता के निवारण हेतु) |
| 1912 | सहकारी समिति अधिनियम (गैर-ऋण समितियाँ, संघ) |
| 1915 | मैक्लागन समिति (सहकारिता की समीक्षा) |
| 1919 | सहकारिता प्रांतीय विषय बनी (मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) |
| 1951-54 | अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण समिति (गोरवाला): "सहकारिता असफल हुई है, पर इसे सफल होना ही होगा" |
| 2002; 2004 | बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम; वैद्यनाथन समिति (अल्पकालीन सहकारी ऋण ढाँचे का पुनरुद्धार) |
| 2011; 2021 | 97वाँ संविधान संशोधन (सहकारी समिति बनाने का मौलिक अधिकार); केंद्र में सहकारिता मंत्रालय का गठन |
उद्देश्य और सिद्धांत
- उद्देश्य: सदस्यों को सस्ता ऋण, खाद-बीज की आपूर्ति, उचित मूल्य पर उपज की बिक्री, शोषण से मुक्ति, आत्मनिर्भरता व बचत की आदत।
- ICA (अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन) के सात सिद्धांत (1995): (1) स्वैच्छिक व खुली सदस्यता; (2) लोकतांत्रिक सदस्य नियंत्रण (एक सदस्य, एक मत); (3) सदस्यों की आर्थिक भागीदारी; (4) स्वायत्तता व स्वतंत्रता; (5) शिक्षा, प्रशिक्षण व सूचना; (6) सहकारी संस्थाओं में परस्पर सहयोग; (7) समुदाय के प्रति चिंता।
- महत्व: ग्रामीण ऋण का प्रमुख स्रोत, इनपुट आपूर्ति (उर्वरक), डेयरी (अमूल), चीनी, विपणन, भंडारण व रोजगार।
14. भारत में कृषि सहकारिता के प्रकार
| प्रकार | विवरण / उदाहरण |
|---|---|
| साख (ऋण) सहकारी | अल्पकालीन: तीन स्तरीय ढाँचा: प्राथमिक कृषि साख समिति (PACS; ग्राम स्तर) → जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCB) → राज्य सहकारी बैंक (StCB)। दीर्घकालीन: प्राथमिक कृषि ग्रामीण विकास बैंक (PCARDB) → राज्य कृषि ग्रामीण विकास बैंक (SCARDB)। |
| विपणन सहकारी | उपज की सामूहिक बिक्री, ग्रेडिंग, भंडारण; उदाहरण: NAFED (राष्ट्रीय स्तर), राजफैड (RAJFED; राजस्थान); न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद में सहायक। |
| उपभोक्ता सहकारी | उपभोक्ता वस्तुएँ उचित मूल्य पर; उदाहरण: केंद्रीय भंडार, अपना बाजार। |
| बहुउद्देशीय सहकारी | ऋण, इनपुट आपूर्ति, विपणन, उपभोक्ता वस्तुएँ एक साथ (जैसे गाँव की ग्राम सेवा सहकारी समिति)। |
| किसान सेवा सहकारी समितियाँ (FSCS) | छोटे किसानों को ऋण के साथ इनपुट, तकनीकी सेवाएँ और विपणन। |
| प्रसंस्करण सहकारी | चीनी मिलें (महाराष्ट्र, गुजरात), डेयरी (अमूल-आनंद पैटर्न), तेल, कपास ओटाई; मूल्य संवर्धन व उचित मूल्य। |
| कृषि (खेती) सहकारी | सहकारी संयुक्त खेती, सहकारी उन्नत खेती, सामूहिक खेती, काश्तकार खेती। |
| सहकारी भंडारण | गोदाम, शीत भंडार, ग्रेडिंग; भंडार रसीद पर ऋण। |
प्रमुख राष्ट्रीय संस्थाएँ
| संस्था | कार्य |
|---|---|
| ICA (1895; जिनेवा) | विश्व स्तर पर सहकारी आंदोलन का शीर्ष संगठन; सिद्धांत व नीतियाँ |
| NCUI (1929; नई दिल्ली) | राष्ट्रीय सहकारी संघ; सहकारी शिक्षा, प्रशिक्षण, प्रचार |
| NCDC (1963; नई दिल्ली) | राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम; कृषि उपज के विपणन, प्रसंस्करण, भंडारण आदि के लिए वित्त |
| NAFED (1958) | कृषि उपज की सहकारी विपणन व खरीद (दलहन-तिलहन, मूल्य समर्थन योजना), निर्यात |
| IFFCO (1967), KRIBHCO (1980), NDDB/अमूल | उर्वरक सहकारी; डेयरी विकास |
15. प्रैक्टिकल में क्या सीखेंगे
- सीमित पूँजी का इष्टतम आवंटन: समसीमांत प्रतिफल के सिद्धांत से विभिन्न उद्यमों (फसल, डेयरी आदि) में पूँजी बाँटना।
- प्रकाशित आँकड़ों से सहकारी संस्थाओं, वाणिज्यिक बैंकों और RRB की प्रगति व कार्य-निष्पादन का विश्लेषण (सदस्यता, शेयर पूँजी, ऋण वितरण, वसूली %, NPA)।
- वाणिज्यिक बैंक, सहकारी बैंक व सहकारी समिति का भ्रमण: प्रबंधन, योजनाएँ व प्रक्रिया।
- खेती की ऋण आवश्यकता का आकलन, तुलन-पत्र व आय विवरण तैयार करना (केस स्टडी); ऋण प्रस्ताव का मूल्यांकन।
- परियोजनाओं के तकनीकी-आर्थिक मानक; विभिन्न कृषि उत्पादों व मूल्य संवर्धित उत्पादों की बैंक-योग्य परियोजना रिपोर्ट।
- चुकौती योजनाएँ: समान किस्तें (EMI), घटती शेष राशि, मौसमी चुकौती, बुलेट भुगतान आदि।
सरल ब्याज = (P × r × t) ÷ 100 | चक्रवृद्धि: A = P (1 + r)ⁿ
EMI = [P × r × (1 + r)ⁿ] ÷ [(1 + r)ⁿ − 1], जहाँ r = मासिक दर, n = कुल किस्तें
उदाहरण: ₹1,00,000 का ऋण, 12% वार्षिक (1% मासिक), 12 मासिक किस्तें ⇒ EMI ≈ ₹8,885
ऋण की राशि = वित्त का स्तर × क्षेत्रफल − मार्जिन
नकद आय-व्यय: निवल मूल्य = परिसंपत्तियाँ − देयताएँ
16. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु (Quick Revision)
- 3 R: Returns, Repayment capacity, Risk-bearing; 5 C: Character, Capacity, Capital, Collateral, Condition।
- सामाजिक नियंत्रण 1967; बैंक राष्ट्रीयकरण 1969 (14) व 1980 (6); अग्रणी बैंक योजना 1969।
- RRB: 1975 (50:15:35); NABARD: 12 जुलाई 1982; RBI: 1 अप्रैल 1935।
- KCC: 1998-99; SHG-बैंक लिंकेज: 1992 (NABARD)।
- PMFBY: 2016; प्रीमियम 2% (खरीफ), 1.5% (रबी), 5% (वाणिज्यिक/बागवानी)।
- सहकारी साख अधिनियम 1904; सहकारी समिति अधिनियम 1912; रॉकडेल पायनियर्स 1844।
- ICA के 7 सिद्धांत (1995); NCDC 1963; NAFED 1958; NCUI 1929।
17. महत्वपूर्ण प्रश्न (MCQ)
Q1. NABARD की स्थापना कब हुई? (अ) 1975 (ब) 1982 (स) 1969 (द) 1991। उत्तर: ब
Q2. 5 C में "C" का एक अंश नहीं है: (अ) Character (ब) Capacity (स) Capital (द) Cost। उत्तर: द
Q3. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना किस वर्ष हुई? (अ) 1950 (ब) 1969 (स) 1975 (द) 1982। उत्तर: स
Q4. PMFBY में रबी खाद्यान्न व तिलहन पर किसान का प्रीमियम है: (अ) 1.5% (ब) 2% (स) 5% (द) 10%। उत्तर: अ
Q5. भारत का पहला सहकारी कानून है: (अ) 1904 का अधिनियम (ब) 1912 का अधिनियम (स) 2002 का अधिनियम (द) 1951 का अधिनियम। उत्तर: अ
Q6. अग्रणी बैंक योजना किस समिति की सिफारिश पर शुरू हुई? (अ) गाडगिल अध्ययन समूह (ब) गोरवाला (स) शिवरामन (द) मैक्लागन। उत्तर: अ
Q7. सहकारी संस्था में मतदान का सिद्धांत है: (अ) एक शेयर, एक मत (ब) एक सदस्य, एक मत (स) अधिक पूँजी, अधिक मत (द) कोई मत नहीं। उत्तर: ब
Q8. KCC की शुरुआत किस वर्ष हुई? (अ) 1998-99 (ब) 2005 (स) 2010 (द) 1982। उत्तर: अ
18. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: AECON-211 के कितने क्रेडिट और लेक्चर हैं?
उत्तर: 3 क्रेडिट (2+1); थ्योरी के 32 और प्रैक्टिकल के 16 लेक्चर।
प्रश्न: संस्थागत और गैर-संस्थागत ऋण में क्या अंतर है?
उत्तर: संस्थागत ऋण (बैंक, सहकारी समिति) नियमित, कम ब्याज वाला होता है; गैर-संस्थागत (साहूकार, व्यापारी) में ब्याज अधिक और शोषण की संभावना होती है।
प्रश्न: KCC पर किसान को क्या लाभ मिलते हैं?
उत्तर: सरल व चक्रीय ऋण, कम ब्याज (ब्याज अनुदान के साथ), बीमा, बार-बार आवेदन से मुक्ति, नकदी निकासी की सुविधा।
प्रश्न: PMFBY में दावा कैसे मिलता है?
उत्तर: कटाई प्रयोग (CCE) से उपज का आकलन होता है; क्षति तय सीमा से अधिक होने पर बीमा राशि सीधे बैंक खाते में (DBT) आती है; स्थानीय आपदा में खेत स्तर पर तुरंत सूचना देनी होती है।
प्रश्न: PACS क्या है?
उत्तर: ग्राम स्तर की प्राथमिक कृषि साख समिति, जो सदस्यों को ऋण, खाद-बीज आदि उपलब्ध कराती है और तीन स्तरीय सहकारी ढाँचे की पहली इकाई है।
प्रश्न: सहकारी और निजी कंपनी में मुख्य अंतर?
उत्तर: सहकारी में "एक सदस्य, एक मत" और सेवा/सदस्य-कल्याण उद्देश्य होता है; कंपनी में पूँजी के अनुसार मत और लाभ-अधिकतमीकरण।
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सहायक संदर्भ पुस्तकें (Suggested Reading)
एस.एस. सुब्बा रेड्डी एवं पी. राघव राम, Agricultural Finance and Management; ए.के. तोमर, Agricultural Finance and Cooperation; एम.एन. बहल, Agricultural Cooperation; एस.एस. जोहल एवं टी.आर. काप्ला, Agricultural Finance; NABARD व RBI की वार्षिक रिपोर्टें। (अधिकृत संदर्भ सूची हेतु अपने विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम देखें।)
नोट: यह लेख केवल शैक्षणिक उद्देश्य से मौलिक रूप में तैयार किया गया है। ब्याज दर, योजनाओं की सीमाएँ (KCC, कोलेटरल-मुक्त ऋण, PSL लक्ष्य) और बीमा के नियम समय-समय पर बदलते रहते हैं; परीक्षा/उपयोग से पहले RBI, NABARD और कृषि मंत्रालय की नवीनतम अधिसूचनाओं से मिलान करें। पाठ्यक्रम का स्रोत: Swami Keshwanand Rajasthan Agricultural University, Bikaner की Vth Deans' Committee Report।
